जंगल और पहाड़ों से निकला एक जनजातीय युवक कैसे ब्रिटिश सत्ता की नींद उड़ाने लगा, यही कहानी है जबरा पहाड़िया से बाबा तिलका मांझी बनने की। अठारहवीं शताब्दी के बिहार में उन्होंने ज़मींदारी अत्याचार और अंग्रेजी दमन के खिलाफ पहाड़िया और संथाल समुदायों को संगठित कर सशस्त्र प्रतिरोध खड़ा किया। भागलपुर से उठा यह संघर्ष अंग्रेजी शासन की दमनकारी नीतियों और अन्यायपूर्ण व्यवस्था के खिलाफ खुली चुनौती बनकर सामने आया। बलिदान के बाद भी वे लोकगीतों और स्मृतियों में जीवित रहे और डर के सामने भरोसे का नाम बन गए।
जनजातीय स्वाभिमान की पहली आवाज़
यदि भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को केवल कागज़ी इतिहास के रूप में नहीं, बल्कि मनुष्यों की पीड़ा, साहस और सामूहिक स्मृति के रूप में देखा जाए, तो जिन नामों की उपस्थिति सबसे पहले महसूस होती है, उनमें बाबा तिलका मांझी का नाम स्वाभाविक रूप से उभरता है। वे किसी राजसत्ता को हथियाने वाले योद्धा नहीं थे। उन्होंने अंग्रेजी दमन और अत्याचार के विरुद्ध अपने समाज को संगठित किया और अन्याय के खिलाफ संघर्ष का रास्ता चुना। वे साधारण जनजातीय परिवार से निकले, लेकिन अपने साहस और संकल्प से असाधारण बन गए।
एक जनजातीय बालक से योद्धा बनने की यात्रा
11 फरवरी 1750 को बिहार के सुल्तानगंज क्षेत्र के तिलकपुर गांव में एक संथाल परिवार में उनका जन्म हुआ। उनका वास्तविक नाम जबरा पहाड़िया था। उनके पिता का नाम सुंदरा मुर्मू था। उनका बचपन किसी राजमहल में नहीं, बल्कि जंगलों, पहाड़ियों और श्रम से भरे जनजातीय परिवेश में बीता। यही परिवेश उनके व्यक्तित्व को मजबूत बनाता गया।
ब्रिटिश सत्ता ने उन्हें 'तिलका मांझी' नाम दिया, किंतु आगे चलकर यही नाम जनजातीय प्रतिरोध का प्रतीक बन गया। यह नाम भय का नहीं, बल्कि निर्भीकता और संघर्ष का पर्याय बन गया।
जनजातीय समाज के रक्षक के रूप में भूमिका
अठारहवीं शताब्दी में अंग्रेजी सत्ता और उससे जुड़े ज़मींदारों ने जनजातीय इलाकों में कर वसूली, बेदखली और धार्मिक हस्तक्षेप बढ़ाना शुरू किया। इन कदमों ने सामाजिक संतुलन को बिगाड़ दिया। तिलका मांझी ने इन घटनाओं को राजनीतिक अन्याय और दमन की रणनीति के रूप में पहचाना। उन्होंने स्पष्ट रूप से इसका विरोध किया।
उन्होंने पहाड़िया और संथाल समुदायों को एकजुट किया। उन्होंने लोगों को संगठित कर अंग्रेजी सत्ता के खिलाफ प्रतिरोध की भावना जगाई। उन्होंने जनजातीय समाज को यह विश्वास दिलाया कि संगठित शक्ति के सामने दमन टिक नहीं सकता।
उनका योगदान केवल युद्ध तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने अपने समाज को नेतृत्व दिया और अन्याय के सामने झुकने से इंकार करने की प्रेरणा दी। उन्होंने स्पष्ट किया कि संघर्ष केवल हथियारों से नहीं, बल्कि साहस और संगठन से भी लड़ा जाता है।
ब्रिटिश सत्ता के लिए भय, जनजातियों के लिए भरोसा
भागलपुर और उसके आसपास के क्षेत्रों में उनका नाम अंग्रेज अधिकारियों के लिए भय का कारण बन गया। उन्होंने स्थानीय जनजातीय समुदायों को संगठित कर जंगल और पहाड़ी इलाकों से अंग्रेजी सत्ता के खिलाफ सशस्त्र संघर्ष चलाया। उनकी रणनीति ने ब्रिटिश प्रशासन को अस्थिर कर दिया।
उधर जनजातीय समाज उन्हें भरोसे के प्रतीक के रूप में देखने लगा। जब ज़मींदारों का अत्याचार बढ़ता, तब लोगों को विश्वास रहता कि तिलका अन्याय का डटकर सामना करेंगे। उन्होंने लोगों के भीतर यह भावना जगाई कि संगठित प्रतिरोध से अन्याय को चुनौती दी जा सकती है।
बलिदान के बाद भी जीवित रहने वाला योद्धा
अंततः अंग्रेजों ने उन्हें पकड़ लिया और भागलपुर में सरेआम फांसी दे दी। उन्होंने उनके शरीर को समाप्त कर दिया, किंतु उनके विचारों को समाप्त नहीं कर सके। उन्होंने अंग्रेजी शासन के खिलाफ संघर्ष करते हुए वीरगति प्राप्त की।
तिलका मांझी जनजातीय समाज की स्मृतियों, गीतों और कथाओं में आज भी जीवित हैं। कहा जाता है कि अनेक जनजातीय योद्धा उनके गीत गाते हुए फांसी के फंदे तक पहुंचे।
लोकगीतों और कविताओं में उनकी स्मृति बार-बार जीवित होती है:
"तुम पर कोड़ों की बरसात हुई,
तुम घोड़ों में बांधकर घसीटे गए,
फिर भी तुम्हें मारा नहीं जा सका,
तुम भागलपुर में सरेआम,
फांसी पर लटका दिए गए,
फिर भी डरते रहे ज़मींदार और अंग्रेज़,
तुम्हारी तिलका (गुस्सैल) आंखों से,
मर कर भी तुम मारे नहीं जा सके।"
बाबा तिलका मांझी किसी एक जयंती या आयोजन तक सीमित नायक नहीं हैं। वे उस चेतना का प्रतिनिधित्व करते हैं जिसने अंग्रेजी दमन के सामने झुकने से इंकार किया। उन्होंने अपने समय में अन्याय के विरुद्ध संघर्ष की जो मशाल जलाई, उसने आगे आने वाले आंदोलनों को भी प्रेरित किया।
आज जब इतिहास के पन्नों को नए सिरे से पढ़ा जा रहा है, तब तिलका मांझी केवल अतीत के पात्र नहीं दिखाई देते। वे उस साहस और संकल्प के प्रतीक के रूप में सामने आते हैं, जिसने अंग्रेजी सत्ता को चुनौती दी और प्रतिरोध की परंपरा को मजबूत किया।
लेख
मोक्षी जैन
उपसंपादक, द नैरेटिव