भारत और इंडोनेशिया ने मंगलवार को रक्षा, रणनीतिक सहयोग, क्रिटिकल मिनरल्स और सबांग पोर्ट विकास से जुड़े अहम समझौतों पर हस्ताक्षर किए। इन फैसलों ने भारत के रक्षा निर्यात और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में उसकी रणनीतिक भूमिका को नई मजबूती दी।
भारत लगातार रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता बढ़ाने के साथ वैश्विक बाजार में अपनी मौजूदगी भी मजबूत कर रहा है। इंडोनेशिया के साथ हुए ताजा समझौते इसी दिशा में बड़ा कदम माने जा रहे हैं। ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल की अतिरिक्त खरीद, अस्त्र Mk-1 एयर-टू-एयर मिसाइल का निर्यात, क्रिटिकल मिनरल्स में साझेदारी और सबांग पोर्ट के संयुक्त विकास जैसे फैसलों ने दोनों देशों के रिश्तों को नई ऊंचाई दी है।
ये समझौते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और इंडोनेशिया के राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियांतो के बीच हुई द्विपक्षीय वार्ता के बाद हुए। रक्षा सहयोग पर दोनों देशों के बीच लंबे समय से बातचीत चल रही थी। अब दोनों सरकारों ने इसे ठोस समझौतों में बदल दिया है।
सबसे अहम निर्णय ब्रह्मोस मिसाइल को लेकर सामने आया। इंडोनेशिया इसी वर्ष एक ब्रह्मोस बैटरी खरीदने का अनुबंध कर चुका है। अब नए समझौते के तहत वह चरणबद्ध तरीके से अतिरिक्त ब्रह्मोस सिस्टम भी खरीदेगा। इससे भारत के रक्षा निर्यात को नई गति मिलने की उम्मीद है। भारत पहले ही रक्षा उपकरणों के निर्यात को बढ़ाने पर जोर दे रहा है और ब्रह्मोस उसकी सबसे सफल स्वदेशी रक्षा प्रणालियों में शामिल है।
दोनों देशों ने इंडोनेशिया की वायुसेना के 16 Su-30 लड़ाकू विमानों के लिए अस्त्र Mk-1 बियॉन्ड-विजुअल-रेंज एयर-टू-एयर मिसाइल खरीदने पर भी सहमति बनाई। सरकारी कंपनी भारत डायनेमिक्स लिमिटेड इस मिसाइल को इंडोनेशिया के विमानों के साथ एकीकृत करेगी। अस्त्र Mk-1 पहले से भारतीय वायुसेना की ताकत बढ़ा रही है। यह सॉलिड रॉकेट मोटर से संचालित मिसाइल है और लगभग 80 से 110 किलोमीटर तक लक्ष्य को निशाना बना सकती है।
भारत इससे भी अधिक क्षमता वाली अस्त्र Mk-2 मिसाइल पर तेजी से काम कर रहा है। इसकी अनुमानित मारक क्षमता करीब 160 किलोमीटर होगी। पिछले वर्ष रक्षा अधिग्रहण परिषद ने भारतीय वायुसेना के लिए अस्त्र Mk-2 खरीदने के प्रस्ताव को मंजूरी दी थी। इससे साफ संकेत मिलता है कि भारत केवल अपनी सैन्य क्षमता नहीं बढ़ा रहा, बल्कि आधुनिक रक्षा तकनीक के निर्यातक के रूप में भी आगे बढ़ रहा है।
बैठक में क्रिटिकल मिनरल्स सप्लाई चेन पर भी महत्वपूर्ण सहमति बनी। भारत इंडोनेशिया में स्टील, निकेल और रेयर-अर्थ परमानेंट मैग्नेट के निर्माण में निवेश करेगा। निकेल और रेयर-अर्थ जैसे खनिज आधुनिक रक्षा उपकरणों, इलेक्ट्रिक वाहनों और हाई-टेक उद्योगों के लिए बेहद जरूरी माने जाते हैं। इस क्षेत्र में अभी चीन का मजबूत प्रभाव है। ऐसे में भारत और इंडोनेशिया की साझेदारी आपूर्ति श्रृंखला को अधिक भरोसेमंद और विविध बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण मानी जा रही है। दोनों देश निकेल प्रोसेसिंग के लिए संयुक्त परियोजनाओं की संभावनाएं भी तलाशेंगे।
रणनीतिक दृष्टि से सबांग पोर्ट का संयुक्त विकास भी बेहद अहम फैसला साबित हो सकता है। यह बंदरगाह इंडोनेशिया के सुमात्रा द्वीप के उत्तरी छोर पर मलक्का जलडमरूमध्य के प्रवेश द्वार के पास स्थित है। यह भारत के प्रस्तावित ग्रेट निकोबार ट्रांस-शिपमेंट पोर्ट से लगभग 160 किलोमीटर दूर है। मलक्का जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे व्यस्त समुद्री मार्गों में शामिल है और वैश्विक व्यापार तथा ऊर्जा आपूर्ति का बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है।
सरकारी सूत्रों के अनुसार, सबांग पोर्ट भारत की इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में समुद्री पहुंच और रणनीतिक मौजूदगी को मजबूत करेगा। यह गहरे पानी का बंदरगाह है, जहां पनडुब्बियों सहित विभिन्न प्रकार के नौसैनिक जहाज आसानी से आ सकते हैं। इससे समुद्री सुरक्षा और क्षेत्रीय सहयोग दोनों को बढ़ावा मिलेगा।
भारत और इंडोनेशिया ने वर्ष 2018 में अपने संबंधों को व्यापक रणनीतिक साझेदारी का दर्जा दिया था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इंडोनेशिया यात्रा के दौरान दोनों देशों ने इस दिशा में कई पहल शुरू की थीं। इसके बाद सबांग और आसपास के बंदरगाह ढांचे के विकास के लिए संयुक्त टास्क फोर्स बनाई गई। साथ ही अंडमान और निकोबार द्वीप समूह तथा इंडोनेशिया के आचेह प्रांत और सुमात्रा के अन्य क्षेत्रों के बीच संपर्क बढ़ाने पर भी काम शुरू हुआ। अब नए समझौतों ने उस साझेदारी को और मजबूत आधार दे दिया है। इससे भारत के रक्षा निर्यात, सामरिक प्रभाव और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में उसकी भूमिका को आने वाले वर्षों में और अधिक मजबूती मिलने की संभावना है।