
हाल ही में माओवादी आतंकी माड़वी हिड़मा के मुठभेड़ में मारे जाने के बाद सोशल मीडिया में बहस शुरू हो चुकी है। इसी दौरान वामपंथी प्रोपेगेंडा मीडिया समूह 'द वायर’ ने एक लेख प्रकाशित किया, जिसमें बस्तर के ऐतिहासिक आंदोलनों और “जल-जंगल-जमीन” की लड़ाई के संदर्भ में माओवाद को एक लंबी परंपरा का हिस्सा दिखाने की कोशिश की गई, जो सच्चाई से कोसों दूर है।

वर्तमान स्थिति यह है कि छत्तीसगढ़ में माओवादी-नक्सलवादी प्रभाव अपने सबसे कमजोर दौर में है। ऐसे समय में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि एक मीडिया बार-बार उसी नैरेटिव को क्यों आगे बढ़ा रहा है, जिसे सुरक्षा एजेंसियां “अर्बन नक्सल ढांचा” मानती हैं।
दरअसल हिड़मा की मौत के बाद 'द वायर' ने अपने लिखे लेख की शुरुआत हिड़मा की दो छवियाँ गढ़ते हुए की है, जिसमें उसे एक ओर खूंखार माओवादी कमांडर और दूसरी ओर “आदिवासी नायक” बताया गया है। 'द वायर' का लेख में मौजूद यह द्वंद्व एक सामान्य पाठक के मन में सहानुभूति और असमंजस पैदा करता है।
जबकि देखा जाए तो, हिड़मा, जो सुरक्षा बलों पर कई बड़े हमलों और अनेक जवानों की हत्या के मामलों में प्रमुख आरोपी रहा, उसकी हिंसा और निर्दयता का उल्लेख 'द वायर' के लेख में लगभग अनुपस्थित है। इसके बजाय यह दावा किया गया है कि “जनजातीय समाज का एक हिस्सा उसे नायक मानता है”, लेकिन यह दावा ना किसी सर्वे से पुष्ट है, न किसी विश्वसनीय स्रोत से।
'द वायर' के इस लेख का यही शुरुआती ढाँचा माओवादी हिंसा को रोमानी प्रतिरोध के रूप में पेश करने की कोशिश का संकेत देता है।

इस लेख में बस्तर में सुरक्षा बलों के कैंपों का चित्रण भी एकतरफ़ा दिखाई देता है। इन्हें बार-बार “राज्य नियंत्रण के प्रतीक” के रूप में लिखा गया है, जबकि सच्चाई यह है कि इन्हीं कैंपों की मौजूदगी से सैकड़ों गांव पहली बार सड़क, स्वास्थ्य सेवा, शिक्षा, मोबाइल नेटवर्क और बैंकिंग सुविधाओं से जुड़ पाए हैं।

बीते कुछ वर्षों के बीच बस्तर के सुदूर क्षेत्रों में जो विकास हुआ, वह केंद्र और राज्य के सुरक्षा कवच के बिना संभव नहीं था। लेकिन 'द वायर' की कहानी में इन तथ्यों की कहीं जगह नहीं मिली। यह भी नहीं बताया गया कि कई गांवों में कैंपों के विरुद्ध दिखे विरोध में माओवादी धमकियों और दबाव की भूमिका अक्सर सामने आती रही है।
खनन परियोजनाओं पर 'द वायर' के लेख ने व्यापक टिप्पणी की, परन्तु तथ्य आधे-अधूरे प्रस्तुत किए। राज्य और केंद्र सरकार द्वारा स्वीकृत परियोजनाओं से स्थानीय जनजातीय युवाओं को मिलने वाले रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य से जुड़े लाभों को नजरअंदाज कर दिया गया।
बैलाडीला और आसपास के क्षेत्रों में वर्षों से चल रही CSR गतिविधियाँ और स्थानीय समुदाय में हुए सुधार भी इस लेख में कहीं नहीं दिखाई देते। गढ़चिरौली का उदाहरण देते हुए कहा गया कि “माओवाद घटने के बाद खनन बढ़ा”, लेकिन यह नहीं बताया गया कि माओवादी हिंसा के कारण ही वहां लंबे समय तक विकास ठप पड़ा रहा और सैकड़ों वनवासी हिंसा की भेंट चढ़ते गए।

लेख का सबसे बड़ा वैचारिक हस्तक्षेप तब दिखता है जब ब्रिटिश शासन के खिलाफ हुए ऐतिहासिक वनवासी विद्रोहों (हल्बा विद्रोह, मुरिया विद्रोह और भूमकाल) को आधुनिक माओवादी-नक्सली हिंसा की “ऐतिहासिक निरंतरता” के रूप में पेश किया गया।
गुंडाधूर और गेंदसिंह जैसे नेताओं ने दमनकारी औपनिवेशिक शासन के खिलाफ संघर्ष किया था, वे किसी बाहरी विचारधारा के वाहक नहीं थे। इन आंदोलनों को माओवादी-नक्सली हिंसा की वैचारिक जड़ों से जोड़ना न केवल ऐतिहासिक त्रुटि है बल्कि जनजातीय समाज की सांस्कृतिक चेतना की भी गलत व्याख्या है।

मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और राज्य के बीच संघर्ष को भी 'द वायर' ने अपने लेख में चयनात्मक ढंग से प्रस्तुत किया गया। कई मामलों में जहां अदालतों ने स्पष्ट मत दिया या जहां संगठनों के माओवाद से जुड़े होने के आरोप सामने आए, उन तथ्यों का उल्लेख लेख में नहीं है।
दूसरी ओर, माओवादी हिंसा के हजारों दस्तावेजीकृत आपराधिक मामलों को लगभग अनदेखा कर दिया गया। पिछले दो दशकों में 12,000 से अधिक लोग माओवादियों द्वारा की गई हिंसा में मारे गए हैं, यह संख्या ही इस संघर्ष की वास्तविक तस्वीर पेश करती है, लेकिन यह तथ्य 'द वायर' में प्रकाशित लेख की संरचना में कहीं दर्ज नहीं है।

विकास परियोजनाओं के विरोध को लेख ने “जन प्रतिरोध” बताया, लेकिन सुरक्षा एजेंसियों और स्वतंत्र जांच रिपोर्टों ने कई बार संकेत दिया है कि ऐसे आंदोलनों में सीपीआई (माओवादी) के फ्रंटल संगठनों की सक्रिय भूमिका रही है।
बोधघाट परियोजना के सर्वेक्षण दलों को लौटने पर मजबूर करने वाली धमकियों और हमलों को “लोकल मूवमेंट” कहना वास्तविकता से मेल नहीं खाता। लोकतांत्रिक असहमति का सम्मान जरूरी है, लेकिन जब विरोध और भय के बीच की रेखा धुंधली की जाती है, तब पत्रकारिता की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है।
'द वायर' में प्रकाशित लेख का समग्र ढांचा यह संदेश देता है कि माओवादी प्रभाव घटने के बाद राज्य, कॉरपोरेट और सुरक्षा बल जनजातीय बाहुल्य क्षेत्रों में आक्रामक तरीके से प्रवेश करेंगे। यह वही नैरेटिव है जो प्रतिबंधित सीपीआई (माओवादी) अपने घोषणापत्रों में वर्षों से दोहराती आई है, कि “राज्य का विकास संसाधनों की लूट है” और “माओवादी प्रतिरोध जनसुरक्षा।”

सवाल यह नहीं कि सरकार की हर नीति सही है या गलत, बल्कि यह कि क्या पत्रकारिता का दायित्व किसी हिंसक संगठन के वैचारिक फ्रेम को पुनर्प्रस्तुत करना है? 'द वायर' से यह प्रश्न पूछा जाना चाहिए, क्योंकि कोई भी पत्रकारिता बिना किसी जवाबदेही के नहीं हो सकती।
यह भले कहा जा सकता है कि बस्तर की लड़ाई आज भी जारी है, पर यह संघर्ष माओवाद बनाम राज्य भर नहीं, बल्कि समाज के भीतर उस वैचारिक ढांचे की पहचान और अस्वीकार का भी है, जो जनजातीय प्रतिरोध की आड़ में हिंसक उग्रवाद को वैधता देने की कोशिश करता है। 'द वायर' का लेख जानबूझकर उसी नैरेटिव को दोहराता दिखता है।
जबकि बस्तर की असली कहानी यह है कि हिंसा की छाया हटने पर जंगलों में जीवन और उम्मीद लौट रही है। असल में पत्रकारिता का काम इस वास्तविक परिवर्तन को समझना और ईमानदारी से प्रस्तुत करना है, ना कि वैचारिक परतों के नीचे सच को छिपाना।