दिल्ली को झकझोर देने वाले
हिंदू-विरोधी दंगे को छह साल होने जा रहे हैं, लेकिन उस हिंसा से जुड़ा सच आज भी दो समानांतर धाराओं में बंटा हुआ है। एक धारा अदालतों की है, जहां दस्तावेज, गवाहियां, संदेश और घटनाक्रम के आधार पर कानूनी निष्कर्ष निकाले जा रहे हैं। वहीं दूसरी धारा मीडिया और बौद्धिक विमर्श की है, जहां एक तय कहानी को लगातार आगे बढ़ाया जा रहा है। इस कहानी के केंद्र में दो नाम हैं, उमर खालिद और शरजील इमाम, जिनकी हिरासत को कुछ मीडिया समूह और समर्थक वर्ग अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला बताकर पेश कर रहा है।
हाल ही में सुप्रीम कोर्ट द्वारा उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत याचिकाएं खारिज किए जाने के बाद यह टकराव और तेज हो गया। अदालत ने स्पष्ट कहा कि "अभियोजन की ओर से पेश की गई सामग्री प्रथम दृष्टया एक सुनियोजित साजिश की ओर इशारा करती है।" इसके बावजूद देश और विदेश के कई प्रभावशाली मीडिया मंचों ने भारत की न्यायपालिका के फैसले को या तो दमन का उदाहरण बताया या फिर उसे अधूरे और एकतरफा ढंग से पेश किया।
दिल्ली दंगों में 50 से अधिक लोगों की मौत हुई थी। सैकड़ों लोग घायल हुए। घर, दुकानें और धार्मिक स्थल जलाए गए। एक आईबी अधिकारी को मुस्लिमों की भीड़ ने मार कर नाले में फेंक दिया था। यह सब कोई मामूली घटना नहीं थी, जिसे केवल राजनीतिक असहमति या भावनात्मक कथनों में समेट दिया जाए। इसके बावजूद, जब भी इस हिंदू-विरोधी दंगों की बात आती है, तो चर्चा का केंद्र दंगों की भयावहता और उसके पीड़ितों का न्याय नहीं, बल्कि यह बना दिया गया कि आरोपी "अपने विचारों एवं मुस्लिम होने के कारण" जेल में हैं।
उमर खालिद और शरजील इमाम के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में साफ कहा कि "यह मामला सामान्य विरोध या भाषण का नहीं है।" न्यायालय ने अभियोजन द्वारा पेश की गई सामग्री का हवाला देते हुए कहा कि "बैठकों का क्रम, भाषणों की भाषा, संदेशों का आदान-प्रदान और रणनीतिक स्थानों पर गतिविधियों की योजना, एक ऐसे पैटर्न की ओर इशारा करती है जिसे केवल शांतिपूर्ण असहमति कहकर खारिज नहीं किया जा सकता।" यही वह बिंदु है जिसे कई मीडिया रिपोर्ट में या तो दबा दिया गया या पूरी तरह गायब कर दिया गया।
देखिए, न्यायिक प्रक्रिया का मूल सिद्धांत यही है कि आरोप, जवाब, गवाही और दस्तावेजों के आधार पर ही अंतिम नतीजा निकाला जाता है। लेकिन इसके बावजूद, पिछले कुछ वर्षों में देश की कई प्रभावशाली मीडिया समूहों एवं कुछ तथाकथित बुद्धिजीवियों ने इस मामले को ट्रायल से पहले ही एक तरह के "नैरेटिव वॉर" में बदल दिया है।
सारे आरोपों, न्यायालय की टिप्पणियों एवं डिजिटल साक्ष्यों का विश्लेषण करने के बजाय, इन प्रभावशाली मीडिया समूहों एवं तथाकथित बुद्धिजीवियों ने "अपने विचार" को तथ्य और आशंका को निष्कर्ष की तरह पेश किया है। यही उस "नैरेटिव वॉर" का हथियार है।
यह समझना जरूरी है कि सर्वोच्च न्यायालय ने जमानत याचिकाओं पर विचार करते समय किन बिंदुओं को केंद्र में रखा। अदालत ने कहा कि अभियोजन द्वारा पेश की गई सामग्री, जिसमें कथित बैठकों, भाषणों और समन्वित गतिविधियों का विवरण शामिल है, प्रथम दृष्टया एक व्यापक साजिश की ओर इशारा करती है। इसी आधार पर सामान्य जमानत मानकों से अलग, सख्त कानूनी प्रावधानों के तहत रिहाई से इनकार किया गया। जमानत का खारिज होना दोष सिद्धि नहीं है, लेकिन यह भी साफ है कि अदालत ने अभियोजन की सामग्री को इस स्तर पर निराधार मानकर खारिज नहीं किया।
इसके बावजूद, कई बडे मीडिया संस्थानों ने इस फैसले को इस तरह पेश किया मानो अदालत ने केवल असहमति या विरोध को अपराध बना दिया हो। अल जजीरा, एमनेस्टी इंटरनेशनल, आर्टिकल 14, लाइव लॉ और स्क्रोल जैसे मीडिया समूहों ने उसी "नैरेटिव वॉर" के स्वर अपनाए हैं।
किसी ने इसे मानवाधिकार संकट बताया है, तो कोई इसे खतरनाक मिसाल कह रहा है। लेकिन इन रिपोर्ट्स में न्यायालय के सामने रखी गई मुकदमे की सामग्री और चार्जशीट के ठोस बिंदुओं को शामिल नहीं किया गया, जिस पर न्यायालय ने भी विश्वास जताया है।
"नैरेटिव वॉर" के पैटर्न को देखें तो यह कोई छोटी चूक नहीं है। जब गंभीर अभियोजन दावों को किनारे रखकर रिपोर्टिंग का केंद्र केवल रिहाई की मांग और अधिकार समूहों की चिंता बन जाता है, तो पाठक के सामने केवल अधूरी तस्वीर जाती है। और अधूरी तस्वीर अक्सर सबसे ज्यादा भ्रम पैदा करती है। और यहीं काम करता है "नैरेटिव वॉरफ़ेयर"।
यह समझना आवश्यक है कि न्यायालय का काम कानून के दायरे में फैसला देना है। वहीं मीडिया का दायित्व है दोनों पक्षों के दावों को संतुलित तरीके से रखना। लेकिन जब कोई मीडिया संस्थान अदालत की भाषा और दस्तावेजों से हटकर पहले से तय निष्कर्षों की ओर झुकती है, तो उसकी निष्पक्षता पर सवाल उठना स्वाभाविक है। इस मामले में बार-बार यही देखने को मिला है।
इस पूरे मामले में जिन दावों को न्यायालय ने गंभीर माना है, उनमें यह बात प्रमुख रही कि हिंदू-विरोधी दंगों के दौरान कई आयोजनों, भाषणों और बैठकों में एक साझा वैचारिक दिशा और रणनीतिक समन्वय दिखाई देता है। जाँच एजेंसी का कहना है कि इन गतिविधियों का मकसद केवल विरोध दर्ज कराना नहीं, बल्कि समन्वित तरीके से सार्वजनिक व्यवस्था को बाधित करना था।
अदालत ने भी इस बात को माना है कि यह मामला केवल आपत्तिजनक भाषणों तक सीमित नहीं है, क्योंकि अभियोजन ने समयबद्ध बैठकों, निर्देशित भीड़ जुटाने और रणनीतिक स्थानों पर अवरोध की योजना जैसे पहलुओं की ओर भी इशारा किया है। इन्हीं कारणों को देखते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने जमानत देने से इनकार किया है।
इसी संदर्भ में शरजील इमाम के उस बयान को भी देखा जाना चाहिए जिसमें सिलीगुड़ी कॉरिडोर का जिक्र आता है। न्यायिक दृष्टि से महत्वपूर्ण यह है कि अभियोजन ने इस बयान को उसके समय, संदर्भ और अन्य वक्तव्यों के साथ जोड़कर अदालत के सामने रखा। न्यायालय ने इसे एक ऐसे हिस्से के रूप में देखा जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
वहीं आम नागरिक के रूप में यदि हम इस टिप्पणी को देखते हैं, तो भी समझना आवश्यक है कि कैसे शरजील इमाम भारत के एक पूरे हिस्से को काटने की बात कर रहा है, जो कहीं ना कहीं उनकी बड़ी साज़िश का हिस्सा था।
यहां उमर खालिद, शरजील इमाम और उनके समर्थकों की भूमिका पर भी बात करना जरूरी है। इन दोनों के इर्द-गिर्द एक ऐसा बौद्धिक घेरा खड़ा किया गया है, जिसमें हर आलोचना को दमन और हर सवाल को असहिष्णुता बताकर खारिज कर दिया जाता है। उनके समर्थकों ने बार-बार अदालतों के आदेशों को पूरा पढ़े बिना, या उन्हें संदर्भ से काटकर, यह दावा किया कि पूरा मामला केवल विचारों को दबाने का प्रयास है।
यह रवैया न केवल भारत के लोकतांत्रिक ढाँचे के भीतर कार्य करने वाले न्यायपालिका के प्रति असम्मान है, बल्कि उन लोगों के प्रति भी संवेदनहीन है जिनकी जान और आजीविका इन हिंदू-विरोधी दंगों में तबाह हुई।
कुछ मीडिया समूहों द्वारा चलाए जा रहे "नैरेटिव वॉर" के विषय पर लौटें तो साफ समझ आता है कि समस्या किसी एक संस्था, लेख या रिपोर्टर तक सीमित नहीं है। यह एक व्यापक नेक्सस है जिसमें अधिकार आधारित आलोचना, वैचारिक समर्थन और कानूनी व्याख्या की सीमाएं जानबूझकर शामिल की गई हैं।
हाल ही का उदाहरण देखें, तो "एमनेस्टी इंटरनेशनल" ने उमर खालिद और शरजील इमाम लंबी हिरासत पर चिंता जताई है।
एमनेस्टी का कहना है कि मानवाधिकार के लिए चिंता है। लेकिन एमनेस्टी क्या उनके मानवाधिकार की बात करेगा जिनकी मृत्यु हिंदू-विरोधी दंगों में हुई, और उनके परिजन आज भी न्याय की राह देख रहे हैं?
वहीं "
आर्टिकल 14" ने कानूनी तर्क रखकर इस पूरे मामले को "मुस्लिमों के अधिकार" से जोड़ने की कोशिश की है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कतर एवं इस्लामिक कट्टरपंथी समूहों के लिए प्रोपेगेंडा करने के लिए कुख्यात "
अल जजीरा" का कहना है कि "मोदी सरकार में मुस्लिमों का शोषण संस्थागत रूप ले चुका है, इसीलिए उमर खालिद और शरजील इमाम को रिहा नहीं किया जाएगा।"
स्क्रोल पर एक क़दम आगे बढ़ते हुए "गांधी परिवार के क़रीबी" माने जाने वाले रामचंद्र गुहा ने एक भावनात्मक
लेख लिखते हुए उमर खालिद को तो महान इतिहासकार ही बना दिया है। वहीं
लाइव लॉ ने न्यायिक फैसलों पर ही सवाल उठा दिए हैं। ये केवल कुछ चुनिंदा उदाहरण हैं, लेकिन ऐसे नैरेटिव वॉर मीडिया से लेकर सोशल मीडिया तक चल रहे हैं। एक विचारक एवं स्तंभकार के नाते इन सभी का अपना नजरिया हो सकता है, लेकिन अभियोजन के साक्ष्यों का ईमानदारी से समग्र विश्लेषण करना क्या पत्रकारिता का भाग नहीं है?
कुल मिलाकर देखें, तो तथ्यों के आधार पर निष्कर्ष यही है कि अदालत ने अभियोजन के पास मौजूद सामग्री को इतना गंभीर माना कि उमर खालिद और शरजील इमाम को जमानत नहीं दी जा सकती थी। ठीक है, यह कह सकते हैं कि इसका अर्थ यह नहीं कि आरोप साबित हो चुके हैं, लेकिन इसका यह भी मतलब नहीं कि पूरा मामला केवल राजनीतिक उत्पीड़न है। हिरासत और अधिकारों पर सवाल उठाए जा सकते हैं, लेकिन उन्हें अभियोजन के तथ्यों को खारिज करने का औजार बनाना कोई पत्रकारिता नहीं है।
लोकतांत्रिक समाज में मीडिया से अपेक्षा होती है कि वह समर्थन या विरोध से ऊपर उठकर दस्तावेजों को जनता के सामने रखे। इस मामले में कई रिपोर्टों ने "नैरेटिव वॉर" को प्राथमिकता दी और चुनिंदा आवाजों को ही सच की तरह पेश किया।
अंत में यह कहना गलत नहीं होगा कि मीडिया का एक हिस्सा अपनी वैचारिक प्राथमिकताओं के अनुसार रिपोर्टिंग कर रहा है और उसके इस करतूत को समझना आवश्यक है। दिल्ली में हुआ हिंदू-विरोधी दंगा एक वैचारिक प्रयोगशाला थी, एक भयावह हिंसा थी, जिसमें आम लोगों ने जान गंवाई। जब इस हिंसा से जुड़े मामलों में न्यायालय साजिश के संकेत देखती हैं, तो उसे केवल दमन कहकर खारिज करना न तो पीड़ितों के साथ न्याय है और न ही लोकतंत्र के प्रति ईमानदारी है।
उमर खालिद और शरजील इमाम के मामले में ट्रायल अभी बाकी है। सर्वोच्च न्यायालय ने अभियोजन की सामग्री को गंभीर मानते हुए जमानत से इनकार किया है। आगे का सत्य न्यायिक प्रक्रिया तय करेगी। मीडिया और उनके समर्थकों को सवाल उठाने का अधिकार है, लेकिन अदालत के सामने रखे गए तथ्यों को भी जनता के सामने रखना होगा, ताकि इस नैरेटिव वॉर का लाभ उठाने वाले गिद्ध सक्रिय ना हो सकें।