दुनिया के सबसे अमीर शख्स एलन मस्क ने अमेरिकी विदेशी सहायता एजेंसी (USAID) पर बेहद गंभीर आरोप लगाते हुए एक बड़ा खुलासा किया है। मस्क ने सोशल मीडिया पर डेमोक्रेटिक कांग्रेसमैन रो खन्ना से तीखी बहस के दौरान कहा कि USAID ने दुनिया भर के चुनावों को प्रभावित किया, भ्रष्ट नेताओं को अमीर बनाया, वुहान में कोविड पैदा किया और यूक्रेन-रूस युद्ध की चिंगारी भड़काई। यह विवाद तब शुरू हुआ जब कांग्रेसमैन खन्ना ने 'द लैंसेट' में प्रकाशित एक अध्ययन का हवाला देते हुए मस्क पर दुनिया भर में लाखों बच्चों की मौत का ठीकरा फोड़ दिया।
दरअसल, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दूसरे कार्यकाल के शुरुआती महीनों में एलन मस्क ने सरकारी खर्चों की जांच के लिए बनाए गए डिपार्टमेंट ऑफ गवर्नमेंट एफिशिएंसी यानी DOGE का नेतृत्व किया। खन्ना ने आरोप लगाया कि मस्क ने USAID को खत्म करके करीब 45 लाख बच्चों को मौत की सजा सुनाई है। इस पर पलटवार करते हुए मस्क ने खन्ना को "रो द रॉबर" यानी लुटेरा करार दिया और शेयर बाजार से गलत तरीके से मुनाफा कमाने का इशारा किया। मस्क ने साफ शब्दों में चेतावनी दी कि झूठ फैलाने के लिए इस शख्स पर मुकदमा करने का समय आ गया है। उन्होंने खन्ना के सारे आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया।
मस्क ने अपनी सफाई में बेहद सरल और सटीक तर्क रखा। उन्होंने कहा, "DOGE ने बस इतना कहा था कि सहायता पाने वालों का संपर्क विवरण दीजिए ताकि हम पुष्टि कर सकें कि फंडिंग में कोई धोखाधड़ी नहीं हुई। किसी भी वैध चिकित्सा फंडिंग को नहीं रोका गया।" उन्होंने आगे बताया कि विदेश मंत्रालय अब उन सभी परियोजनाओं की निगरानी कर रहा है जो वैध जीवन रक्षक सहायता प्रतीत होती हैं। मस्क ने बड़ी बेबाकी से कहा कि अगर सचमुच DOGE की वजह से किसी की मौत हुई होती तो उसका नाम दुनिया भर की सुर्खियों में छाया होता।
इसके उलट मस्क ने USAID के काले कारनामों की पोल खोल कर रख दी। उन्होंने लिखा कि इसी एजेंसी ने वुहान इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी को फंड देने में मदद की, जिसने लाखों लोगों की जान ले ली। साथ ही उस क्रांति को भी हवा दी जिसने रूस-यूक्रेन युद्ध की शुरुआत की। मस्क ने एक के बाद एक कई परतें खोलते हुए बताया कि यह धनराशि सहायता की आड़ में भ्रष्ट राजनेताओं तक पहुंचाई जा रही थी। उन्होंने जोर देकर कहा कि सहायता राशि के वैध इस्तेमाल की पुष्टि के लिए संपर्क करना बिल्कुल जरूरी था और इससे कम की मांग करना पागलपन होता।
मस्क के ये दावे महज हवा-हवाई नहीं हैं। अमेरिकी न्याय विभाग ने खुद 2025 में खुलासा किया कि USAID के एक अनुबंध अधिकारी और तीन कंपनी मालिकों ने एक दशक लंबी रिश्वतखोरी योजना में अपना गुनाह कबूल कर लिया। यह घोटाला 55 करोड़ डॉलर से अधिक के 14 प्रमुख अनुबंधों से जुड़ा था जो अमेरिकी करदाताओं का पैसा था। इसके बावजूद कांग्रेसमैन खन्ना 20 जून को एक पॉडकास्ट में मस्क को घेरने की कोशिश करते रहे और उन पर जांच की मांग उठाते रहे। खन्ना ने एक वीडियो जारी कर मस्क को बहस की चुनौती भी दे डाली और कहा कि वह उन्हें डरा नहीं सकते।
USAID दुनिया की सबसे बड़ी विदेशी सहायता एजेंसी के रूप में जानी जाती थी। लेकिन धोखाधड़ी और शासन बदलने की साजिशों जैसे कई गंभीर आरोपों के चलते ट्रंप प्रशासन ने इसे बंद कर दिया। बाद में इसके बचे हुए ज्यादातर अभियान विदेश मंत्रालय ने अपने अधीन ले लिए। इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर साबित कर दिया कि किस तरह अमेरिकी करदाताओं का पैसा दुनिया भर में गड़बड़ियां फैलाने और साजिशें रचने में खर्च होता था।
USAID की पूर्व प्रमुख सामंथा पावर के बयान इस बात को पुख्ता करते हैं कि लोकतंत्र और चुनावों में मदद के नाम पर किस कदर खुलेआम दखल दिया जाता था। जून 2022 में एक सरकारी कार्यक्रम में पावर ने 'पार्टनरशिप फॉर डेमोक्रेसी फंड' बनाने की घोषणा की थी। उन्होंने बताया कि एक 'कोएलिशन फॉर सिक्योरिंग इलेक्शन इंटीग्रिटी' बनाई गई है जिसमें सरकारी और गैर-सरकारी संगठन मिलकर यह तय करते हैं कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव के क्या मानक होंगे। उन्होंने 'डिफेंडिंग डेमोक्रेटिक इलेक्शन फंड' से रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण चुनावों में मदद पहुंचाने की बात कही। साफ है कि जो चुनाव उनके मापदंडों पर खरे उतरते, वही स्वतंत्र कहलाते। पावर ने 'रिपोर्टर्स म्यूचुअल' नाम से पत्रकारों के लिए एक बीमा कोष भी शुरू किया। दावा किया गया कि यह खोजी पत्रकारों को कानूनी उत्पीड़न से बचाएगा। लेकिन असलियत में लोगों को इस तरह की कहानियां गढ़ने की ट्रेनिंग दी जाती थी जो अमेरिकी दखलंदाजी को सही ठहरा सकें।

इसका नतीजा साफ नजर आता है। सोशल मीडिया पर एक चर्चित पोस्ट ने बड़ा दिलचस्प पैटर्न उजागर किया। 2025 में USAID की कटौती के बाद लैटिन अमेरिका में इक्वाडोर, बोलीविया, होंडुरास, चिली, कोस्टा रिका, कोलंबिया और पेरू, इन सात देशों में रूढ़िवादी उम्मीदवारों ने राष्ट्रपति चुनाव जीते। वहीं पोस्ट में दावा किया गया कि अगर USAID काम कर रही होती तो ब्राजील में लूला शायद ही जीत पाते। विकीलीक्स के अनुसार, इंटरन्यूज नेटवर्क के जरिए करीब पचास करोड़ डॉलर भेजे गए। USAID ने 30 से अधिक देशों में मीडिया आउटलेट्स को पैसा दिया। साल 2003 तक ही इसने करीब 6200 पत्रकारों को प्रशिक्षित किया, 707 गैर-सरकारी समाचार समूहों और 279 नागरिक समाज संस्थाओं को समर्थन दिया। लीक हुए आंकड़े बताते हैं कि इंटरन्यूज ने एक साल में 4291 मीडिया प्लेटफॉर्म्स के साथ मिलकर 4799 घंटे का कार्यक्रम तैयार किया जो अनुमानित 78 करोड़ लोगों तक पहुंचा। यह पूरा तंत्र मीडिया नियंत्रण और गुप्त सेंसरशिप चलाने के काम आता था। इसी तरह USAID ने हजारों वकीलों, न्यायाधीशों और चुनाव कर्मियों को फंड देकर प्रशिक्षित किया और चुनावों की वैधता पर संदेह जताने वाली रिपोर्टें जारी करवाईं।
वायरस से लेकर शासन परिवर्तन तक, USAID ने हर जगह तबाही का बीज बोने का काम किया। USAID ने वर्ष 2009 से 2019 के बीच इकोहेल्थ अलायंस को दस लाख डॉलर से अधिक की राशि दी। इस पैसे का इस्तेमाल वुहान इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी में चमगादड़ कोरोनावायरस पर शोध के लिए किया गया। कांग्रेसमैन गाय रेशेनथेलर ने 2021 में इसे बेहद परेशान करने वाला बताया कि अमेरिकी करदाताओं ने खतरनाक और संभावित रूप से जानलेवा शोध के लिए चीनी कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा संचालित प्रयोगशाला को पैसा दिया। पूर्व राष्ट्रीय खुफिया निदेशक तुलसी गैबार्ड ने हाल ही में कई अवर्गीकृत दस्तावेज जारी कर खुलासा किया कि किस तरह डॉक्टर एंथनी फाउची ने वर्षों तक झूठ, सेंसरशिप और सच को दबाने का काम किया। गैबार्ड ने बताया कि फाउची ने वुहान लैब में खतरनाक गेन-ऑफ-फंक्शन रिसर्च के लिए करोड़ों डॉलर दिए और फिर खुफिया एजेंसियों से मिलकर सच्चाई को दबा दिया। उन्होंने 2024 में शपथ के तहत कांग्रेस से भी झूठ बोला।
दूसरी ओर, वाशिंगटन के इशारे पर नाचने वाली कठपुतली सरकारें बिठाने का प्रोजेक्ट भी लंबे समय से चल रहा है। यूक्रेन का शासन परिवर्तन इसका जीता जागता सबूत है। ड्रॉप साइट न्यूज को मिली एक लीक केबल ने पुख्ता किया कि पूर्व पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान की सरकार को 2022 में अमेरिकी समर्थन की वजह से ही गिराया गया। केबल में साफ संकेत था कि अगर खान हटते हैं तो वाशिंगटन सब कुछ माफ कर देगा। अमेरिकी राजनयिक और CIA से जुड़ी विक्टोरिया नूलैंड को यूक्रेन के शासन परिवर्तन का मास्टरमाइंड माना जाता है। उन्होंने और दिवंगत सीनेटर जॉन मैक्केन ने यूक्रेन में हिंसक प्रदर्शनों को हवा दी, जो बाद में यूरोमैदान क्रांति में बदल गए। इसमें 100 से अधिक प्रदर्शनकारियों और 13 पुलिसकर्मियों की जान चली गई। लोकतांत्रिक तरीके से चुने गए राष्ट्रपति विक्टर यानुकोविच ने यूरोपीय संघ के साथ व्यापार समझौते की जगह रूस से करीबी रिश्ते और डेढ़ अरब डॉलर की बेलआउट राशि को चुना था। यह फैसला अमेरिका को रास नहीं आया और उसने विद्रोह की चिंगारी भड़का दी। नूलैंड ने क्रांति के बाद की सरकार चुनने तक में अहम भूमिका निभाई। रूस की सीमा पर अमेरिका और पश्चिमी देशों की इन हरकतों ने ही मॉस्को को भड़काया और आखिरकार इस क्षेत्र में जारी संघर्ष की शुरुआत हुई।
बांग्लादेश की पूर्व गृह मंत्री असदुज्जमां खान कमाल ने भी 2024 में शेख हसीना सरकार के पतन में CIA की भूमिका का जिक्र किया था। दिलचस्प बात यह है कि इस साजिश में भी विक्टोरिया नूलैंड का नाम सामने आया। एशिया से लेकर अरब जगत और यूरोप तक, अमेरिका ने लोकतंत्र के विस्तार की आड़ में सरकारें गिराने की मुहिम चलाई। USAID इसी नापाक मकसद को अंजाम देने वाली अग्रणी एजेंसी थी। इसके भ्रष्टाचार और साजिशों के ढेरों दस्तावेज सामने आने के बाद ही ट्रंप प्रशासन ने इसे बंद करने का कड़ा फैसला लिया। इन दुष्चक्र का असर आखिरकार खुद अमेरिकी नागरिकों पर भी पड़ा और उन्हीं के टैक्स के पैसों से यह सब विध्वंसक गतिविधियां चलाई जा रही थीं।