चीन आज केवल एक पड़ोसी देश नहीं रहा, बल्कि वह एशिया और उससे बाहर अस्थिरता का बड़ा स्रोत बन चुका है। वह 14 देशों के साथ सीमा साझा करता है, लेकिन उसके क्षेत्रीय दावे 22 देशों तक फैल चुके हैं। यह स्थिति अपने आप में बताती है कि बीजिंग की नीति पड़ोस में शांति नहीं, बल्कि दबाव, डर और विस्तार पर टिकी है। चीन बार-बार इतिहास की मनमानी व्याख्या करता है, पुराने साम्राज्यों का हवाला देता है और आधुनिक अंतरराष्ट्रीय कानून की अनदेखी करता है। यही कारण है कि उसके विवाद केवल सीमावर्ती इलाकों तक सीमित नहीं रहते, बल्कि समुद्रों और दूर-दराज के क्षेत्रों तक फैल जाते हैं।
भारत के खिलाफ चीन की आक्रामकता
9 जनवरी 2026 को चीन ने जम्मू कश्मीर के शक्सगाम घाटी पर फिर अवैध दावा ठोक दिया। उसने वहां अपने बुनियादी ढांचे के निर्माण को सही ठहराने की कोशिश की। भारत ने तुरंत और सख्ती से
इस दावे को खारिज किया। भारत ने साफ कहा कि 1963 का चीन पाकिस्तान समझौता अवैध है और वह इस क्षेत्र पर अपने संप्रभु अधिकारों की रक्षा करेगा। शक्सगाम घाटी गिलगित बाल्टिस्तान के हुंजा जिले में स्थित है, जिसे पाकिस्तान ने गैरकानूनी तरीके से चीन को सौंपा था।
भारत और चीन के बीच टकराव कोई नई बात नहीं है। 1962 में चीन ने अक्साई चिन पर कब्जा किया। 1967 में नाथू ला और चो ला में उसकी हरकतों ने तनाव बढ़ाया। 2017 में डोकलाम में चीन की सड़क निर्माण कोशिश ने बड़ा संकट खड़ा किया। 2020 में पूर्वी लद्दाख में हुई हिंसक झड़पों ने उसकी असली मंशा उजागर कर दी। भारत हर बार मजबूती से खड़ा रहा और चीन को स्पष्ट संदेश दिया कि वह दबाव की राजनीति स्वीकार नहीं करेगा।
भूटान पर बढ़ता दबाव
चीन भूटान पर भी
धीरे-धीरे दबाव बढ़ाता रहा है। पहले उसके दावे पश्चिमी और मध्य क्षेत्रों तक सीमित थे, लेकिन अब वह पूर्वी भूटान तक हाथ बढ़ा चुका है। उसने सक्तेंग वन्यजीव अभयारण्य को विवादित क्षेत्र बताने की कोशिश की। उसने अंतरराष्ट्रीय फंडिंग तक पर आपत्ति जताई। 2017 में डोकलाम में चीन की सड़क निर्माण गतिविधि ने भारत और भूटान दोनों की सुरक्षा को खतरे में डाला। यह कदम साफ दिखाता है कि चीन छोटे देशों की संप्रभुता का सम्मान नहीं करता।
अफगानिस्तान और म्यांमार में ऐतिहासिक बहाने
चीन अफगानिस्तान के बदख्शां प्रांत और वखान कॉरिडोर पर भी नजर रखता है।
1963 की संधि के बावजूद उसकी गतिविधियां संदेह पैदा करती हैं। म्यांमार के मामले में चीन युआन वंश के दौर का हवाला देकर पुराने दावे करता रहा है। 1960 के दशक की संधियों से कई विवाद सुलझे, लेकिन सीमा क्षेत्रों में अस्थिरता आज भी बनी हुई है। चीन इन इलाकों में अपने प्रभाव का विस्तार करता रहता है।
मध्य एशिया में दबाव की नीति
कजाखस्तान, किर्गिस्तान और ताजिकिस्तान जैसे देशों के साथ भी चीन ने दबाव की नीति अपनाई। उसने कजाखस्तान के बड़े हिस्से पर
दावा किया और बाद में ऐसे समझौते किए, जिनसे उसे फायदा मिला। किर्गिस्तान को 1999 में करीब 1,250 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र सौंपना पड़ा। ताजिकिस्तान ने भी 2000 के बाद बड़े भूभाग से हाथ धोया। चीन हर जगह इतिहास और पुराने समझौतों का सहारा लेकर अपने हित साधता रहा।
मंगोलिया और नेपाल पर नजर
चीन ने मंगोलिया को भी युआन वंश के बहाने अपने प्रभाव क्षेत्र में दिखाने की कोशिश की। उसने नेपाल के कुछ हिस्सों पर 18वीं सदी के युद्ध का हवाला देकर
दावा किया। नेपाल में सीमा स्तंभों और जमीन कब्जे को लेकर लगातार चिंता बनी हुई है। यह रवैया दिखाता है कि चीन पड़ोसी देशों की सीमाओं को स्थायी नहीं मानता।
रूस और कोरियाई प्रायद्वीप
चीन रूस के साथ लंबी सीमा साझा करता है, लेकिन उसने वहां भी
1,60,000 वर्ग किलोमीटर से अधिक क्षेत्र पर ऐतिहासिक दावे बनाए रखे। चार संधियों और सीमांकन के बावजूद बीजिंग के दावे खत्म नहीं हुए। उत्तर कोरिया के साथ करीबी रिश्तों के बावजूद चीन पैक्टू पर्वत और नदियों को लेकर दावे करता रहा। उसने कभी-कभी पूरे कोरियाई प्रायद्वीप को अपने ऐतिहासिक दायरे में बताने की कोशिश की।
वियतनाम और दक्षिण चीन सागर
वियतनाम के खिलाफ चीन ने मिंग वंश के बहाने बड़े दावे किए। पारासेल और स्प्रैटली द्वीप समूह में उसने कृत्रिम द्वीप बनाए और सैन्य ढांचा खड़ा किया। 1979 के युद्ध से लेकर हाल के वर्षों तक चीन लगातार वियतनाम को चुनौती देता रहा। यह रवैया पूरे
दक्षिण चीन सागर को अस्थिर बनाता है।
बिना सीमा वाले देशों से भी टकराव
चीन की विस्तारवादी सोच यहीं नहीं रुकती। ब्रुनेई, मलेशिया, इंडोनेशिया और फिलीपींस के साथ उसके समुद्री विवाद चल रहे हैं। तथाकथित नाइन डैश लाइन के जरिए वह विशाल समुद्री क्षेत्र पर दावा करता है। इंडोनेशिया ने नातुना सागर में उसके
दावों को खारिज किया। फिलीपींस ने अंतरराष्ट्रीय अदालत में जीत हासिल की, लेकिन चीन ने फैसले को मानने से इनकार किया।
जापान और कोरिया के साथ तनाव
जापान के साथ सेनकाकू द्वीपों और रयूक्यू द्वीपों को लेकर चीन लगातार तनाव बढ़ाता रहा। उसने वायु रक्षा क्षेत्र और समुद्री सीमाओं में दखल दिया। दक्षिण कोरिया के साथ भी एडीआईजेड और समुद्री चट्टानों को लेकर
विवाद बना रहा। चीन हर जगह ताकत दिखाकर अपनी बात मनवाने की कोशिश करता है।
ताइवान पर सबसे बड़ा दावा
चीन ताइवान को अपना हिस्सा बताकर सबसे बड़ा खतरा पैदा करता है। वह किसी भी तरह की असहमति को कुचलने की भाषा बोलता है। ताइवान और उससे जुड़े समुद्री क्षेत्रों को लेकर उसका रुख पूरे क्षेत्र की शांति के लिए गंभीर चुनौती बन चुका है।
निष्कर्ष
चीन आज पड़ोसी देशों की सीमाओं को चुनौती देकर पूरी दुनिया के सामने असली चेहरा दिखा रहा है। वह बार-बार पुराने साम्राज्यों का हवाला देता है और आधुनिक कानूनों को नजरअंदाज करता है। बीजिंग ताकत के दम पर जमीन, समुद्र और आसमान तक पर कब्जे की सोच रखता है। उसने भारत से लेकर जापान, वियतनाम और फिलीपींस तक हर मोर्चे पर टकराव बढ़ाया। उसने छोटे देशों पर दबाव बनाया और बड़े देशों को उकसाने की रणनीति अपनाई।
यह साफ हो चुका है कि चीन शांति नहीं चाहता, बल्कि डर के सहारे वर्चस्व चाहता है। उसकी विस्तारवादी चालें एशिया की स्थिरता को झकझोर रही हैं और वैश्विक व्यवस्था को कमजोर कर रही हैं। अब दुनिया के लिए चुप रहना विकल्प नहीं है। भारत समेत सभी प्रभावित देशों को एक स्वर में चीन की आक्रामकता को बेनकाब करना होगा। सख्त जवाब, मजबूत सहयोग और स्पष्ट नीति ही चीन के बढ़ते खतरे को रोक सकती है।
लेख
शोमेन चंद्र