
केरल की राजनीति में हालिया घटनाक्रम ने उस लंबे समय से स्थापित धारणा को गंभीर चुनौती दी है, जिसके अनुसार यह कहा जाता रहा है कि यह राज्य कम्युनिस्ट विचारधारा का अभेद्य गढ़ है। तिरुवनंतपुरम नगर निगम, जहां दशकों से वामपंथी दलों का प्रभुत्व कायम था, वहाँ भारतीय जनता पार्टी की जीत सिर्फ एक स्थानीय चुनावी परिणाम नहीं है, बल्कि वाम राजनीति की वैचारिक, संगठनात्मक और नैतिक कमजोरियों की ओर इशारा करती है। यह परिवर्तन कब, कहां और क्यों हुआ, इन सवालों के जवाब दिए बिना केरल की मौजूदा राजनीति को समझना अधूरा रहेगा।

तिरुवनंतपुरम, जो केरल की राजधानी होने के साथ-साथ राज्य की प्रशासनिक और बौद्धिक गतिविधियों का केंद्र भी है, लंबे समय तक वामपंथी दलों के लिए वैचारिक प्रयोगशाला की तरह देखा जाता रहा। यहां की तथाकथित उच्च साक्षरता, सामाजिक जागरूकता और संगठित नागरिक संरचना को कम्युनिस्ट नेतृत्व अपने पक्ष में स्थायी जनसमर्थन का प्रमाण मानता रहा।
लेकिन हाल ही में हुए नगर निगम चुनावों में भाजपा का उभार इस दावे को सीधी चुनौती देता है कि केरल का शिक्षित मतदाता स्वाभाविक रूप से कम्युनिस्ट विचारधारा से जुड़ा हुआ है।

यह परिणाम इसलिए भी अहम है क्योंकि तिरुवनंतपुरम नगर निगम पर वामपंथी दलों का लगभग चार दशक तक एकछत्र नियंत्रण रहा है। कांग्रेस के नेतृत्व वाला गठबंधन भी इस किले को भेदने में कभी सफल नहीं हो सका। ऐसे में भाजपा की इस जीत को “छोटी उपलब्धि” बताकर खारिज करना राजनीतिक अदूरदर्शिता ही नहीं, बल्कि बदलते जन-मनोविज्ञान को समझने में असफलता भी होगी। यह नतीजा इस बात का संकेत है कि केरल की राजनीति अब केवल दो ध्रुवों (कांग्रेस और लेफ़्ट) तक सीमित नहीं रही और तीसरे विकल्प के लिए वास्तविक जगह बनती दिख रही है।
वामपंथी दलों की यह स्थिति केवल चुनावी गणित तक सीमित नहीं है, बल्कि उसकी जड़ें वैचारिक विश्वसनीयता के क्षरण में हैं। केरल में कम्युनिस्ट समूह लंबे समय तक खुद को भ्रष्टाचार-विरोधी, प्रगतिशील और जनपक्षधर बताता रहा। लेकिन बीते कुछ वर्षों में सामने आए घोटालों और आरोपों ने इसकी असली छवि को उजागर कर दिया है।

करूवन्नूर सहकारी बैंक घोटाला, सोने की तस्करी से जुड़े मामले, सरकारी योजनाओं में अनियमितताएं और मुख्यमंत्री से जुड़े पारिवारिक लेन-देन के आरोप, इन सबने वामपंथी सरकार के नैतिक दावों को सवालों के घेरे में ला दिया। वहीं केंद्रीय जांच एजेंसियों की सक्रियता ने इन मामलों को राज्य की सीमाओं से बाहर राष्ट्रीय बहस का विषय बना दिया।
विश्लेषकों का मानना है कि भ्रष्टाचार के आरोपों से भी अधिक नुकसान वामपंथ को उसकी सामाजिक और सांस्कृतिक नीतियों से पहुंचा है। केरल में वर्षों तक उदारवादी हिंदू और ईसाई समुदायों का एक बड़ा हिस्सा वामपंथ के साथ खड़ा रहा, खासकर इसलिए क्योंकि कांग्रेस पर अल्पसंख्यक तुष्टिकरण के आरोप लगते रहे। लेकिन समय के साथ यह संतुलन बिगड़ता चला गया।

शबरीमला विवाद जैसे मुद्दों ने धार्मिक स्वतंत्रता, परंपराओं और राज्य के हस्तक्षेप को लेकर गहरा असंतोष पैदा किया। मंदिरों के प्रशासन और आय पर सरकारी नियंत्रण को लेकर उठे सवालों ने उन वर्गों को भी वामपंथी सरकार से दूर कर दिया, जो कभी उसका सामाजिक आधार माने जाते थे।
ईसाई समुदाय के भीतर भी असहजता बढ़ी है। कुछ सामाजिक और धार्मिक संगठनों ने सार्वजनिक रूप से यह चिंता जताई कि कट्टरपंथी तत्वों के खिलाफ राज्य की प्रतिक्रिया पर्याप्त नहीं रही। शिक्षा जगत और सामाजिक जीवन से जुड़े कुछ मामलों ने इस बेचैनी को और गहरा किया। नतीजतन, वह सामाजिक गठबंधन, जिस पर वामपंथ दशकों से भरोसा करता रहा, धीरे-धीरे कमजोर होता दिखने लगा।
भाजपा ने इसी राजनीतिक और सामाजिक रिक्तता को भरने की कोशिश की है। भाजपा ने केरल में केवल धार्मिक पहचान के आधार पर राजनीति नहीं की, बल्कि भ्रष्टाचार, प्रशासनिक जवाबदेही और सांस्कृतिक सम्मान जैसे मुद्दों को केंद्र में रखा। 2024 के लोकसभा चुनावों में भाजपा के वोट प्रतिशत में हुई वृद्धि और एक सीट पर जीत ने यह संकेत दिया कि उसकी रणनीति पूरी तरह अप्रासंगिक नहीं रही। तिरुवनंतपुरम लोकसभा सीट पर कड़ा मुकाबला भी इस बदलते समीकरण का प्रमाण माना गया।

कांग्रेस के नेतृत्व वाले गठबंधन ने भी कई स्थानीय निकायों में वाम दलों से बेहतर प्रदर्शन किया है। इसका अर्थ है कि सत्ता-विरोधी भावना व्यापक है और असंतोष किसी एक दल तक सीमित नहीं रहा।
इतिहास गवाह है कि भारत में कम्युनिस्ट समूहों ने मजदूरों, किसानों और वंचित वर्गों के अधिकारों के लिए संघर्ष करने का दावा किया है, लेकिन सच्चाई हमेशा इससे अलग रही है। वहीं दूसरी ओर वैश्वीकरण, तकनीकी बदलाव और मध्यम वर्ग के विस्तार ने समाज में नई अपेक्षाएं पैदा कीं, जिनका उत्तर वामपंथी वैचारिक ढांचे से देना कठिन होता चला गया, क्योंकि इसके पार कोई ठोस मॉडल ही नहीं है।। जब इस वैचारिक जड़ता के साथ सत्ता का अहंकार और भ्रष्टाचार के आरोप जुड़ते हैं, तो जनसमर्थन का क्षरण स्वाभाविक हो जाता है।

भाजपा के उभार को केवल वैचारिक आक्रामकता के रूप में देखना भी अधूरा विश्लेषण होगा। यह उस राजनीतिक शून्य का परिणाम है, जो तब पैदा होता है जब सत्तारूढ़ दल जनता की अपेक्षाओं से कट जाता है। त्रिपुरा में तीन दशकों तक चली वाम सरकार का पतन और पश्चिम बंगाल में भाजपा का मुख्य विपक्षी दल बनना इसी प्रवृत्ति के उदाहरण हैं। केरल अब उसी प्रक्रिया के अगले चरण में प्रवेश करता दिखाई दे रहा है।
आगामी विधानसभा चुनावों की दिशा अभी तय नहीं है, लेकिन तिरुवनंतपुरम नगर निगम का परिणाम यह साफ संकेत देता है कि केरल की राजनीति निर्णायक मोड़ पर खड़ी है। वामपंथ के सामने अब दो ही विकल्प हैं, या तो वह आत्मालोचना कर अपनी नीतियों और कार्यशैली में ठोस बदलाव करे, या फिर अपने पारंपरिक जनाधार के और क्षरण के लिए तैयार रहे। भाजपा के लिए यह अवसर है, लेकिन साथ ही यह परीक्षा भी कि वह इस बढ़ते समर्थन को स्थायी राजनीतिक भरोसे में बदल पाए या नहीं।
अंततः, केरल की राजनीति में यह बदलाव किसी एक दल की जीत या हार से कहीं अधिक, लोकतांत्रिक प्रक्रिया की जीवंतता का संकेत है। जब मतदाता सत्ता को चुनौती देता है, तो यह व्यवस्था के लिए चेतावनी भी होती है और सुधार का अवसर भी।