प्रधानमंत्री मोदी की बौद्ध कूटनीति: 'भगवान बुद्ध की भूमि' का नारा दक्षिण-पूर्व एशिया में चीन की बढ़त रोकने का मजबूत कदम

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में भारत एआई इम्पैक्ट समिट 2026 में भारत को "भगवान बुद्ध की भूमि" बताकर एक मजबूत भू-राजनीतिक संदेश दिया। यह बयान केवल आध्यात्मिक नहीं, बल्कि दक्षिण-पूर्व एशिया में चीन की बढ़ती सांस्कृतिक और आर्थिक पहुंच को संतुलित करने की चतुर रणनीति है। बौद्ध विरासत के जरिए भारत अपनी सॉफ्ट पावर को मजबूत कर रहा है।

The Narrative World    24-Feb-2026   
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में भारत एआई इम्पैक्ट समिट 2026 के उद्घाटन सत्र में कहा, "भारत भगवान बुद्ध की भूमि है, और भगवान बुद्ध ने कहा है कि सही समझ से सही कर्म होता है।" यह बयान केवल आध्यात्मिक संदेश नहीं था, बल्कि एक साफ भू-राजनीतिक संकेत था। कृत्रिम बुद्धिमत्ता (Artificial Intelligence) की नैतिक और तकनीकी मुद्दों पर वैश्विक बहस के बीच प्रधानमंत्री ने भारत को शांति, समझ और मानव-केंद्रित विकास का प्रतीक पेश किया।
 
यह मोदी सरकार की बौद्ध कूटनीति का वक ऐसा अध्याय है, जो दक्षिण-पूर्व एशिया में सांस्कृतिक और रणनीतिक बढ़त हासिल करने की दिशा में एक सोचा-समझा प्रयास है। भू-राजनीतिक विशेषज्ञ मानते हैं कि यह कदम चीन की बढ़ती सांस्कृतिक और आर्थिक पहुंच को संतुलित करने में अहम भूमिका निभा सकता है।
 
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का यह बयान 19 फरवरी 2026 को नई दिल्ली के भारत मंडपम में आयोजित भारत एआई इम्पैक्ट समिट के नेताओं के सत्र के दौरान आया, जहां फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों, संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस और दुनिया के प्रमुख तकनीकी नेताओं की मौजूदगी थी। प्रधानमंत्री ने एआई को मानवता के लिए अवसर बताते हुए बौद्ध दर्शन का जिक्र किया। लेकिन इसकी जड़ें गहरी हैं।
 
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पिछले एक दशक से अधिक समय से मोदी भारत को "भगवान बुद्ध की भूमि" के रूप में पेश करते आए हैं। 2017 में जापान यात्रा के दौरान उन्होंने यही बात कही थी। 2025 में ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में भी उन्होंने कहा कि भारत भगवान बुद्ध और महात्मा गांधी की भूमि है, जहां युद्ध और हिंसा की कोई जगह नहीं। इसी तरह 2024 और 2025 में विभिन्न मंचों पर उन्होंने बौद्ध विरासत को भारत की सॉफ्ट पावर का केंद्र बनाया।
 
मोदी काल में बौद्ध कूटनीति रणनीतिक स्तर पर पहुंच गई है। प्रधानमंत्री ने बोधगया, सारनाथ और कुशीनगर जैसे स्थलों के विकास पर जोर दिया। कुशीनगर अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे के उद्घाटन के समय उन्होंने इसे बौद्ध समाज के लिए समर्पित बताया। लुंबिनी में भारत अंतरराष्ट्रीय बौद्ध संस्कृति और विरासत केंद्र की आधारशिला, थाईलैंड, भूटान और म्यांमार जैसे देशों में बुद्ध के पवित्र अवशेषों का भेंट स्वरूप भेजना, और अंतरराष्ट्रीय बौद्ध सम्मेलनों का आयोजन, ये कदम भारत की सभ्यतागत कूटनीति का हिस्सा हैं। संसद में सरकार ने हाल ही में कहा कि साझा बौद्ध विरासत भारत-आसियान संबंधों को मजबूत कर रही है।
 
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दक्षिण-पूर्व एशिया में थाईलैंड, म्यांमार, कंबोडिया और लाओस जैसे देशों में थेरवाद बौद्ध धर्म प्रमुख है, जो मूल रूप से भारत से फैला। इन देशों में बौद्ध मठ और समुदाय सामाजिक-राजनीतिक जीवन का अभिन्न हिस्सा हैं। चीन ने बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव के तहत इन देशों में मठों, स्मारकों और सांस्कृतिक परियोजनाओं पर भारी निवेश किया है। ऐसे में भारत का "भगवान बुद्ध की भूमि" का नारा इन देशों के साथ सभ्यतागत भाईचारा स्थापित करता है। यह सांस्कृतिक जुड़ाव के साथ-साथ चीन की आक्रामक सॉफ्ट पावर को जवाब देने का तरीका भी है।
 
 
अमेरिका ने भी अतीत में तिब्बती बौद्ध नेटवर्क का इस्तेमाल किया था। 1950-70 के दशक में सीआईए ने दलाई लामा और तिब्बती निर्वासितों को समर्थन देकर चीन के खिलाफ रणनीति बनाई थी। ओबामा के राष्ट्रपति काल में भी दक्षिण-पूर्व एशियाई बौद्ध नेटवर्क का उपयोग चीन के प्रभाव को कम करने के लिए किया गया था। मोदी का यह कदम उसी तरह की सॉफ्ट पावर रणनीति का भारतीय संस्करण है, जो अधिक प्रामाणिक और ऐतिहासिक आधार पर टिका हुआ है। भारत बौद्ध सर्किट विकसित कर रहा है, जो पर्यटन के साथ लोगों से लोगों का जुड़ाव बढ़ाता है। बिम्सटेक जैसे मंचों पर बौद्ध पर्यटन सर्किट को बढ़ावा दिया जा रहा है, जिसमें चीन शामिल नहीं है।
 
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यह कूटनीति क्षेत्रीय से आगे वैश्विक स्तर पर भी प्रभावी साबित हो रही है। संयुक्त राष्ट्र महासभा में 2019 में मोदी ने कहा था कि भारत ने दुनिया को युद्ध नहीं, बुद्ध दिया। रूस-यूक्रेन संघर्ष के दौरान "युद्ध नहीं बुद्ध" का नारा भारत की मध्यस्थता की भूमिका को मजबूत करता है। एआई समिट में बौद्ध दर्शन का जिक्र करके प्रधानमंत्री ने भारत को नैतिक तकनीकी नेतृत्व के रूप में पेश किया, जो पश्चिमी और पूर्वी दोनों दुनिया के लिए आकर्षक है।
 
इस विषय पर कुछ समूह इसे हिंदू राष्ट्रवाद से समझौता मान रहे हैं, लेकिन यह राष्ट्रीय हितों को सर्वोपरि रखने की परिपक्व राजनीति है। बुद्ध स्वयं सनातन परंपरा से निकले थे और उनका दर्शन हिंदू दर्शन से जुड़ा है। मोदी का यह कदम राष्ट्रीय सुरक्षा और प्रभाव क्षेत्र को मजबूत करने का है। थाईलैंड में बुद्ध अवशेषों का स्वागत, भूटान में गहरे संबंध, म्यांमार में सांस्कृतिक सहयोग, ये सब चीन की आक्रामकता के जवाब में भारत की शांतिपूर्ण लेकिन दृढ़ रणनीति हैं।
 
 
आगे भारत को इस दिशा में और कदम उठाने होंगे। बौद्ध भिक्षुओं के आदान-प्रदान को बढ़ाना, संयुक्त अनुसंधान केंद्र स्थापित करना और आसियान देशों के साथ बौद्ध विरासत आधारित समझौते करना जरूरी है। चीन की आर्थिक ताकत के मुकाबले भारत की सॉफ्ट पावर अधिक स्थायी और गहरी है, क्योंकि यह ऐतिहासिक सत्य पर टिकी है। प्रधानमंत्री मोदी की यह पहल भारत को एशिया में नैतिक और सांस्कृतिक नेता के रूप में स्थापित कर रही है।
 
जब दुनिया विभाजन और संघर्ष से जूझ रही है, तब भारत का "भगवान बुद्ध की भूमि" का संदेश शांति का पुल बन सकता है। यह कूटनीति न केवल चीन को संतुलित करती है, बल्कि भारत को वैश्विक मंच पर सम्मानजनक स्थान दिलाती है। मोदी सरकार की यह रणनीति दूरदर्शी है और आने वाले वर्षों में इसके असर साफ दिखेंगे।

शुभम उपाध्याय

संपादक, स्तंभकार, टिप्पणीकार