
महाराष्ट्र के पालघर जिले के डहाणू और जव्हार क्षेत्र में जनजातीय अधिकारों, भूमि, जंगल और स्थानीय स्वशासन के मुद्दों पर सक्रिय काश्तकारी संगठन की कहानी केवल एक कथित सामाजिक संगठन की कहानी नहीं है।
इसके संस्थापक पीटर डी’मेलो उर्फ़ प्रदीप प्रभु की राजनीतिक और वैचारिक यात्रा, संगठन की शुरुआती कार्यपद्धति, वामपंथी समूहों के साथ उसके संबंध और पिछले कई दशकों में बने व्यापक नेटवर्क को साथ रखकर देखने पर एक ऐसा परिदृश्य सामने आता है, जिसमें जनजाति अधिकारों की राजनीति, वामपंथी विचारधारा, ईसाई नेटवर्क और कट्टर वामपंथी संगठनों से संपर्क एक दूसरे से जुड़ते दिखाई देते हैं।

काश्तकारी संगठन की स्थापना 1978 में महाराष्ट्र के तत्कालीन ठाणे जिले के जनजाति बाहुल्य क्षेत्र में हुई। संगठन के उपलब्ध क्षेत्रीय जानकारी के अनुसार, इसके गठन की जमीन 1976 में तैयार होनी शुरू हुई, जब पीटर डी'मेलो नामक जेसुइट पादरी ईसाई मिशन के अंतर्गत काम करने डहाणू पहुँचा। उसका मूल उद्देश्य स्थानीय जनजातीय समाज को कन्वर्ट कर ईसाई बनाना था लेकिन बाहरी तौर पर उसने दिखाया कि वह स्थानीय भूमिहीन वनवासियों को संगठित कर उनके अधिकारों के लिए आंदोलन खड़ा करने आया है।
उसने जनजाति युवाओं को कन्वर्ट कर पहले उन्हें ईसाई बनाया और फिर अपने एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए लगातार प्रशिक्षण और युवा शिविर आयोजित कर 23 दिसंबर 1978 को काश्तकारी संगठन का औपचारिक गठन किया।

यहीं से इस संगठन की कहानी का पहला महत्वपूर्ण अध्याय शुरू होता है। पीटर डी'मेलो ने स्थानीय लोगों और मीडिया को भ्रम में डालने के लिए वर्ष 1978 में प्रदीप प्रभु नाम अपनाया। इस बीच काश्तकारी संगठन की आड़ में पीटर उर्फ़ प्रदीप स्थानीय जनजातियों को संगठित करना, उन्हें अपने विचारों में ढालना और स्थापित लोकतांत्रिक सत्ता के विरुद्ध राजनीतिक लामबंदी करने में लगाने लगा।
वहीं काश्तकारी संगठन की गतिविधियों को Liberation Theology यानी मुक्ति धर्मशास्त्र से प्रभावित बताया गया है। कम्युनिस्ट ईसाइयों ने इसे ग़रीब एवं वंचित समूहों के बीच इसाइयत फैलाने के लिए बनाया था, जिसमें संघर्ष के माध्यम से इसाइयत से जुड़ने की बात कही थी। इसने कैथोलिक परंपराओं और मार्क्सवादी आर्थिक चिंतन के बीच एक वैचारिक संवाद विकसित किया था। पीटर उर्फ़ प्रदीप की गतिविधियाँ इससे काफ़ी मिलती थीं, जो ख़ुद ईसाई मिशनरियों के लिए काम करता था।

वहीं काश्तकारी संगठन के नेताओं पर जनजातियों को वन विभाग और पुलिस के विरुद्ध आक्रामक रुख अपनाने के लिए प्रेरित करने के आरोप भी दर्ज हैं। काश्तकारी संगठन के प्रभाव वाले क्षेत्रों में वन अधिकारियों और काश्तकारी संगठन के समर्थकों के बीच कई टकराव हुए तथा संगठन की बैठकों में पुलिस और सरकारी अधिकारियों को वर्ग शत्रु के रूप में देखने की भाषा इस्तेमाल की जाती थी, जो कि कम्युनिस्ट विचार का आधार है।
काश्तकारी संगठन के इतिहास का सबसे दिलचस्प विरोधाभास उसका कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सवादी) के साथ संबंध है। डहाणू क्षेत्र पहले से ही कम्युनिस्ट राजनीति का मजबूत आधार रहा है। 1940 के दशक से श्यामराव परुलेकर और बाद में गोदावरी परुलेकर ने इस क्षेत्र में जनजाति किसानों और मजदूरों को कम्युनिस्ट विचारधार में जोड़ने का प्रयास किया और 1964 में कम्युनिस्ट पार्टी के विभाजन के बाद गोदावरी परुलेकर सीपीएम के साथ चली गईं। इस कारण डहाणू जव्हार क्षेत्र सीपीएम का मजबूत गढ़ बना रहा।
इसके बाद 1980 के चुनाव में काश्तकारी संगठन ने सीपीएम उम्मीदवार का समर्थन भी किया। इसके बाद दोनों के संबंध फिर खराब हुए और 1983 में डहाणू के खोरीपाड़ा में दोनों पक्षों के संघर्ष के दौरान पुलिस फायरिंग में एक सीपीएम कार्यकर्ता की मौत भी हुई।

लेकिन आज डहाणू की राजनीतिक तस्वीर में काश्तकारी संगठन और वाम राजनीति के बीच निकटता दिखाई देती है। और यही वह बिंदु है जहां पीटर उर्फ़ प्रदीप का नेटवर्क और अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है। पीटर उर्फ़ प्रदीप के विभिन्न सीपीआई (एमएल) समूहों के नेताओं से संबंधों और कुछ माओवादी नेताओं से कथित संपर्कों का दावा भी कई बार सामने आ चुका है। इसमें गणपति, वरवर राव, के. एन. रामचंद्रन और संजय सिंहवी जैसे नामों का उल्लेख है।
वहीं पीटर उर्फ़ प्रदीप का नेटवर्क केवल महाराष्ट्र तक सीमित नहीं रहा। उसे वामपंथियों के तमाम आंदोलन जैसे नर्मदा बचाओ आंदोलन, भारत जन आंदोलन, नेशनल एलायंस ऑफ पीपुल्स मूवमेंट्स, आदिवासी एकता परिषद और अन्य कम्युनिस्ट आंदोलनों में देखा गया है।

इसके अलावा इसका नाम वामपंथियों के फ़्रंटल संगठनों से भी जुड़ा दिखाई देता है, जिसमें भारतीय सामाजिक संस्थान, पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज, ह्यूमन राइट्स लॉ नेटवर्क, सेंटर फॉर सोशल जस्टिस, फॉरेस्ट पीपल्स प्रोग्राम जैसे नाम हैं।

बात यह नहीं है कि काश्तकारी संगठन या पीटर उर्फ़ प्रदीप जैसे लोग जनजाति क्षेत्रों में संस्थान चला रहे हैं। बात यह है कि इनके द्वारा क्षेत्र में व्यापक स्तर पर कन्वर्ज़न किया जा रहा है, पालघर में साधुओं की हत्या के समय भी इनके संगठन का नाम सामने आया था, इस क्षेत्र में विकास के लगभग सभी कार्यों का ये विरोध करते हैं चाहे वो डहाणू ताप विद्युत परियोजना, वधावन बंदरगाह और मरौली बंदरगाह हो, और तो और माओवादियों के साथ सम्पर्क-सम्बंध एवं फ़्रंटल संगठनों के साथ मिलकर रणनीति बनाने में भी इनका नाम आ चुका है।