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कांकेर में 17 तारीख को दोपहर 12 बजे एक “महत्वपूर्ण बैठक” का ऐलान किया गया है। जगह तय की गई है कांकेर हाईवे के किनारे टेंट लगाकर। इस बैठक की अनुमानित उपस्थिति लगभग 200 लोगों की है। इस सूचना को देने वाला नाम है, अमित जोगी। वही अमित जोगी जो अजीत जोगी के बेटे हैं और वर्तमान में छत्तीसगढ़ जनता कांग्रेस (जोगी) के प्रमुख हैं।
अमित जोगी के द्वारा डाले गए फ़ेसबुक पोस्ट के शब्दों में कांकेर में होने वाली बैठक को “जन-संवाद बैठक”, “पीड़ितों की आवाज़”, “न्याय की मांग” और “संविधान की गरिमा” के लिए आयोजित बैठक कहा गया है। साथ ही कहा गया कि इस बैठक में बड़े तेवड़ा के सरपंच रजमन सलाम के परिजन भी मौजूद रहेंगे, जिनके “स्वर्गीय पिता के पार्थिव शरीर को उन्हीं की जमीन से जबरदस्ती उखाड़कर निकाल दिया गया (अमित जोगी के शब्दों में)।” संपर्क के लिए नरेंद्र भवानी का नंबर भी सार्वजनिक किया गया। वहीं इस घोषणा का अंत दो नारों के साथ हुआ, “जय छत्तीसगढ़। जय संविधान।”

यह पोस्ट केवल एक राजनीतिक कार्यक्रम की सूचना नहीं है। यह भाषा एवं "जन-संवाद" के जरिए तैयार किया गया एक नैरेटिव है, जिसमें एक संवेदनशील पाँचवीं अनुसूची क्षेत्र की जनजातीय विरोधी घटना को ना सिर्फ़ एकतरफा तरीके से परिभाषित किया जा रहा है बल्कि एक समुदाय विशेष को “पीड़ित” के रूप में स्थापित करने की कोशिश की जा रही है।
यहीं से कहानी का दूसरा पक्ष सामने आता है। इस दौरे के राजनीतिक संदेश का असर किसी दल या नेता पर नहीं, बल्कि पांचवीं अनुसूची के अंतर्गत संरक्षित जनजातीय समाज की परंपरा, ग्राम व्यवस्था और अधिकारों पर पड़ता है।
आमाबेड़ा क्षेत्र में 15 से 18 दिसंबर 2025 के बीच जो हुआ, उसे सिर्फ स्थानीय विवाद कहकर टालना न तो तथ्यात्मक है, न सत्य। Quest Journals में प्रकाशित रिसर्च पेपर के अनुसार यह घटनाक्रम पांचवीं अनुसूची के क्षेत्र में ईसाई समूह द्वारा अवैध दफन, बाहरी हस्तक्षेप, संभावित नेटवर्किंग और प्रशासनिक निष्पक्षता को लेकर गंभीर सवाल बन गया था।

दरअसल घटना कुछ इस तरह है कि 15 दिसंबर को बड़े तेवड़ा गांव निवासी चमरा राम सलाम की मृत्यु कांकेर जिला अस्पताल में होती है। उसी रात मृतक का पुत्र रजमन सलाम, जो सरपंच बताया गया है, शव लेकर गांव पहुंचता है। 16 दिसंबर की सुबह गांव में इस मुद्दे पर चर्चा होती है। इसके बाद रजमन सलाम द्वारा जनजातीय क्षेत्र में ईसाई रीति के अनुसार शव दफन करने की ज़िद के बाद विवाद बढ़ता है।
यह विवाद केवल शव-दफन का नहीं था। यह ग्राम समुदाय के सामूहिक निर्णय, परंपरागत अधिकार और नियमों के पालन से भी जुड़ा था। पांचवीं अनुसूची क्षेत्रों में ग्राम सभा और पारंपरिक संस्थाएं केवल सामाजिक ढांचा नहीं हैं, वे संवैधानिक संरक्षण की व्यवहारिक इकाइयां भी हैं।
रिसर्च पेपर के अनुसार 16 दिसंबर को रजमन सलाम द्वारा निजी भूमि पर ईसाई रीति से शव को दफन कर दिया गया। इसके बाद तनाव बढ़ा। प्रशासन ने आश्वासन दिया था कि शव हटाया जाएगा, लेकिन रातों-रात कब्र पर पक्का चबूतरा बना दिया गया।
देखा जाए तो, यही वो घटनाक्रम है जहां शब्दों का खेल शुरू होता है। अमित जोगी ने जैसा कि अपने पोस्ट में कहा है कि “पार्थिव शरीर को जबरदस्ती उखाड़कर निकाला गया।” वास्तव में देखे तो सच्चाई यह है कि मामला पहले ही अनधिकृत या विवादित दफन से जुड़ा था और प्रशासन ने दबाव में देर से कार्रवाई शुरू की।

Quest Journals में प्रकाशित रिसर्च पेपर भी स्पष्ट रूप से यह बताता है कि यह "दफन" विधि द्वारा स्वीकृत या पंजीकृत कब्रिस्तान में नहीं हुआ था। यह पांचवीं अनुसूची के क्षेत्र में ग्राम सभा की अनुमति के बिना निजी भूमि पर किया गया, जिसे कानून की दृष्टि से अवैध और शून्य माना जाना चाहिए।
इस दावे के संदर्भ में अमित जोगी द्वारा “उखाड़ने” को अमानवीय बताने की बजाय यह समझना जरूरी है कि विवादित दफन को हटाने की कार्रवाई किस कानूनी आधार पर हुई, और क्यों हुई?
अमित जोगी की पोस्ट में “लगभग 200 पीड़ित साथी” का उल्लेख है। यह महज सूचना नहीं, बल्कि एक नैरेटिव है जो पहले ही तय करता है कि पीड़ित कौन हैं। जबकि रिसर्च पेपर के अनुसार 17 दिसंबर को लगभग 500 से अधिक लोगों (ईसाइयों एवं भीम आर्मी के सदस्यों) की भीड़ द्वारा हमला किया गया, जिसमें कई ग्रामीण घायल हुए और कुछ की स्थिति गंभीर बताई गई।

यही वह जगह है जहां पत्रकारिता का मुख्य सवाल खड़ा होता है। यदि हिंसा में घायल जनजातीय ग्रामीण हैं, यदि तनाव का मूल कारण ईसाइयों द्वारा विवादित दफन और बाहरी उकसावा है, तो “पीड़ित” किसे घोषित किया जा रहा है? और किसे नजरअंदाज किया जा रहा है?
इस पूरे विषय पर स्थानीय ग्रामीणों से चर्चा के दौरान एक ग्रामीण ने बताया कि "आमाबेड़ा-बड़े तेवड़ा की घटना के बाद क्षेत्र में तनाव कायम है और ऐसी सभा से दोबारा शांति भंग होने की आशंका है।" एक अन्य ग्रामीण ने बात करते हुए कहा कि " जिस तरह 17 तारीख को कांकेर में हाईवे किनारे टेंट लगाकर “जन-संवाद बैठक” आयोजित करने की घोषणा की गई है, इससे पुनः हिंसा और कानून-व्यवस्था बिगड़ने का खतरा पैदा हो सकता है।"

यानी गांवों की आपत्ति साफ है कि जिस व्यक्ति या पक्ष पर आरोप हैं, उसे “पीड़ित” बनाकर मंच देना न्याय की दिशा नहीं, बल्कि स्थिति को और भड़काने का तरीका हो सकता है। खासकर तब, जब घटना के बाद भी इलाके में तनाव खत्म नहीं हुआ हो।
अमित जोगी के फ़ेसबुक पोस्ट में संपर्क व्यक्ति के तौर पर नरेंद्र भवानी का नंबर दिया गया। यह छोटा विवरण अपने भीतर बड़ा संकेत भी है। कई दस्तावेज़ों को देखने के बाद यह पता चलता है कि नरेंद्र भवानी के खिलाफ विभिन्न थानों में दर्ज प्रकरणों और धाराओं का उल्लेख है।
यहां यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि किसी व्यक्ति को न्यायालय के बिना दोषी ठहराना पत्रकारिता नहीं है, लेकिन यह सवाल पूछना भी आवश्यक है कि जिस कार्यक्रम को “पीड़ितों की आवाज़” कहा जा रहा है, उसका संचालन और उसकी व्यवस्था किसके हाथ में है। भीड़ जुटाने, टेंट लगाने, हाईवे साइट तय करने जैसे फैसले किस स्तर पर, किस ढांचे में लिए जा रहे हैं?
अमित जोगी की फ़ेसबुक पोस्ट “जय संविधान” के नारे के साथ खत्म होती है। लेकिन अनुसूचित क्षेत्र की संवैधानिक वास्तविकता केवल नारों से तय नहीं होती। पांचवीं अनुसूची का उद्देश्य यह है कि इन क्षेत्रों में ग्राम सभा, परंपरागत अधिकार और स्थानीय व्यवस्था का संरक्षण हो।
रिसर्च पेपर यह भी इंगित करता है कि अनुसूचित क्षेत्र में संवैधानिक संरक्षण, पारंपरिक अधिकार और सामान्य प्रशासन के बीच संतुलन संवेदनशील होता है। जब धार्मिक पहचान के आधार पर भूमि, दफन, पूजा या सामूहिक व्यवस्था में हस्तक्षेप बढ़ता है, तो तनाव और वैधानिक टकराव का खतरा भी बढ़ता है।
इसी संदर्भ में शव दफन से जुड़े नियम और न्यायालय के निर्देश भी महत्वपूर्ण हो जाते हैं। यदि हम रमेश बघेल विरुद्ध छत्तीसगढ़ राज्य के मामले में हाईकोर्ट के निर्णय और छत्तीसगढ़ शव दफन नियमों को देखें, तो स्पष्ट रूप से दिखाई देता है कि नियमों का उल्लंघन हुआ है।
ऐसी परिस्थिति में यह सिर्फ स्थानीय विवाद नहीं रह जाता। यह "रूल ऑफ़ लॉ" का प्रश्न बन जाता है। अवैध दफन को राजनीतिक संरक्षण देना न केवल स्थानीय व्यवस्था के लिए, बल्कि भविष्य में ऐसे मामलों की पुनरावृत्ति के लिए भी रास्ता खोल देता है।
अमित जोगी स्वयं ईसाई हैं और लगातार ईसाई पक्ष के समर्थन में आते रहे हैं। हालाँकि यहाँ उद्देश्य किसी के धर्म पर टिप्पणी करना नहीं, बल्कि सार्वजनिक आचरण और उसकी राजनीतिक भूमिका की जांच करना है। लेकिन यह समझना जरूरी है कि यदि कोई नेता अनुसूचित क्षेत्र में परंपरा, ग्राम सभा और नियमों की अनदेखी के बीच नियम तोड़ने वाले ईसाई पक्ष को ही “पीड़ित” घोषित करने की कोशिश करता है, तो उसकी मंशा और प्रभाव पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
कांकेर की यह कहानी किसी एक फ़ेसबुक पोस्ट से शुरू नहीं हुई, और न ही किसी एक बैठक पर खत्म होगी। यह उस बड़े सवाल की ओर इशारा करती है कि अनुसूचित क्षेत्र में कानून, ग्राम सभा और जनजातीय परंपरा की भूमिका क्या रहेगी? क्या इन क्षेत्रों में संवैधानिक संरक्षण व्यवहार में भी लागू होगा, या हर बार भीड़, पोस्ट, नारे और राजनीतिक दबाव से उसे कमजोर किया जाएगा?

अमित जोगी का दौरा, पोस्ट की भाषा, “पीड़ित” शब्द का चयन, रजमन सलाम के परिजन को केंद्र में रखना और हाईवे पर टेंट लगाकर सभा की योजना, इन सबका संयुक्त प्रभाव संवाद से अधिक "भीड़तंत्र" या "भीड़ एकत्रीकरण" की ओर जाता दिखता है। और यह वही दिशा है जिसमें असली पीड़ित को पीछे धकेल दिया जाता है, साथ ही नियमों के उल्लंघन को भावनात्मक भाषा से ढक दिया जाता है और पांचवीं अनुसूची जैसे संवैधानिक संरक्षण को "जय संविधान" जैसे नारे के शोर में दबा दिया जाता है।
यह सवाल अब केवल कांकेर, आमाबेड़ा या बड़े तेवड़ा तक सीमित नहीं है। यह सवाल उन सभी जनजातीय गांवों का है, जो ईसाई मिशनरियों से संविधान की पांचवीं अनुसूची के भरोसे अपनी पहचान, अपनी भूमि और अपनी सामूहिक व्यवस्था बचाने की कोशिश कर रहे हैं।