डॉ. बाबासाहेब को 'वामपंथी' साबित करने का प्रयास: विचारों का अपहरण या इतिहास से विश्वासघात?

डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर को मार्क्सवादी विचारधारा से जोड़ने की कोशिशों के बीच उनके लोकतांत्रिक, संवैधानिक और बौद्ध मूल्यों की पड़ताल करता यह विश्लेषण।

The Narrative World    09-Jun-2026
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भारतीय सार्वजनिक जीवन में एक बात बार-बार दिखाई देती है। जिन महापुरुषों के विचार अपने समय से आगे होते हैं, उन्हें बाद के राजनीतिक समूह अपनी-अपनी सुविधा के अनुसार किसी न किसी विचारधारा की चौखट में कैद करने का प्रयास करते हैं। डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर के साथ भी यही हुआ। कुछ लोगों ने उन्हें केवल दलितों के नेता तक सीमित किया, कुछ ने केवल संविधान निर्माता के रूप में प्रस्तुत किया, जबकि हाल के समय में कुछ वामपंथी और अतिवामपंथी विचारक तथा लेखक डॉ. आंबेडकर को 'मार्क्सवादी' या 'वामपंथी क्रांतिकारी' के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास करते दिखाई देते हैं। डॉ. बाबासाहेब के नाम का उपयोग कर अपने हिंसक राजनीतिक एजेंडे को नैतिक वैधता देने का यह प्रयास केवल वैचारिक नहीं, बल्कि इतिहास के साथ किया गया एक खतरनाक खिलवाड़ है।
 
यदि डॉ. बाबासाहेब के संपूर्ण जीवनप्रवास, उनके लेखन, संविधान सभा में दिए गए भाषणों और अंततः उनके द्वारा स्वीकार किए गए बौद्ध धर्म को समझा जाए, तो एक बात अत्यंत स्पष्ट रूप से सामने आती है। डॉ. आंबेडकर कभी भी हिंसक क्रांति के समर्थक नहीं थे। उन्होंने शोषण के विरुद्ध संघर्ष किया, लेकिन वह संघर्ष संसदीय लोकतंत्र, सामाजिक जागरूकता, संगठन और संवैधानिक मार्ग से लड़ा। उन्होंने अन्याय को चुनौती दी, लेकिन कभी हाथ में बंदूक उठाने का आह्वान नहीं किया। इसलिए उन्हें हिंसक वामपंथी विचारधारा की चौखट में फिट करने का प्रयास उनके विचारों का खुला अपहरण कहा जाना चाहिए।
 
आज भारत में स्वयं को 'क्रांतिकारी' कहने वाली अतिवामपंथी विचारधारा का मूल क्या है? उनका मानना है कि लोकतंत्र एक छलावा है, संविधान सत्ताधारियों का उपकरण है और परिवर्तन का एकमात्र मार्ग हिंसक सशस्त्र संघर्ष है। जंगलों में बंदूक उठाकर राज्य के खिलाफ युद्ध छेड़ना, चुनावी प्रक्रिया को नकारना, न्याय व्यवस्था पर अविश्वास जताना और रक्तरंजित संघर्ष को 'जनयुद्ध' कहना, यही उस विचारधारा की प्रमुख विशेषताएँ हैं। आश्चर्य की बात यह है कि इसी प्रवाह के कुछ लोग डॉ. बाबासाहेब को 'अपना' सिद्ध करने का प्रयास करते हैं। लेकिन यह दावा जितना बड़ा है, उतना ही विरोधाभासी भी है।
 
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डॉ. बाबासाहेब का संपूर्ण राजनीतिक जीवन भारतीय लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए समर्पित था। उन्होंने दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र का संविधान तैयार किया। यदि उन्हें हिंसक क्रांति पर विश्वास होता, तो वे संसदीय व्यवस्था, स्वतंत्र न्यायपालिका, मौलिक अधिकार और सार्वभौमिक मताधिकार पर आधारित शासन प्रणाली भारत को नहीं देते। संविधान सभा में उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा था कि सामाजिक और आर्थिक परिवर्तन के लिए "असंवैधानिक मार्ग" अपनाना लोकतंत्र के लिए घातक होगा। यह केवल एक सामान्य चेतावनी नहीं थी, बल्कि भविष्य की हिंसक राजनीति के विरुद्ध दिया गया गंभीर संदेश था।
 
मार्क्सवाद का आधार "वर्ग संघर्ष" और "हिंसक क्रांति" है। मार्क्स के अनुसार शासक वर्ग को हटाने के लिए श्रमिक वर्ग को संघर्ष कर राज्यक्रांति लानी चाहिए। उस प्रक्रिया में "प्रोलेटेरियट की तानाशाही" को एक आवश्यक चरण माना जाता है। डॉ. आंबेडकर को यही विचार स्वीकार नहीं था।
 
क्रांतिकारी वामपंथी विचारधारा कहती है, "राज्य को नष्ट करो", जबकि बाबासाहेब कहते थे, "संविधान को मजबूत करो।" वे मानते हैं कि "सत्ता बंदूक की नली से निकलती है", जबकि बाबासाहेब मतपेटी के माध्यम से परिवर्तन में विश्वास रखते थे। मार्क्सवाद वर्गयुद्ध की बात करता है, जबकि बाबासाहेब बंधुत्व आधारित समाज व्यवस्था की। ये दोनों दृष्टिकोण एक-दूसरे के पूर्णतः विरोध में खड़े हैं। इसलिए डॉ. बाबासाहेब को "वामपंथी क्रांतिकारी" बताने का प्रयास केवल बौद्धिक भ्रम नहीं, बल्कि सुनियोजित वैचारिक दुष्प्रचार है।
 
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वामपंथी विचारक अक्सर यह तर्क देते हैं कि बाबासाहेब ने कार्ल मार्क्स का अध्ययन किया था। यह सत्य है। लेकिन किसी विचारक का अध्ययन करना, उसकी विचारधारा को स्वीकार करना नहीं होता। बाबासाहेब ने मार्क्सवाद का गंभीर अध्ययन किया, लेकिन उसकी कठोर समीक्षा भी की। उन्हें आर्थिक असमानता के विरुद्ध संघर्ष स्वीकार था, लेकिन उस संघर्ष के लिए हिंसा और तानाशाही का मार्ग स्वीकार नहीं था। अपने प्रसिद्ध निबंध "बुद्ध और कार्ल मार्क्स" में उन्होंने स्पष्ट लिखा कि बुद्ध और मार्क्स का लक्ष्य कुछ हद तक समान हो सकता है, लेकिन उनके मार्ग पूर्णतः भिन्न हैं। मार्क्सवाद संघर्ष, हिंसा और दमन की ओर ले जाता है, जबकि बुद्ध का मार्ग करुणा, नैतिकता और स्वतंत्रता की ओर जाता है।
 
यहाँ एक प्रश्न महत्वपूर्ण हो जाता है कि बाबासाहेब ने अंततः कौन-सा मार्ग चुना? उन्होंने मार्क्स नहीं, बल्कि बुद्ध को चुना। यह केवल धार्मिक निर्णय नहीं था, बल्कि एक वैचारिक निर्णय था। क्योंकि जीवन के अंतिम चरण में कोई विचारक जिन मूल्यों को स्वीकार करता है, वही उसके चिंतन का अंतिम स्वरूप होता है। डॉ. बाबासाहेब ने बौद्ध धर्म स्वीकार कर स्पष्ट किया कि समाज परिवर्तन के लिए नैतिक और मानवीय मूल्य आवश्यक हैं। हिंसा समाज को बदल सकती है, लेकिन मनुष्य को नहीं। यह बात वे समझ चुके थे।
 
यही कारण है कि मार्क्सवादी विचारधारा के लिए डॉ. बाबासाहेब के संपूर्ण व्यक्तित्व को स्वीकार करना कठिन हो जाता है। वे उनके विद्रोह की बात करते हैं, लेकिन लोकतंत्र के प्रति उनकी आस्था पर मौन रहते हैं। वे पूंजीवाद पर उनकी आलोचना का उल्लेख करते हैं, लेकिन कम्युनिस्ट विचारधारा और हिंसक क्रांति पर की गई उनकी आलोचना को नजरअंदाज कर देते हैं। वे "संघर्ष" शब्द को आगे रखते हैं, लेकिन उस संघर्ष के संवैधानिक और नैतिक अर्थ को छिपा देते हैं।
 
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बाबासाहेब का स्पष्ट आह्वान था, "शिक्षित बनो, संगठित हो, संघर्ष करो।" लेकिन उन्होंने कभी "शस्त्र उठाओ" नहीं कहा। उनका संघर्ष बौद्धिक, सामाजिक और कानूनी था। महाड़ सत्याग्रह हो, कालाराम मंदिर प्रवेश आंदोलन हो या गोलमेज सम्मेलन में दलित अधिकारों के लिए की गई लड़ाई, हर जगह उन्होंने लोगों को जागरूक किया, संगठित किया और संवैधानिक मार्ग से संघर्ष खड़ा किया। उनके आंदोलन में आक्रोश था, लेकिन घृणा नहीं। उनमें विद्रोह था, लेकिन अराजकता नहीं। वे व्यवस्था बदलना चाहते थे, लेकिन समाज को जलाकर नहीं, बल्कि समाज का पुनर्गठन करके।
 
इसके विपरीत यदि हिंसक वामपंथी आंदोलनों का इतिहास देखा जाए, तो वहाँ हिंसा ही दिखाई देती है। पुलिसकर्मी, आदिवासी, शिक्षक, ग्रामीण और विकास कार्यों में लगे अनेक निर्दोष लोग इस हिंसा के शिकार बने। लोकतंत्र पर विश्वास न होने के कारण उन्होंने बंदूक को ही संवाद का माध्यम बना लिया। इसलिए डॉ. बाबासाहेब के नाम का उपयोग कर ऐसी हिंसक विचारधारा को वैचारिक वैधता देना और भी खतरनाक हो जाता है।
 
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वामपंथी विचारधारा के लिए सबसे असहज करने वाली बात डॉ. बाबासाहेब का धर्म के प्रति दृष्टिकोण है। मार्क्सवाद धर्म को "जनता की अफीम" मानता है। लेकिन बाबासाहेब ने धर्म को पूर्णतः नकारा नहीं, बल्कि अन्यायी धार्मिक व्यवस्था को नकारा। उन्हें ऐसा धर्म चाहिए था जो मनुष्य को सम्मान, नैतिकता और समानता दे। इसलिए उन्होंने अंततः बौद्ध धर्म स्वीकार किया। नागपुर की दीक्षाभूमि पर हुआ सामूहिक बौद्ध धर्मांतरण भारतीय इतिहास का सबसे बड़ा शांतिपूर्ण सामाजिक विद्रोह था। लाखों लोगों ने बिना एक भी गोली चले, बिना किसी हिंसक आंदोलन के अपनी सांस्कृतिक पहचान बदली। यह घटना स्वयं सिद्ध करती है कि व्यापक सामाजिक परिवर्तन हिंसा के बिना भी संभव है।
 
आज डॉ. बाबासाहेब का नाम लेने वाले अनेक समूह उनके विचारों के चुनिंदा हिस्सों का उपयोग करते हैं। कुछ को उनमें केवल विद्रोह दिखाई देता है, कुछ को केवल सामाजिक न्याय, तो कुछ को केवल संविधान। लेकिन बाबासाहेब इन सब सीमाओं से कहीं बड़े थे। वे विद्रोही थे, लेकिन राष्ट्रविरोधी नहीं। वे क्रांतिकारी थे, लेकिन अराजकतावादी नहीं। वे परिवर्तनवादी थे, लेकिन तानाशाहीवादी नहीं। उन्होंने समाज के अन्याय पर कठोर प्रहार किया, लेकिन लोकतंत्र के प्रति अपनी आस्था कभी नहीं छोड़ी।
 
 
वास्तव में डॉ. बाबासाहेब का पूरा राजनीतिक चिंतन "संवैधानिक क्रांति" की अवधारणा पर आधारित था। उन्होंने वंचितों के हाथ में हथियार नहीं, संविधान दिया। उन्होंने घृणा नहीं सिखाई, बल्कि स्वाभिमान सिखाया। उन्होंने समाज में गृहयुद्ध पैदा करने का प्रयास नहीं किया, बल्कि समानता आधारित लोकतांत्रिक समाज निर्माण का मार्ग दिखाया।
 
इसलिए बाबासाहेब को मार्क्सवादी या हिंसक वामपंथी विचारधारा का प्रतीक बनाकर प्रस्तुत करना उनकी वैचारिक विरासत के साथ अन्याय है। यदि उन्हें वास्तव में समझना है, तो जंगलों में गूंजती बंदूकों की आवाज में नहीं, बल्कि संसद की लोकतांत्रिक बहसों में, भारतीय संविधान की प्रस्तावना में और बुद्ध के करुणामय धर्म में उनका दर्शन करना होगा। क्योंकि बाबासाहेब की क्रांति विनाश की नहीं, नवसृजन की थी। वह रक्त की नहीं, विचारों की थी। और सबसे महत्वपूर्ण, वह बंदूक की नहीं, संविधान की थी।
 
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आज के भारत में जब वैचारिक संघर्ष और अधिक तीव्र होता जा रहा है, तब बाबासाहेब का नाम कई राजनीतिक धाराओं के लिए नैतिक कवच बन गया है। क्योंकि आंबेडकर केवल एक समाज के नेता नहीं, बल्कि आधुनिक भारत के लोकतांत्रिक विवेक के प्रतीक हैं। इसलिए हर विचारधारा उन्हें अपनी तरफ खड़ा दिखाने की कोशिश करती है। लेकिन इतिहास को टुकड़ों में बाँटकर नहीं समझा जा सकता। बाबासाहेब के विचारों को उनकी संपूर्णता में समझना आवश्यक है। उसमें सामाजिक न्याय है, लेकिन संवैधानिकता भी है; विद्रोह है, लेकिन संयम भी है; परिवर्तन की ज्वाला है, लेकिन लोकतांत्रिक मर्यादा भी है।
 
डॉ. बाबासाहेब को समझने के लिए उनके शब्दों के साथ-साथ उनके कर्मों को देखना भी आवश्यक है। उन्होंने जीवनभर बहिष्कृत, वंचित और शोषित समाज को संघर्ष की प्रेरणा दी, लेकिन उस संघर्ष को हमेशा बौद्धिक और नैतिक आधार दिया। उन्होंने लोगों को केवल आक्रोश नहीं दिया, बल्कि स्वाभिमान दिया। उन्होंने प्रतिशोध नहीं सिखाया, बल्कि अधिकारों के प्रति जागरूक किया। इसलिए उनका आंदोलन समाज को तोड़ने वाला नहीं, बल्कि नए मूल्यों पर उसका पुनर्निर्माण करने वाला था।
 
 
आज जब कुछ विचारधाराएँ डॉ. बाबासाहेब के नाम पर हिंसक, अराजकवादी या राष्ट्रविरोधी राजनीति को वैचारिक समर्थन देने का प्रयास करती हैं, तब बाबासाहेब के मूल विचारों को याद करना और भी आवश्यक हो जाता है। क्योंकि उन्होंने स्पष्ट कहा था कि लोकतंत्र केवल मतदान की पद्धति नहीं, बल्कि एक सामाजिक संस्कृति है। समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व के बिना लोकतंत्र टिक नहीं सकता। इसलिए उन्होंने संविधान को केवल कानून का दस्तावेज नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन का साधन माना।
 
डॉ. बाबासाहेब की सबसे बड़ी शक्ति यहीं दिखाई देती है। उन्होंने वंचितों के हाथ में पत्थर नहीं, विचार दिए; बंदूक नहीं, मतदान का अधिकार दिया; अराजकता नहीं, संविधान दिया। इसलिए उन्हें किसी भी चरमपंथी विचारधारा की चौखट में कैद करने का प्रयास उनके व्यक्तित्व का अपमान है। डॉ. बाबासाहेब किसी एक विचारधारा के नहीं थे; वे लोकतांत्रिक भारत के विवेक के शिल्पकार थे।
 
 
और इसलिए आज भी उनका संदेश उतना ही स्पष्ट सुनाई देता है। यदि परिवर्तन चाहिए, तो समाज को जलाओ मत, समाज को जागृत करो। संघर्ष करो, लेकिन संविधान की चौखट में रहकर। विद्रोह करो, लेकिन मानवता का हाथ मत छोड़ो। क्योंकि डॉ. बाबासाहेब की क्रांति सत्ता परिवर्तन के लिए नहीं, बल्कि मनुष्य परिवर्तन के लिए थी।
 
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संजयसिंह ठाकुर
नक्सल विषयक अध्ययनकर्ता, नागपुर