'लोकतंत्र' अमेरिका के लिए एक हथियार है

अमेरिका लोकतंत्र का दावा करता है, लेकिन तेल, डॉलर और रणनीतिक हितों के आगे उसके सिद्धांत कैसे बदल जाते हैं, सऊदी अरब इसका सबसे स्पष्ट उदाहरण है।

The Narrative World    08-Jan-2026
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अमेरिका हमेशा से यह कहता आया है कि वह लोकतंत्र का हिमायती है, वह विश्व में लोकतंत्र की रक्षा और स्थापना करना चाहता है, और तो और दुनिया के विभिन्न देशों में उसने "तथाकथित लोकतंत्र स्थापित" करने वाले सैन्य अभियान भी चलाए हैं, जिसमें हाल ही में हुआ वेनेजुएला का घटनाक्रम भी शामिल है।
 
लेकिन क्या आपने कभी गौर किया है कि अमेरिका कभी सऊदी अरब में लोकतंत्र लाने की बात नहीं करता, जबकि यह क्षेत्र इस्लामिक राजतंत्र का हिस्सा है। क्या यह अमेरिका की दोहरी नीति को उजागर नहीं करता?
 
दरअसल वॉशिंगटन और रियाद के बीच बना रिश्ता बीसवीं सदी के सत्तर के दशक में सामने आया था, जब 1973 के तेल संकट ने वैश्विक अर्थव्यवस्था और शक्ति-संतुलन को हिला दिया था। उसी दौर में अमेरिका और सऊदी अरब के बीच एक ऐसा रणनीतिक और आर्थिक तालमेल विकसित हुआ, जिसने एक ओर डॉलर को वैश्विक तेल व्यापार की धुरी बना दिया और दूसरी ओर सऊदी राजशाही को अमेरिकी सैन्य सुरक्षा की गारंटी दे दी। इसके बाद से ही यह साझेदारी आज तक जारी है, और वह भी बिना किसी लोकतांत्रिक शर्त के! क्यों? है ना चौंकाने वाली बात?
 
वास्तव में 1973 के अरब-इजराइल युद्ध के बाद लगाए गए तेल प्रतिबंधों ने पश्चिमी देशों को गहरे आर्थिक संकट में धकेल दिया था। इसी पृष्ठभूमि में अमेरिका ने सऊदी नेतृत्व के साथ एक ऐसी संधि करने की योजना बनाई, जिसने उसे आज तक वैश्विक महाशक्ति बनाकर रखा है।
 
इस संधि के तहत सऊदी अरब ने अपने कच्चे तेल की बिक्री मुख्यतः अमेरिकी डॉलर में करने का फ़ैसला किया और तेल से मिले राजस्व का बड़ा हिस्सा अमेरिकी वित्तीय संस्थानों और ट्रेजरी बॉन्ड में निवेश किया। इसके बदले में अमेरिका ने सऊदी शासन की सुरक्षा को अपनी रणनीतिक प्राथमिकता के तौर पर रखने की गारंटी दी। ध्यान रहे, यह कोई औपचारिक संधि नहीं थी, बल्कि वर्षों में विकसित हुई ऐसी व्यवस्था थी जिसने दोनों देशों के हितों को गहराई से जोड़ दिया।
 
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यहीं से ‘पेट्रोडॉलर सिस्टम’ की शुरूआत हुई। इस ‘पेट्रोडॉलर सिस्टम’ ने डॉलर की वैश्विक मांग को स्थिर कर ना सिर्फ़ अमेरिका को तात्कालिक रूप से मजबूत किया, बल्कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था को दीर्घकालिक लाभ भी पहुँचाया। वहीं दूसरी ओर, सऊदी अरब को तेल से मिली समृद्धि के सहारे बुनियादी ढाँचे और उपभोग आधारित आधुनिकीकरण का अवसर मिला, जो हम आज देखते हैं।
 
स्थिति ऐसी रही कि विश्व में लोकतंत्र के नाम पर तमाम ढोल पीटने वाले अमेरिका से संधि करने के बाद सऊदी अरब आज भी पूर्ण राजशाही बना हुआ है। यहाँ ना कभी राष्ट्रीय चुनाव हुए, ना राजनीतिक दलों को स्थापित होने की अनुमति मिली और ना ही अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को कोई संस्थागत संरक्षण मिला।
 
 
और तो और, मानवाधिकार संगठनों की रिपोर्ट्स लगातार नागरिक अधिकारों के दमन, असहमति पर कठोर कार्रवाई और न्यायिक पारदर्शिता की कमी की ओर इशारा करती रही हैं। इसके बावजूद अमेरिका ने कभी सऊदी शासन पर लोकतांत्रिक सुधारों के लिए वैसा दबाव नहीं बनाया, जैसा उसने अन्य देशों के मामले में दिखाया है। 
यही वह नीति है, जहाँ अमेरिकी विदेश नीति का दोहरा मानदंड सामने आ जाता है। जिन देशों में अमेरिकी रणनीतिक या आर्थिक हित नहीं रहे, वहाँ अमेरिका ने “लोकतंत्र”, “मानवाधिकार” और “जनता की आज़ादी” के नाम पर सैन्य हस्तक्षेप या शासन परिवर्तन किया।
 
इराक, लीबिया और अफग़ानिस्तान और अब वेनेजुएला इसके प्रमुख उदाहरण हैं। वहीं, इसके उलट, खाड़ी क्षेत्र के उन देशों में जहाँ ऊर्जा संसाधन, सैन्य अड्डे और वित्तीय हित जुड़े हैं, वहाँ लोकतंत्र का प्रश्न कभी सामने आया ही नहीं।
 
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सऊदी अरब के साथ अमेरिका का रिश्ता इस "दोहरी नैतिकता" का सबसे ठोस उदाहरण है। हाल के वर्षों में सऊदी राजशाही पर गंभीर मानवाधिकार आरोप लगे, जिनमें राजनीतिक हत्याएँ, फाँसी की बढ़ती संख्या और असहमति के दमन से जुड़े मामले शामिल भी हैं। अंतरराष्ट्रीय आलोचना के बावजूद, अमेरिका और सऊदी अरब के बीच हथियारों की बिक्री, सैन्य सहयोग और सुरक्षा साझेदारी निर्बाध रूप से चलती रही।
 
इस पूरी अमेरिकी "दोहरी नीति" को समझना इसलिए भी आवश्यक है क्योंकि इस पूरे संदर्भ में पेट्रोडॉलर केवल एक आर्थिक अवधारणा नहीं, बल्कि एक राजनीतिक उपकरण भी है। एक ओर जहाँ डॉलर में तेल व्यापार ने अमेरिका को वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में असाधारण प्रभाव दिया और मध्य-पूर्व में उसकी रणनीतिक मौजूदगी को मजबूती दी। वहीं बदले में, सऊदी शासन को अंतरराष्ट्रीय दबावों से एक तरह का सुरक्षा कवच मिला, जिसके भीतर उसने अपने राजशाही राजनीतिक ढाँचे को यथावत रखा।
 
 
इसीलिए यह कहना जरूरी है कि "लोकतंत्र" अमेरिकी विदेश नीति का सार्वभौमिक सिद्धांत नहीं, बल्कि एक हथियार है, जिसका प्रयोग वहीं किया जाता है, जहाँ "लोकतंत्र" अमेरिका के रणनीतिक समीकरणों को नुकसान नहीं पहुँचाता।