असम हर वर्ष मानसून के मौसम में बाढ़ की परेशानी झेलता है, लेकिन वर्तमान वर्ष की बाढ़ ने बीते कई दशकों के रिकॉर्ड तोड़ दिया। ब्रह्मपुत्र और उसकी सहायक नदियों के उफान, नागालैंड की पहाड़ियों में बादल फटने और लगातार भारी बारिश ने ऊपरी असम के बड़े हिस्से को जलमग्न कर दिया।
शिवसागर, चराइदेव, गोलाघाट, जोरहाट, नागांव, धेमाजी और कामरूप मेट्रोपॉलिटन जैसे जिलों में हालात बेहद गंभीर बने है। लेकिन इस बड़ी आपदा के बीच एक महत्पूर्ण बात सामने आई है, स्थानीय लोगों की मानवता के विचार ने सभी प्रकार के भेदों व समुदाय विशेष के रोध व भेद-भाव को नष्ट कर दिया और समाज सिर्फ एक-दूसरे की सहायता के लिए अग्रेसर हुआ।
आपदा में भारी नुकसान
असम राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (ASDMA) के अनुसार, जुलाई 2026 में आई इस बाढ़ ने राज्य में भारी तबाही मचाई।
कुछ ही हफ्तों के भीतर मरने वालों की संख्या 80 के पार पहुंच गई और लगभग 3 लाख से अधिक लोग सीधे तौर पर प्रभावित हुए। चराइदेव जिला सबसे ज्यादा प्रभावित रहा, जहां करीब 1.9 लाख से अधिक लोग बाढ़ की चपेट में आए, उसके बाद शिवसागर और जोरहाट का नंबर रहा।
बाढ़ ने 21 राजस्व सर्किलों के 550 से अधिक गांवों को अपनी चपेट में ले लिया और हजारों हेक्टेयर खेती की जमीन जलमग्न हो गई। हजारों घर पानी में डूब गए, सड़कें और पुल क्षतिग्रस्त हो गए, और रेल सेवाएं भी बाधित हुईं।
कई परिवारों ने अपने पशुधन खो दिए और खेतों में जमे कीचड़ ने आजीविका को बुरी तरह प्रभावित किया। इस बार बाढ़ ने चाय उद्योग को भी बुरी तरह प्रभावित किया।
टी एसोसिएशन ऑफ इंडिया (TAI) के असम प्रभाग के अनुसार, शिवसागर जिले के नाजिरा उपमंडल का चाय बेल्ट सबसे ज्यादा प्रभावित हुआ, जहां नागालैंड से आने वाली नदियों का जलस्तर खतरे के निशान से ऊपर पहुंच गया। डोरिका नदी के तटबंध में हुए कटाव ने स्थिति को और बिगाड़ दिया, जिससे नाजिरा क्षेत्र के चाय बागान पूरी तरह जलमग्न हो गए।
मानवता की मिसाल
इस भीषण आपदा के दौरान असम के हर कोने से लोग एकजुट होकर मदद के लिए आगे आए। छात्र संगठनों, युवा समूहों, स्थानीय क्लबों, धार्मिक संस्थानों, पत्रकारों, पशु कल्याण समूहों, व्यवसायों और अनगिनत आम नागरिकों ने अपने वाहनों में चावल, पीने का पानी, बच्चों का आहार, दवाइयां, कपड़े, कंबल और अन्य जरूरी सामान भरकर ऊपरी असम की ओर रुख किया।
इस मुश्किल घड़ी में पीड़ितों के सामने धर्म, जाति और समुदाय जैसी तमाम पहचानें अप्रासंगिक हो गईं। अंततः जो सबसे ऊपर रहा, वह केवल मानवता थी।
सोशल मीडिया इस आपदा में एक जीवनरेखा साबित हुआ। हजारों लोगों ने इसका इस्तेमाल फंसे हुए परिवारों की पहचान करने, जरूरतों की पुष्टि करने, चंदा जुटाने, सेवकों का समन्वय करने और जरूरतमंदों को मदद देने वालों से जोड़ने के लिए किया।
राहत कार्यों में बढ़े संगठनों ने भी असम बाढ़ पीड़ितों की आर्थिक सहायता के लिए हाथ बढ़ाया। यह इस बात का प्रमाण है कि आपदा की घड़ी में असम के विभिन्न समुदाय, चाहे वे किसी भी धर्म या जनजाति से जुड़े क्यों न हों, मुश्किल वक़्त में सब एक साथ खड़े नज़र आये और यही भावना असम की सामाजिक बुनावट को मजबूत बनाती है, जहां संकट के समय सामुदायिक सीमाएं धुंधली पड़ गयी थी।
शिवसागर जिला – स्थानीय मंदिर: कई स्थानीय मंदिरों ने बाढ़ प्रभावित परिवारों के लिए सामुदायिक रसोई (लंगर) चलाकर भोजन उपलब्ध कराया।
तिनसुकिया – गुरुद्वारा समिति: स्वयंसेवकों ने नावों और वाहनों के माध्यम से भोजन के पैकेट, पीने का पानी और आवश्यक वस्तुएँ बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों तक पहुँचाईं।
शिवसागर – स्थानीय समिति ने घरो को राहत शिविर में बदल दिया, जहाँ बाढ़ प्रभावित परिवारों को आश्रय तथा प्रतिदिन भोजन उपलब्ध कराया गया।
धुबरी से शिवसागर – धुबरी के सामाजिक कार्यकर्ताओं का एक दल लगभग 640 किमी की यात्रा कर शिवसागर पहुँचा और बाढ़ प्रभावित परिवारों में खाद्य सामग्री व अन्य आवश्यक वस्तुओं का वितरण किया।
डिब्रूगढ़ – गुरुद्वारा श्री गुरु सिंह सभा: गुरुद्वारा प्रबंधन समिति और स्थानीय सिख समुदाय ने बाढ़ पीड़ितों के लिए लंगर, पेयजल और राहत सामग्री वितरित की।
स्थानीय युवा क्लब और स्वयंसेवक (शिवसागर, चराईदेव, जोरहाट): युवाओं ने सामूहिक रूप से राहत सामग्री एकत्र कर दूर-दराज़ के गाँवों तक पहुँचाई तथा बचाव कार्यों में प्रशासन की सहायता की।
स्थानीय ग्रामीणों की पहल: कई गाँवों में लोगों ने अपने घर, स्कूल और सामुदायिक भवन बाढ़ प्रभावित परिवारों के लिए अस्थायी आश्रय के रूप में खोल दिए तथा सामूहिक रूप से भोजन तैयार कर वितरित किया।
हालांकि यह ध्यान रखना जरूरी है कि सोशल मीडिया पर बाढ़ या किसी भी आपदा के दौरान कई बार भावनात्मक लेकिन असत्यापित कहानियां तेजी से वायरल हो जाती हैं। किसी विशेष व्यक्ति या समुदाय के 'हीरो' होने की कहानियां अक्सर बिना ठोस स्रोत के प्रचारित होती हैं, जो कई बार सांप्रदायिक रंग भी ले लेती हैं। ऐसी किसी भी कहानी को आगे बढ़ाने या प्रकाशित करने से पहले उसकी सत्यता की पुष्टि स्थानीय प्रशासन, प्रामाणिक समाचार माध्यमों या पुलिस रिकॉर्ड से करना जरूरी है, ताकि गलत सूचना न फैले।
बाढ़ के बीच वन्यजीवों को बचाने का प्रयास
असम की बाढ़ केवल व्यक्तियों तक सीमित नहीं रही। शिवसागर से सामने आई, एक वीडियो में एक व्यक्ति बाढ़ की तेज बहाव में फसी एक गाय को बचाने की कोशिश करते देखा गया, जो सोशल मीडिया पर व्यापक रूप से साझा हुआ। इसके अलावा, काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान में बाढ़ से वन्यजीवों के लिए गंभीर खतरा उत्पन्न हो गया, जिसके चलते वन विभाग की टीमों ने कई जानवरों को सुरक्षित स्थानों तक पहुंचाने के प्रयास किए।
समस्या
विशेषज्ञों का मानना है कि असम में हर साल आने वाली बाढ़ केवल प्राकृतिक आपदा नहीं, बल्कि वर्षों से चली आ रही प्रबंधन की खामियों का नतीजा भी है। तटबंधों का कमजोर रखरखाव, नदियों में बढ़ता गाद जमाव, अनियोजित निर्माण और जलवायु परिवर्तन के कारण अनियमित बारिश, यह सब मिलकर असम को हर मानसून में एक जैसी त्रासदी की ओर धकेल दिया है।
आलोचकों का कहना है कि बाढ़ प्रबंधन को लेकर सरकार की विभिन्न योजनाओं और घोषणाओं के प्रभाव का स्वतंत्र मूल्यांकन होना चाहिए, ताकि भविष्य में इस तरह की तबाही को कम किया जा सके।
आपदा में उम्मीद की किरण
असम की बाढ़ ने राज्य को भारी मानवीय और आर्थिक क्षति पहुंचाई है, लेकिन इस त्रासदी के बीच जो सबसे उल्लेखनीय बात सामने आई, वह है आम लोगों, सुरक्षा बलों और विभिन्न समुदायों के बीच एकजुटता। सेना और NDRF के जवानों का साहस, पुलिसकर्मियों का बलिदान, और अलग-अलग समुदायों के स्थानीय लोगों का एक-दूसरे की मदद के लिए आगे आना, यह सब दिखाता है कि विपदा की घड़ी में मानवता हर सीमा से ऊपर उठ जाती है।
साथ ही, यह भी जरूरी है कि हम ऐसी आपदाओं के दौरान फैलने वाली सूचनाओं की सत्यता परखें, ताकि भावनात्मक लेकिन असत्यापित कहानियां समाज में गलतफहमी या तनाव का कारण न बनें। वीरता मानवता और समाज की सेवा में निहित है, और असम इसका जीवंत उदाहरण है।
लेखक परिचय:
हेमेन्द्र शर्मा
शोध कार्य व सामाजिक समसामयिक विश्लेषक
उत्तर-पूर्व अध्ययन केंद्र, नई दिल्ली