छत्तीसगढ़ विधानसभा ने 19 मार्च को बहुचर्चित धर्म स्वातंत्र्य विधेयक, 2026 को
पारित कर दिया, जिसे राज्य सरकार ने सामाजिक स्थिरता, जनजातीय संस्कृति की रक्षा और
अवैध धर्मांतरण पर रोक लगाने के लिए आवश्यक बताया है।
इस महत्वपूर्ण विधेयक के पारित होने के दौरान कांग्रेस ने सदन से वॉकआउट किया, जिस पर भाजपा ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए इसे “वोट बैंक की राजनीति से प्रेरित पलायन” बताया। भाजपा का आरोप है कि कांग्रेस का यह रुख न केवल राज्य के हितों के खिलाफ है, बल्कि जनजातीय समाज की सांस्कृतिक और अस्मिता को कमजोर करने वाला भी है।
विधेयक का उद्देश्य केवल धर्मांतरण को नियंत्रित करना नहीं, बल्कि उस जटिल सामाजिक वास्तविकता को संबोधित करना है, जो पिछले वर्षों में छत्तीसगढ़ के विभिन्न हिस्सों में बार-बार सामने आई है।
नारायणपुर, कोंडागांव, कांकेर के आमाबेड़ा जैसे जनजातीय क्षेत्रों से लेकर दुर्ग, भिलाई, रायपुर और कोरबा जैसे शहरी इलाकों तक धर्मांतरण से जुड़े विवादों ने कई बार कानून व्यवस्था को चुनौती दी है। इन घटनाओं में अक्सर यह आरोप सामने आया कि धर्म परिवर्तन स्वैच्छिक नहीं बल्कि प्रलोभन, दबाव या संगठित हस्तक्षेप के माध्यम से कराया गया।
यह समझना आवश्यक है कि छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में धर्मांतरण को केवल व्यक्तिगत आस्था का विषय मानना वास्तविकता से आँख मूंदना है। यहाँ विशेष रूप से जनजातीय क्षेत्रों में सामाजिक जीवन सामाजिक ढाँचे पर आधारित है, जहाँ किसी एक व्यक्ति की आस्था में बदलाव पूरे समुदाय के संतुलन को प्रभावित करता है। यही कारण है कि यह विधेयक केवल धार्मिक मुद्दा नहीं बल्कि सामाजिक स्थिरता और सार्वजनिक व्यवस्था से जुड़ा विषय बन गया है।
भाजपा सरकार ने इस विधेयक को एक आवश्यक विधायी हस्तक्षेप बताया है, जो लंबे समय से मौजूद कानूनी अस्पष्टता को समाप्त करता है। इससे पहले लागू 1968 का कानून वर्तमान परिस्थितियों में अप्रभावी साबित हो चुका था। वह कानून अधिकतर प्रतिक्रियात्मक था, जिसमें कार्रवाई केवल विवाद होने के बाद ही संभव होती थी। इसके कारण प्रशासन के सामने स्पष्ट प्रक्रिया का अभाव था और कई मामलों में कार्रवाई न हो पाने या पक्षपात के आरोप लगते रहे।
नया विधेयक इस कमी को दूर करते हुए धर्मांतरण की स्पष्ट परिभाषा देता है। इसमें “बल”, “प्रलोभन” और “अनुचित प्रभाव” जैसे तत्वों को अवैध धर्मांतरण की श्रेणी में रखा गया है। इसके साथ ही धर्म परिवर्तन की प्रक्रिया को विधिक ढाँचे में लाया गया है, जिसमें परिवर्तन से पहले जिला मजिस्ट्रेट के समक्ष पूर्व घोषणा देना अनिवार्य किया गया है। इसके बाद भी एक पुष्टि प्रक्रिया रखी गई है, जिससे यह सुनिश्चित किया जा सके कि परिवर्तन वास्तव में स्वैच्छिक था।
सरकार का तर्क है कि यह व्यवस्था किसी की धार्मिक स्वतंत्रता को सीमित करने के लिए नहीं बल्कि उसे वास्तविक और पारदर्शी बनाने के लिए है। जब तक आस्था का चयन पूर्णतः स्वतंत्र और बिना किसी दबाव के नहीं होगा, तब तक उसे सच्ची स्वतंत्रता नहीं कहा जा सकता।
विधेयक में दंडात्मक प्रावधानों को भी कड़ा बनाया गया है। अवैध धर्मांतरण, उसके प्रयास या उसमें सहयोग करने वालों के लिए कठोर सजा का प्रावधान किया गया है। विशेष रूप से महिलाओं, जनजातीय समुदायों और कमजोर वर्गों को लक्षित करने वाले मामलों में सजा को और अधिक कठोर रखा गया है। अपराधों को संज्ञेय और गैर-जमानती बनाया गया है, जिससे पुलिस को तत्काल कार्रवाई का अधिकार मिलता है।
इस विधेयक का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि इसमें साक्ष्य का भार उस व्यक्ति या संस्था पर डाला गया है, जो धर्मांतरण कराता है। यह प्रावधान इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि ऐसे मामलों में पीड़ित पक्ष के लिए प्रत्यक्ष प्रमाण जुटाना अक्सर कठिन होता है।
विवाह के माध्यम से धर्मांतरण के मामलों को भी इस कानून में स्पष्ट रूप से संबोधित किया गया है। यदि यह पाया जाता है कि विवाह का उद्देश्य केवल धर्म परिवर्तन है, तो ऐसे विवाह को कानूनी संरक्षण नहीं मिलेगा। यह प्रावधान “लव जिहाद” की घटनाओं को रोकने के लिए आवश्यक है।
भाजपा का यह आरोप है कि शिक्षा, स्वास्थ्य और आर्थिक सहायता के नाम पर कुछ संगठनों द्वारा जनजातीय क्षेत्रों में प्रभाव स्थापित कर धर्मांतरण को बढ़ावा दिया गया। सरकार का मानना है कि ऐसी गतिविधियाँ केवल धार्मिक नहीं बल्कि सामाजिक संरचना को प्रभावित करने वाली हैं और इन्हें नियंत्रित करना राज्य का दायित्व है।
संवैधानिक दृष्टिकोण से भी सरकार ने अपने कदम को उचित ठहराया है। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 25 धार्मिक स्वतंत्रता की गारंटी देता है, लेकिन यह स्वतंत्रता पूर्णतः निरपेक्ष नहीं है। यह सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य की शर्तों के अधीन है। ऐसे में यदि किसी गतिविधि से सामाजिक असंतुलन या कानून व्यवस्था की समस्या उत्पन्न होती है, तो राज्य को हस्तक्षेप का अधिकार है।
इसके साथ ही पाँचवीं अनुसूची के तहत जनजातीय क्षेत्रों की सांस्कृतिक और सामाजिक संरचना की रक्षा करना राज्य की जिम्मेदारी है। इस दृष्टि से यह विधेयक केवल कानून नहीं बल्कि एक संवैधानिक दायित्व का निर्वहन भी माना जा रहा है।
विधानसभा में विधेयक पारित होने के बाद भाजपा ने इसे “जनजातीय अस्मिता की रक्षा का ऐतिहासिक कदम” बताया, जबकि कांग्रेस के वॉकआउट को “पलायन” करार दिया है। भाजपा नेताओं का कहना है कि जब राज्य के सामने सामाजिक तनाव, हिंसक झड़पें और संगठित धर्मांतरण जैसे गंभीर मुद्दे मौजूद हों, तब विपक्ष का सदन से बाहर जाना जनता के प्रति उसकी जवाबदेही पर सवाल खड़ा करता है।
विश्लेषकों का मानना है कि इस कानून के लागू होने के बाद धर्मांतरण से जुड़े मामलों में एक स्पष्ट प्रक्रिया स्थापित होगी। इससे अब तक जो भ्रम और आरोप-प्रत्यारोप का माहौल था, वह कम होगा और मामलों का समाधान विधिक आधार पर किया जा सकेगा।
छत्तीसगढ़ धर्म स्वातंत्र्य विधेयक, 2026 को केवल एक कानून के रूप में नहीं बल्कि एक व्यापक सामाजिक हस्तक्षेप के रूप में देखा जा रहा है, जो व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सामाजिक स्थिरता के बीच संतुलन स्थापित करने का प्रयास करता है। यह कानून धर्मांतरण को प्रतिबंधित नहीं करता, बल्कि यह सुनिश्चित करता है कि कोई भी परिवर्तन वास्तव में स्वतंत्र इच्छा से हो, न कि किसी दबाव, प्रलोभन या संगठित प्रभाव के कारण।
राज्य सरकार के अनुसार, “धर्मांतरण तब तक अधिकार है, जब तक वह स्वतंत्र है; जैसे ही उसमें दबाव या प्रलोभन जुड़ता है, वह अधिकार नहीं, बल्कि हस्तक्षेप बन जाता है।” इसी सोच के साथ छत्तीसगढ़ ने एक ऐसा कानून लागू करने की दिशा में कदम बढ़ाया है, जो आने वाले समय में देशभर में एक मॉडल के रूप में भी देखा जा सकता है।