छत्तीसगढ़ के राज्यपाल रामेन डेका के
अनुसार, पिछले दो वर्षों में कुल 532 माओवादी मारे गए हैं, 2704 नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया है और 2004 को गिरफ्तार किया गया है। ये आंकड़े संकेत देते हैं कि जो नक्सलवाद कभी राज्य के कई इलाकों में गहराई तक जड़ें जमा चुका था, वह अब धीरे-धीरे कमजोर पड़ रहा है।
छत्तीसगढ़ के अनेक जनजाति और ग्रामीण क्षेत्रों ने चार दशकों तक नक्सली हिंसा का दर्द सहा है। हजारों लोगों ने अपनी जान गंवाई, अनेक परिवार उजड़ गए। कई लोगों ने अपनी आंखों की रोशनी खो दी, तो कुछ IED ब्लास्ट में अपने हाथ-पैर गंवा बैठे। ये केवल आंकड़े नहीं हैं, बल्कि उन परिवारों की पीड़ा की कहानी हैं जिन्होंने हिंसा के कारण अपना सब कुछ खो दिया। अब सुरक्षा बलों के साहस और सरकार की योजनाओं के कारण राज्य नक्सल-मुक्त भविष्य की ओर बढ़ता दिखाई दे रहा है।
छत्तीसगढ़ लंबे समय से नक्सल हिंसा की मार झेलता रहा है, लेकिन अब हालात बदलते नजर आ रहे हैं। 23 फरवरी 2026, सोमवार को विधानसभा सत्र के दौरान अपने संबोधन में राज्यपाल रामेन डेका ने कहा कि राज्य में माओवादी आतंक का अंत अब करीब है। पिछले दो वर्षों में सुरक्षा बलों की लगातार कार्रवाई और सरकार की प्रभावी पुनर्वास नीतियों के कारण नक्सलवाद को बड़ा झटका लगा है।
विधानसभा में अपने संबोधन में राज्यपाल ने कहा कि राज्य की आकर्षक आत्मसमर्पण और पुनर्वास नीति ने गुमराह युवाओं को मुख्यधारा में लौटने का अवसर दिया है। जो लोग कभी हथियार उठाकर जंगलों में छिपे रहते थे, वे अब सामान्य जीवन जीने के लिए आगे बढ़ते नजर आ रहे हैं। उन्होंने कहा, "जब आतंक की छाया कम होती है, तो विकास की रोशनी अपने आप फैलने लगती है और लोगों के जीवन में नया विश्वास एवं उम्मीद पैदा होती है।"
राज्यपाल ने बताया कि नक्सल प्रभावित गांवों में "नियाद नेल्ला नार योजना" के माध्यम से बुनियादी सुविधाएं पहुंचाई जा रही हैं। इस योजना के तहत 17 विभाग मिलकर काम कर रहे हैं और ग्रामीणों को 25 कल्याणकारी योजनाओं तथा 18 सामुदायिक सुविधाओं का लाभ दिया जा रहा है।
बस्तर जैसे इलाके, जिन्हें कभी
नक्सलवाद का गढ़ माना जाता था, वहां अब विकास की नई कहानी लिखी जा रही है। सरकार ने 146 सड़क और पुल परियोजनाओं के लिए 1,109 करोड़ रुपये स्वीकृत किए हैं। इनमें से कई परियोजनाएं पूरी हो चुकी हैं और शेष पर कार्य जारी है। इसके अतिरिक्त नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में 728 मोबाइल टावर लगाए गए हैं और 449 टावरों को 4G सेवाओं में अपग्रेड किया गया है। जो गांव कभी दुनिया से कटे हुए थे, वे आज मोबाइल नेटवर्क, DTH सेवाओं और बिजली की सुविधा से जुड़ रहे हैं।
शिक्षा और स्वास्थ्य क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण सुधार किए गए हैं। 31 नए प्राथमिक स्कूल और 19 उप-स्वास्थ्य केंद्रों को मंजूरी दी गई है। साथ ही 11,000 से अधिक बच्चों और महिलाओं का टीकाकरण किया गया है। सरकार का उद्देश्य केवल सुरक्षा सुनिश्चित करना नहीं, बल्कि लोगों को बेहतर जीवन उपलब्ध कराना भी है।
राज्यपाल ने कहा कि अब बस्तर की पहचान हिंसा से नहीं, बल्कि उसकी प्राकृतिक सुंदरता और सांस्कृतिक समृद्धि से होगी। उन्होंने कहा कि दुनिया अब बारूद के धुएं के बजाय बस्तर के भव्य चित्रकोट झरने को देखेगी। छत्तीसगढ़ जल्द ही "खेलो इंडिया ट्राइबल गेम्स" की मेजबानी करेगा, जो राज्य की जनजाति संस्कृति और प्रतिभा को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाएगा।
कृषि क्षेत्र में भी राज्य ने उल्लेखनीय प्रगति दर्ज की है। इस वर्ष 25.24 लाख किसानों से न्यूनतम समर्थन मूल्य पर 141.04 लाख मीट्रिक टन धान की खरीद की गई है, जिसके बदले किसानों को 33,431 करोड़ रुपये का भुगतान किया गया। इसके अतिरिक्त कृषक उन्नति योजना के तहत किसानों को होली से पहले अतिरिक्त 10,292 करोड़ रुपये प्रदान किए जाएंगे।
महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए "महतारी वंदन योजना" के अंतर्गत लगभग 69 लाख महिलाओं को प्रतिमाह 1,000 रुपये सीधे उनके बैंक खातों में दिए जा रहे हैं। स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत बनाने के उद्देश्य से नवा रायपुर में 680 करोड़ रुपये की लागत से बॉम्बे अस्पताल का निर्माण किया जा रहा है।
राज्य में बुनियादी ढांचे के विकास पर भी विशेष ध्यान दिया जा रहा है। रायपुर से विशाखापत्तनम और रायपुर से धनबाद एक्सप्रेसवे का निर्माण कार्य जारी है। मुख्यमंत्री ग्रामीण बस सेवा योजना के तहत 330 दूरदराज गांवों को पहली बार बस सेवाओं से जोड़ा गया है।
राज्यपाल ने कहा कि छत्तीसगढ़ ने वर्ष 2047 तक विकसित राज्य बनने का लक्ष्य निर्धारित किया है। इस दिशा में "अंजोर विजन डॉक्यूमेंट" के माध्यम से निरंतर कार्य किया जा रहा है। आज छत्तीसगढ़ एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहां कभी डर और हिंसा का वातावरण रहता था, वहीं अब विकास, विश्वास और नए भविष्य की उम्मीद दिखाई दे रही है। नक्सलवाद के अंधकार से निकलकर राज्य अब शांति और प्रगति की दिशा में आगे बढ़ रहा है।
रिपोर्ट
मोक्षी जैन
उपसंपादक, द नैरेटिव