सैन जुआन हिल नरसंहार: लाल विचारधारा के नाम पर क्यूबा में कम्युनिस्ट सत्ता का रक्तपात

सैन जुआन हिल नरसंहार क्यूबा के इतिहास में वह मोड़ बना जहां से वैचारिक तानाशाही की शुरुआत हुई।

The Narrative World    02-Jan-2026
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क्यूबा के इतिहास में 1959 की तथाकथित क्रांति को आज भी एक नैतिक और जनसमर्थित आंदोलन के रूप में पेश किया जाता है, लेकिन इसी दौर में घटित सैन जुआन हिल नरसंहार उस दावे को पूरी तरह झुठलाता है। यह नरसंहार सत्ता परिवर्तन के तुरंत बाद हुआ, जब कम्युनिस्ट शासन ने असहमति को कुचलने के लिए हिंसा को औजार बनाया। सैंटियागो दे क्यूबा स्थित सैन जुआन हिल पर सैकड़ों क्यूबाई नागरिकों को बिना निष्पक्ष सुनवाई के मौत के घाट उतार दिया गया। इस अपराध की नैतिक और प्रशासनिक जिम्मेदारी सीधे तौर पर राउल कास्त्रो और क्यूबा की कम्युनिस्ट पार्टी पर जाती है।
 
1959 में फिदेल कास्त्रो के नेतृत्व में सत्ता पर कब्जा करने के बाद नई सरकार ने खुद को जनता का मुक्तिदाता बताया। लेकिन सैंटियागो दे क्यूबा में सत्ता की असली तस्वीर सामने आई। सैन जुआन हिल क्षेत्र में पूर्व सैनिकों, पुलिसकर्मियों, सरकारी कर्मचारियों और आम नागरिकों को पकड़कर लाया गया। शासन ने उन्हें पुराने शासन का समर्थक बताकर दोषी घोषित किया और तुरंत सजा सुनाई। इन कार्रवाइयों ने कानून, मानवाधिकार और न्याय की हर परिभाषा को रौंद दिया।
 
सैन जुआन हिल पर हुए हत्याकांड में राउल कास्त्रो ने निर्णायक भूमिका निभाई। उस समय वह सशस्त्र बलों का प्रमुख था और सैंटियागो क्षेत्र की कमान उसी के हाथ में थी। राउल कास्त्रो ने तथाकथित क्रांतिकारी न्याय के नाम पर फांसी और गोली से मारने के आदेश दिए। उसने अदालतों को सत्ता का औपचारिक मुखौटा बनाया और फैसले पहले ही तय कर लिए। गवाहों और इतिहासकारों ने स्पष्ट किया कि अभियुक्तों को बचाव का अवसर नहीं मिला और फैसले मिनटों में सुनाए गए।
 
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कम्युनिस्ट पार्टी ने इस नरसंहार को वैचारिक शुद्धिकरण का नाम दिया। पार्टी ने प्रचार तंत्र के जरिए हत्याओं को जनक्रांति की आवश्यकता बताया। सरकारी रेडियो और अखबारों ने मृतकों को देशद्रोही घोषित किया। इस रणनीति ने डर का ऐसा माहौल बनाया कि कोई भी नागरिक सवाल पूछने की हिम्मत नहीं कर सका। पार्टी ने सत्ता को स्थायी बनाने के लिए हिंसा को नीति का हिस्सा बनाया।
 
सैन जुआन हिल नरसंहार केवल शारीरिक हिंसा तक सीमित नहीं रहा। इसने क्यूबा के सामाजिक ताने बाने को तोड़ दिया। परिवारों ने अपने प्रियजनों को खोया। हजारों लोग भय के कारण देश छोड़कर भागे। क्यूबा से बड़े पैमाने पर पलायन की शुरुआत इसी दमनकारी दौर में हुई। कम्युनिस्ट शासन ने असहमति को अपराध बना दिया और विचार की स्वतंत्रता को समाप्त कर दिया।
 
 
राउल कास्त्रो और कम्युनिस्ट पार्टी ने बाद के वर्षों में इस घटना पर चुप्पी साधे रखी। सरकार ने कभी स्वतंत्र जांच की अनुमति नहीं दी। पीड़ित परिवारों को न्याय नहीं मिला। अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों ने इस नरसंहार को युद्ध अपराध और राज्य प्रायोजित हत्या बताया, लेकिन क्यूबा की सरकार ने हर आलोचना को साम्राज्यवादी साजिश कहकर खारिज कर दिया।
 
यह घटना बताती है कि वैचारिक कट्टरता जब सत्ता से जुड़ती है, तो वह मानव जीवन को तुच्छ बना देती है। क्यूबा की कम्युनिस्ट पार्टी और राउल कास्त्रो ने क्रांति के नाम पर जो रक्तपात किया, वह इतिहास में अपराध के रूप में दर्ज रहेगा। न्याय की मांग आज भी जीवित है और यह नरसंहार क्यूबा के दमनकारी कम्युनिस्ट शासन का स्थायी कलंक बना रहेगा।
 
लेख
शोमेन चंद्र