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बीते 18 फरवरी, 2026 को सर्वोच्च न्यायालय ने एक याचिका पर सुनवाई करते हुए नोटिस जारी किया और अंतरिम आदेश में कहा कि छत्तीसगढ़ में फिलहाल दफनाए गए शवों का आगे उत्खनन नहीं किया जाएगा। यह याचिका Chhattisgarh Association for Justice and Equality & Ors. विरुद्ध State of Chhattisgarh के रूप में दायर की गई है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि छत्तीसगढ़ के विभिन्न जनजाति बहुल गांवों में "ईसाई जनजाति" परिवारों को गांव की सीमा के भीतर दफन की अनुमति नहीं दी जा रही।
लेकिन अब देखा जाए तो यह मामला केवल शव दफन की अनुमति का नहीं रह गया है। जनजाति समाज इसे पेन-पुरखा की भूमि पर बाहरी रिलीजियस दावेदारी के रूप में देख रहा है। उनके लिए गांव की सीमा, वनक्षेत्र और परंपरागत श्मशान स्थल महज भूमि नहीं, बल्कि पूर्वजों और देवस्थलों से जुड़ा पवित्र भौगोलिक क्षेत्र है। ऐसे में गांव के भीतर विदेशी रिलीजियस प्रथाओं के लिए नए शव-दफन स्थलों या निजी भूमि पर विदेशी रिलीजियस प्रतीकों की स्थापना को वे अपनी सांस्कृतिक संरचना में हस्तक्षेप मानते हैं।
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ईसाइयों के द्वारा दायर की गई याचिका के सिनॉप्सिस में कहा गया है कि ईसाइयों को गांव की सीमा के भीतर स्थित दफन स्थलों का उपयोग करने से रोका जा रहा है, जबकि अन्य समुदायों को इसकी अनुमति है। सर्वोच्च न्यायालय ने नोटिस जारी किया और अंतरिम तौर पर शव के उत्खनन पर रोक लगाई। हालाँकि अंतिम निर्णय अभी लंबित है। पर इस बीच जमीनी स्तर पर बहस तेज हो चुकी है कि क्या गांव की सामुदायिक भूमि पर निजी रिलीजियस दावे संवैधानिक ढांचे के अनुरूप हैं?
16 जनवरी 2025 को छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने एक मामले में कहा था कि गांव के भीतर इस तरह से दफन की अनुमति देने से अशांति फैल सकती है और ईसाई समुदाय के लिए अलग कब्रिस्तान पहले से ही समीप में उपलब्ध है। अदालत ने स्पष्ट किया था कि निकटवर्ती ईसाई कब्रिस्तान में अंतिम संस्कार किया जा सकता है, लेकिन गांव की सीमा के भीतर निजी भूमि पर दफन की अनुमति नहीं दी जाएगी। इस आदेश को जनजाति समुदायों ने अपनी पारंपरिक संरचना की पुष्टि के रूप में देखा था।
वहीं राज्य में लागू पंचायत राज नियम, 1999 के तहत शवों के निस्तारण के लिए पंचायत द्वारा अनुमोदित स्थान के अतिरिक्त अन्य किसी स्थान का उपयोग नहीं किया जा सकता। संवैधानिक ब्रीफ में भी स्पष्ट किया गया है कि अनुच्छेद 21 के तहत गरिमा का अधिकार “procedure established by law” के अधीन है। इसका सीधा अर्थ है कि अंतिम संस्कार का अधिकार है, पर उसका स्थान और तरीका वैधानिक ढांचे के भीतर विनियमित हो सकता है।
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इसके अलावा पांचवीं अनुसूची के अंतर्गत अनुसूचित क्षेत्रों में ग्राम सभा को विशेष अधिकार प्राप्त हैं। ऐसे क्षेत्रों को सामान्य प्रशासनिक इकाई की तरह नहीं देखा जा सकता, इसे संवैधानिक संरक्षण प्राप्त है। इसीलिए व्यक्तिगत अधिकारों की व्याख्या इस संरचनात्मक सुरक्षा से अलग करके नहीं की जानी चाहिए।
दरअसल, बस्तर क्षेत्र में हाल के वर्षों में शव-दफन को लेकर कई विवाद सामने आए हैं। कांकेर से लेकर सुकमा तक कन्वर्टेड ईसाइयों द्वारा पारंपरिक भूमि पर ज़बरन शव दफन के प्रयासों ने सामाजिक तनाव और झड़पों को जन्म दिया है। आमाबेड़ा जैसी घटना में तो संगठित गतिविधियों के आरोप भी दर्ज हैं।

इन सब को देखते हुए जनजाति संगठनों का कहना है कि जब निजी भूमि पर दफन को सामुदायिक स्वीकृति के बिना अंजाम दिया जाता है, तो यह केवल रिलीजियस प्रक्रिया नहीं होती, बल्कि पवित्र भूमि पर स्थायी दावा बन जाता है।
यहीं से विवाद का केंद्र स्पष्ट होता है। क्या यह केवल धार्मिक स्वतंत्रता का प्रश्न है, या फिर जनजातियों के पेन-पुरखा की भूमि पर नैतिक और वैधानिक दावेदारी का मुद्दा? यदि न्यायालय गांव की सीमा के भीतर दफन के अधिकार को पूर्ण मानती है, तो ग्राम सभा और पंचायत की भूमिका सीमित हो सकती है। यदि न्यायालय यह मानती है कि दफन एक विनियमित नागरिक गतिविधि है, तो पेन-पुरखा भूमि की रक्षा का तर्क मजबूत होगा।

फिलहाल सर्वोच्च न्यायालय ने केवल नोटिस जारी किया है और स्थिति यथावत रखने का निर्देश दिया है। अंतिम निर्णय आने में समय लगेगा। पर यह स्पष्ट है कि यह मामला केवल एक धार्मिक अधिकार का विवाद नहीं, बल्कि जनजातीय अस्मिता, सामुदायिक भूमि और संवैधानिक संतुलन की परीक्षा बन चुका है। आने वाला फैसला यह तय करेगा कि पेन-पुरखा की भूमि पर दावा किस हद तक वैधानिक माना जाएगा और ग्राम स्वायत्तता की सीमाएं क्या होंगी।