
छत्तीसगढ़ के कांकेर जिले के आमाबेड़ा क्षेत्र के बड़े तेवड़ा गांव में दिसंबर 2025 के मध्य जो घटा, उसे केवल एक स्थानीय विवाद कहकर टालना वास्तविकता से आंख चुराने जैसा होगा। शुरुआत अंतिम संस्कार के विवाद से हुई, लेकिन यह प्रकरण धीरे-धीरे ऐसे बिंदु पर पहुंचा, जहां जनजातीय परंपरा, अवैध मजहबी गतिविधियां, संगठित हिंसा, स्थानीय प्रशासनिक निष्क्रियता और फिर सर्व समाज का आक्रोश, सब एक-दूसरे में उलझते चले गए।
समझना यह भी है कि जिस मामले को राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय मीडिया का एक पक्ष “मजहबी अधिकार के हनन” के रूप में प्रस्तुत कर रहा है, वह दरअसल संविधान की पाँचवीं अनुसूची के उल्लंघन, बाहरी संगठनों का सुनियोजित दखल और कानून-व्यवस्था की विफलता से जुड़ा ऐसा जटिल प्रश्न बन चुका है, जिसका उत्तर देना अब आवश्यक है।
दरअसल, इस पूरे घटनाक्रम की शुरुआत 15 दिसंबर 2025 को होती है, जब बड़े तेवड़ा निवासी चमरा राम सलाम की मृत्यु कांकेर जिला अस्पताल में हुई। मृतक अपने जीवनकाल में ईसाई नहीं था और गांव में उसे एक सामान्य जनजातीय ग्रामीण के रूप में जाना जाता रहा, लेकिन उसकी मृत्यु के बाद अंतिम संस्कार को लेकर लिए गए फैसले ने ही गांव में विवाद की स्थिति पैदा की।

मृतक का पुत्र रजमन सलाम, जो वर्तमान में गांव का सरपंच है और जिसने ईसाई धर्म स्वीकार किया है, अपने पिता के शव को गांव लेकर पहुंचता है, और यहीं से विवाद शुरू होता है।
गांव के परंपरागत पदाधिकारी मांझी और गायता और स्थानीय ग्रामीण स्पष्ट रूप से कहते हैं कि बड़े तेवड़ा का श्मशान पेन-पुरखा परंपरा के अनुसार संचालित होता है और अंतिम संस्कार उसी पद्धति से होना चाहिए। लेकिन रजमन सलाम ने इस परंपरा को मानने से इंकार किया, जिसके बाद टकराव की स्थिति बनी।
बाद में मीडिया और प्रशासनिक अधिकारियों के बीच रजमन सलाम यह दावा करता है कि वह स्वयं जनजातीय रीति-रिवाज से अंतिम संस्कार चाहता था और उसने ग्रामीणों से इसका अनुरोध भी किया था, लेकिन उसे केवल “दो मुट्ठी मिट्टी” डालने की अनुमति तक नहीं दी गई। उसके अनुसार, इसी कारण उसे ईसाई रीति से दफन करना पड़ा।
यह दावा पहली नजर में तो सहानुभूति जगाने वाला लगता है, लेकिन जब स्थानीय ग्रामीणों के बयान, घटनास्थल के वीडियो और प्रत्यक्षदर्शियों की गवाही सामने आती है, तो यह कथा सवालों के घेरे में आ जाती है। तब पता चलता है कि रजमन जो कह रहा है, वह पूरी तरह से झूठ है।
ग्रामीणों का कहना है कि रजमन सलाम ने शुरुआत से ही ईसाई रीति से दफन पर जोर दिया और पेन-पुरखा की परंपरा को मानने से इनकार किया। उनका यह भी कहना है कि ग्राम सभा से किसी प्रकार की अनुमति नहीं ली गई और बाहरी पास्टरों व भीम आर्मी के लोगों को भी बुलाया गया।
विवाद को और गहरा करने वाला तथ्य यह है कि मृतक स्वयं ईसाई नहीं था। भारतीय कानून और न्यायिक व्याख्याओं के अनुसार, अंतिम संस्कार की विधि मृतक की आस्था, सामाजिक पहचान और स्थानीय कानून के अनुरूप होनी चाहिए। पाँचवीं अनुसूची क्षेत्र में यह अधिकार और सीमित हो जाता है, क्योंकि यहां ग्राम सभा और जनजातीय परंपरा की भूमिका भी महत्वपूर्ण है।
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इसके बावजूद रजमन सलाम ने ईसाई रीति से दफन पर जिस तरह जोर दिया गया, उसने यह तो स्पष्ट कर ही दिया था कि यह केवल पारिवारिक निर्णय नहीं था। इसके पीछे कहीं न कहीं भूमि-उपयोग, मजहबी प्रभाव का विस्तार या भविष्य में स्थायी मजहबी ढांचे (चर्च या प्रार्थना घर) की स्थापना जैसे उद्देश्य भी हो सकते हैं।

इसी मोड़ पर भीम आर्मी की भूमिका पर भी सवाल उठते हैं। 16 से लेकर 18 दिसंबर के बीच गांव में बाहरी लोगों की जिस तरह आमद हुई, वह स्वतःस्फूर्त नहीं लगती। गांव वालों का कहना है कि आसपास के गाँवों एवं अन्य जिलों से लोगों को बुलाया गया।
बाद में सामने आए डिजिटल साक्ष्यों के अनुसार, भीम आर्मी से जुड़े व्हाट्सएप समूहों और कॉल्स के जरिए आसपास के गांवों और अन्य जिलों से लोगों को बड़े तेवड़ा पहुंचने का आह्वान किया गया। यह आह्वान केवल समर्थन के लिए नहीं था; बल्कि लोगों को लाठी-डंडों और अन्य हथियारों के साथ आने को कहा गया।

17 दिसंबर को जो दृश्य सामने आया, उसने इन आरोपों को और गंभीर बना दिया। सैकड़ों की संख्या में बाहरी लोग, जिनमें कई के हाथों में लाठी, लोहे की रॉड और पत्थर थे, वो सभी गांव में पहुंचे। इसके बाद निहत्थे जनजातीय ग्रामीणों पर हमला हुआ। दर्जनों लोग घायल हुए, जिनमें कई को सिर, पीठ और हाथों में गंभीर चोटें आईं।
इस हमले में परगना के मांझी को भी गहरी चोट लगी, जिन्हें बाद में कांकेर के जिला अस्पतला में भर्ती करना पड़ा। लेकिन इस घटना को करीब से देखने पर यह दिखाई देता है कि यह हिंसा अचानक हुए झगड़े जैसी नहीं, बल्कि संगठित और सुनियोजित थी।

और फिर यहीं से “पूर्व नियोजित षड्यंत्र” का प्रश्न सामने आता है। पहले अवैध दफन, फिर बाहरी भीड़ का ठीक समय पर आगमन, उनके पास हथियारों की मौजूदगी और स्थानीय प्रशासन की निष्क्रियता, ये सभी घटनाएँ एक-दूसरे से जुड़े हुए दिखाई देते हैं।
यदि हम यह भी मान लें कि यह सब संयोग था, तो इतने सटीक समय पर इतनी बड़ी भीड़ कैसे एकत्र हो गई? और यदि यह षड्यंत्र नहीं था, तो हिंसा के लिए आवश्यक संसाधन और समन्वय कैसे हुआ? इस प्रश्न के उत्तर में ही में पूरे घटना की सच्चाई सामने आ सकती है।
वहीं, इस पूरे परिदृश्य में चर्च और भीम आर्मी के बीच संभावित नेक्सस से भी इंकार नहीं किया जा सकता। घटना स्थल पर स्थानीय स्तर पर चर्च से जुड़े पास्टरों की मौजूदगी और भीम आर्मी के कार्यकर्ताओं की सक्रियता, जिसमें दोनों के साझा हित सध रहें हों, इन सबने संदेह को बल दिया कि कहीं यह केवल वैचारिक समर्थन ही नहीं, बल्कि रणनीतिक सहयोग तो नहीं था?

बात यह भी है कि रजमन सलाम स्वयं भीम आर्मी की कांकेर इकाई का ज़िलाध्यक्ष है, जो खुद इस घटना के केंद्र में है। जांच का विषय यह भी है कि क्या चर्च की गतिविधियों को सामाजिक सुरक्षा देने के लिए भीम आर्मी जैसे संगठनों का उपयोग किया गया?
इसी संदर्भ में 18 दिसंबर को अक्रोशित जनजातीय ग्रामीणों द्वारा गाँव के भीतर ही 'कथित चर्च' में तोड़फोड़ का मामला सामने आया। मीडिया के कुछ हिस्सों और ईसाई संगठनों ने दावा किया कि जनजातीय ग्रामीणों ने चर्च को तोड़ा और इसमें आग लगाई।
हालांकि जमीनी पड़ताल करने पर यह प्रश्न उठता है कि जिस क्षेत्र में कानूनी रूप से पंजीकृत ईसाइयों की संख्या नगण्य है, वहां चर्च का अस्तित्व कैसे आया? एक बात यह भी है कि क्या इस 'कथित चर्च' लिए ग्राम सभा की अनुमति ली गई थी? क्या भूमि-उपयोग परिवर्तन की प्रक्रिया अपनाई गई थी? चूँकि यह पाँचवीं अनुसूची क्षेत्र है, तो क्या पाँचवीं अनुसूची के नियमों का पालन हुआ था?

इन सवालों के स्पष्ट जवाब अभी तक सामने नहीं आए हैं, लेकिन स्थानीय ग्रामीणों एवं बड़े तेवड़ा चर्च के लीडर से हुई बातचीत में यह पता चला है कि इस 'कथित चर्च' के लिए कोई अनुमति नहीं ली गई थी।
अब यह भी पता चला है कि इस घटना के बाद ईसाई संगठनों द्वारा रजमन सलाम से दूरी बनाई जा रही है। अब सोचिए कि जिस व्यक्ति के निर्णय पर इतना बड़ा विवाद हुआ और हिंसा हुई, उससे अचानक दूरी बनाने की वजह क्या हो सकती है?
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क्या यह संभावित कानूनी कार्रवाई से बचने का प्रयास है, या फिर जिम्मेदारी एक व्यक्ति पर डालकर चर्च स्वयं को अलग दिखाना चाहता है? सवाल कई हैं, लेकिन जवाब मिलना अभी भी बाक़ी है।
वहीं, इस प्रकरण में आर्थिक तंत्र और फंडिंग का पहलू भी अनदेखा नहीं किया जा सकता। चर्च निर्माण हो या मजहबी गतिविधियों का विस्तार करना हो, या तो भीम आर्मी का संगठनात्मक ढांचा खड़ा करना हो, इन सबके लिए संसाधनों की आवश्यकता होती है। अब बात यह है कि कांकेर में ये संसाधन कहां से आए, क्या इनमें NGO फंडिंग या विदेशी अनुदान शामिल है, और स्थानीय स्तर पर संपत्ति निर्माण व लेन-देन के स्रोत क्या हैं? ये सभी सवाल भी जांच के दायरे में आते हैं।

प्रशासनिक भूमिका पर नजर डालें तो सवाल और गंभीर हो जाते हैं। जिला पुलिस अधीक्षक, एसडीएम और तहसीलदार की भूमिका पूरे मामले में संदिग्ध दिखाई देती है।
पहले तो पुलिस एवं प्रशासन द्वारा अवैध दफन को समय रहते नहीं रोका गया, उसके बाद तहसीलदार ने ग्रामीणों द्वारा दिए गए आवेदन को घटनास्थल में ही स्वीकार नहीं किया। और तो और, शव को निकालकर ईसाई कब्रिस्तान में ले जाने का प्रशासन द्वारा दिए गए आश्वासनों का पालन भी नहीं हुआ। सबसे महत्वपूर्ण, ईसाइयों द्वारा शुरू की गई हिंसा के समय पुलिस द्वारा प्रभावी हस्तक्षेप नहीं किया गया।
यह सब प्रशासनिक अक्षमता थी या जानबूझकर अपनाया गया पक्षपात, इसका उत्तर तो निष्पक्ष जांच ही दे सकती है, लेकिन प्रथम दृष्ट्या यह दिखाई देता है कि जिस घटना को होने से पहले ही रोका जा सकता था, उसे स्थानीय प्रशासन एवं जिला पुलिस अधीक्षक द्वारा कहीं ना कहीं बढ़ने दिया गया।
यह अंतर क्यों किया गया? क्या यह केवल पुलिस विवेक का मामला था या किसी दबाव का परिणाम? यह भी जांच का विषय है। इसी तरह, पुलिस के साथ ईसाई पक्ष द्वारा की गई धक्का-मुक्की की घटना पर एफआईआर दर्ज न होना भी गंभीर सवाल खड़ा करता है।
अंततः अस्पताल की रिपोर्ट पर भी संदेह जताया गया है। द नैरेटिव की टीम ने स्वयं अस्पताल में जानकार देखा कि जिन जनजातीय ग्रामीणों को सिर और शरीर के अन्य हिस्सों में गंभीर चोटें आईं, उन्हें रिपोर्ट में “सामान्य चोट” बताया गया है। यहीं पर यह प्रश्न उठता है कि क्या यह अभियोजन को कमजोर करने का प्रयास था, और यदि हां, तो इसमें किसकी भूमिका थी?

आमाबेड़ा की घटना इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह पाँचवीं अनुसूची के तहत संरक्षित क्षेत्रों में कानून के शासन की वास्तविक स्थिति पर प्रकाश डालता है। यह मामला केवल एक दफन या एक हिंसक झड़प का नहीं है; यह उस बड़े प्रश्न का प्रतीक है कि क्या जनजातीय समाज की परंपरा, पहचान और संवैधानिक अधिकारों का जानबूझकर उल्लंघन किया जा रहा है? प्रश्न यह भी है कि बार-बार बस्तर में मिशनरियों द्वारा जनजातीय आस्था-परंपरा में हस्तक्षेप क्यों किया जा रहा है?
यदि इस पूरे प्रकरण की निष्पक्ष, गहन और निर्भीक जांच नहीं होती, तो यह घटना भविष्य में ऐसे ही टकरावों की भूमिका बन सकती है। तब यह कहना कठिन होगा कि यह केवल आमाबेड़ा की कहानी थी, क्योंकि वास्तव में यह कहानी राज्य की संवैधानिक जिम्मेदारी और सामाजिक संतुलन की परीक्षा बन चुकी है।