भारत की सभ्यता का इतिहास केवल राजाओं और साम्राज्यों का इतिहास नहीं है, बल्कि जनभागीदारी, विचार-विमर्श और सामाजिक सहमति की परंपरा का भी इतिहास है। वैदिक सभाओं से लेकर गणराज्यों तक, भारतीय चिंतन में शासन का आदर्श निरंकुश सत्ता नहीं, बल्कि उत्तरदायी व्यवस्था रहा है। यही कारण था कि 1947 में स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत ने लोकतंत्र को केवल एक संवैधानिक व्यवस्था के रूप में नहीं, बल्कि अपनी सभ्यतागत विरासत के स्वाभाविक विस्तार के रूप में स्वीकार किया। जबकि भारत के साथ स्वतंत्र हुए अनेक देश सैन्य शासन, तख्तापलट और तानाशाही की ओर बढ़ गए, भारत ने लोकतांत्रिक व्यवस्था को बनाए रखा।
स्वतंत्रता के बाद कांग्रेस को लगातार जनादेश मिला, किंतु समय के साथ सत्ता का केंद्रीकरण बढ़ने लगा। बढ़ते केंद्रीकरण के परिणामस्वरूप 1960 के दशक के अंत और 1970 के दशक तक कांग्रेस के भीतर आंतरिक लोकतंत्र कमजोर होता गया तथा नेतृत्व का केंद्र धीरे-धीरे एक व्यक्ति के इर्द-गिर्द सिमटने लगा। 1971 की चुनावी विजय और बांग्लादेश युद्ध के बाद प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की लोकप्रियता अभूतपूर्व स्तर पर पहुंच गई। इसी दौर में "इंदिरा इज़ इंडिया" जैसा नारा भी सामने आया, जो निश्चित ही सत्ता के अत्यधिक व्यक्तिकेंद्रित होने का प्रतीक था। दूसरी ओर महंगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और प्रशासनिक अक्षमता के कारण जनता, विशेषकर युवाओं में असंतोष तेजी से बढ़ रहा था।
गुजरात से उठी पहली चिंगारी: नव निर्माण आंदोलन का उदय
इस असंतोष की पहली संगठित अभिव्यक्ति गुजरात में दिखाई दी। 1973 में अहमदाबाद के एल.डी. इंजीनियरिंग कॉलेज में मेस शुल्क वृद्धि के विरोध से शुरू हुआ छात्र आंदोलन शीघ्र ही भ्रष्टाचार और कुशासन के विरुद्ध राज्यव्यापी जनआंदोलन में बदल गया। नव निर्माण आंदोलन के नाम से प्रसिद्ध इस संघर्ष ने तत्कालीन मुख्यमंत्री चिमनभाई पटेल की सरकार को कठघरे में खड़ा कर दिया। छात्रों के साथ व्यापारी, कर्मचारी और आम नागरिक भी जुड़ते गए। अंततः बढ़ते जनदबाव के बीच गुजरात विधानसभा भंग करनी पड़ी। स्वतंत्र भारत में यह पहला अवसर था, जब छात्र शक्ति ने लोकतांत्रिक तरीके से सत्ता को झुकने पर विवश कर दिया।
बिहार छात्र संघर्ष समिति का गठन
गुजरात की घटनाओं ने बिहार के युवाओं को भी प्रेरित किया। उस समय बिहार भी महंगाई, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और प्रशासनिक अव्यवस्था से जूझ रहा था। पटना विश्वविद्यालय और राज्य के अन्य शिक्षण संस्थान इस असंतोष का केंद्र बने। छात्रों ने मिलकर बिहार छात्र संघर्ष समिति का गठन किया। यह समिति परिवर्तन की मांग कर रहे विभिन्न छात्र समूहों और युवाओं का साझा प्रयास थी।
इस आंदोलन में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) के कार्यकर्ताओं ने संगठनात्मक स्तर पर महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। परिषद का पहले से मौजूद नेटवर्क आंदोलन को कॉलेज परिसरों से निकालकर जिलों और गांवों तक ले जाने में सहायक बना। इसके साथ ही समाजवादी विचारधारा से जुड़े छात्र, स्वतंत्र युवा कार्यकर्ता और अन्य छात्र संगठन भी आंदोलन का हिस्सा बने। यही विविधता इस आंदोलन की सबसे बड़ी शक्ति बनी।
'संपूर्ण क्रांति' का आह्वान
बिहार आंदोलन को राष्ट्रीय पहचान तब मिली, जब छात्रों ने स्वतंत्रता आंदोलन के वरिष्ठ नेता जयप्रकाश नारायण से नेतृत्व संभालने का आग्रह किया। लंबे समय से सक्रिय राजनीति से दूर रह रहे जेपी ने युवाओं के आह्वान को स्वीकार किया। उन्होंने आंदोलन को केवल सरकार विरोध तक सीमित नहीं रखा, बल्कि "संपूर्ण क्रांति" का नारा दिया। उनके अनुसार भारत को राजनीतिक परिवर्तन के साथ-साथ प्रशासन, शिक्षा, समाज, अर्थव्यवस्था और सार्वजनिक जीवन में व्यापक नैतिक सुधार की आवश्यकता थी। इस विचार ने छात्र आंदोलन को एक वैचारिक आधार प्रदान किया और देखते ही देखते यह बिहार से निकलकर राष्ट्रीय आंदोलन बन गया।

इस आंदोलन के चलते हजारों छात्र गांव-गांव, कस्बे-कस्बे और विश्वविद्यालयों तक पहुंचे। उन्होंने सभाएं आयोजित कीं, जनसंपर्क अभियान चलाए और लोकतांत्रिक अधिकारों के प्रति समाज को जागरूक किया। पहली बार स्वतंत्र भारत में छात्र राष्ट्रीय राजनीति के सक्रिय सहभागी बन गए। यह आंदोलन इस विश्वास पर आधारित था कि लोकतंत्र केवल हर पांच वर्ष में मतदान करने तक सीमित नहीं है, बल्कि नागरिकों को सरकार से प्रश्न पूछने और जवाब मांगने का भी अधिकार है।
छात्र आंदोलन पर इंदिरा का प्रहार
इंदिरा गांधी सरकार ने इस बढ़ते आंदोलन को केवल राजनीतिक विरोध के रूप में नहीं देखा। सरकार को आशंका थी कि यदि छात्र शक्ति इसी प्रकार संगठित होती रही, तो वह राष्ट्रीय स्तर पर सत्ता के लिए गंभीर चुनौती बन सकती है। यही कारण था कि 25 जून 1975 को आपातकाल लागू होने के बाद सबसे पहले जिन वर्गों को निशाना बनाया गया, उनमें छात्र नेता, युवा कार्यकर्ता और आंदोलन से जुड़े संगठन प्रमुख थे। अनेक छात्र नेताओं को गिरफ्तार किया गया, विश्वविद्यालय परिसरों में पुलिस तैनात की गई और राजनीतिक गतिविधियों पर कड़ी निगरानी रखी गई।
लेकिन दमन के बावजूद प्रतिरोध समाप्त नहीं हुआ। बड़ी संख्या में छात्र भूमिगत हो गए। उन्होंने गुप्त संपर्क तंत्र विकसित किए, साइक्लोस्टाइल मशीनों से पर्चे छापे, कथित 'प्रतिबंधित साहित्य' वितरित किया और जेलों में बंद नेताओं तक संदेश पहुंचाने का कार्य किया। कई स्थानों पर यही छात्र भूमिगत लोकतांत्रिक आंदोलन की सबसे मजबूत कड़ी बने। भूमिगत नेटवर्क ने यह सुनिश्चित किया कि सरकारी सेंसरशिप के बावजूद जनता तक वैकल्पिक सूचनाएं और लोकतंत्र बहाली का संदेश पहुंचता रहे।
लोकतंत्र की लड़ाई का अदृश्य मोर्चा: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ
इस दौर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवकों, जनसंघ के कार्यकर्ताओं और अनेक छात्र संगठनों के बीच भी समन्वय देखने को मिला। सरकार ने संघ पर प्रतिबंध लगाया और उसके हजारों स्वयंसेवकों को गिरफ्तार किया, किंतु भूमिगत स्तर पर संगठनात्मक गतिविधियां जारी रहीं। अनेक इतिहासकारों और आपातकाल संबंधी संस्मरणों में उल्लेख मिलता है कि विभिन्न क्षेत्रों में छात्र कार्यकर्ताओं और स्वयंसेवकों ने मिलकर लोकतंत्र बहाली के अभियान को जीवित रखा। यह प्रतिरोध किसी एक संगठन का नहीं, बल्कि उन विविध समूहों का था, जो इमरजेंसी का विरोध कर रहे थे।
1975 से 1977 तक चले इस संघर्ष ने एक पूरी पीढ़ी को राजनीतिक रूप से परिपक्व किया। अनेक युवा जेल गए, अनेक ने अपनी पढ़ाई बीच में छोड़ी और कई भूमिगत रहकर लोकतंत्र बहाली के लिए कार्य करते रहे। बाद के दशकों में भारतीय राजनीति के कई प्रमुख नेता इसी छात्र आंदोलन की पृष्ठभूमि से उभरे। इस दृष्टि से बिहार आंदोलन केवल तत्कालीन सत्ता के विरोध का आंदोलन नहीं था, बल्कि स्वतंत्र भारत के राजनीतिक नेतृत्व की नई पीढ़ी का निर्माण करने वाला आंदोलन भी था।
मार्च 1977 में जब आम चुनाव हुए, तब उसके परिणाम व्यापक लोकतांत्रिक प्रतिरोध का जनादेश थे, जिसकी नींव गुजरात और बिहार के छात्र आंदोलनों ने रखी थी। जनता पार्टी की सरकार का गठन हुआ और इमरजेंसी समाप्त हुई। यह विश्व इतिहास के उन दुर्लभ उदाहरणों में से एक था, जहां लोकतांत्रिक प्रक्रिया के माध्यम से अपेक्षाकृत कम समय में आपातकालीन शासन का अंत हुआ।
लेख
केवली कबीर जैन
पत्रकारिता छात्र, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय