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जब देश के एक बड़े हिस्से में सरकार की मौजूदगी कागजों तक सीमित रह जाए और जमीन पर समानांतर सत्ता चलने लगे, तब समस्या केवल सुरक्षा की नहीं, बल्कि शासन की विफलता बन जाती है। कांग्रेस सरकार के समय उभरे नक्सलवाद के दौर में भारत ने यही स्थिति देखी, खासकर उस समय जब नीति और कार्रवाई दोनों स्तरों पर कांग्रेस सरकार कमजोर पड़ती गई।
आज जब नक्सलवाद के अंत की बात हो रही है तो उस समय की वास्तविकता को भी समझना जरूरी है। वह ऐसा दौर था जब नक्सलवाद देश के एक बड़े भूभाग में फैल चुका था, जिसे आम तौर पर “रेड कॉरिडोर” कहा जाता है। छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश और बिहार के बड़े हिस्से ऐसे थे जहां सरकार की उपस्थिति बेहद सीमित थी। विशेषज्ञों के अनुसार, इन क्षेत्रों में स्थिति इतनी गंभीर हो गई थी कि प्रशासनिक ढांचा केवल औपचारिक रह गया था और वास्तविक नियंत्रण नक्सली समूहों के हाथ में चला गया था।

छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र का उदाहरण इस विफलता को और स्पष्ट करता है। वहां स्कूलों का निर्माण रोका गया, स्वास्थ्य सेवाएं ठप पड़ी रहीं और न्याय व्यवस्था लगभग समाप्त हो गई। स्थानीय विवादों का निपटारा तथाकथित नक्सली अदालतों में होने लगा, जहां न्याय की कोई पारदर्शी प्रक्रिया नहीं थी। सरकारी योजनाएं केवल नक्सलियों की अनुमति से ही लागू हो पाती थीं, और कई मामलों में ठेकेदारों को काम करने के लिए उन्हें भारी रकम देनी पड़ती थी।
यह केवल प्रशासनिक कमजोरी नहीं थी, बल्कि राज्य की संप्रभुता को चुनौती देने वाली स्थिति थी। नक्सली संगठन न केवल हथियारबंद समूहों के रूप में सक्रिय थे, बल्कि उन्होंने समानांतर शासन व्यवस्था खड़ी कर ली थी। गांवों में भय का माहौल था, जहां लोग न तो सुरक्षा बलों पर पूरी तरह भरोसा कर पा रहे थे और न ही नक्सलियों का विरोध करने की स्थिति में थे।
सबसे गंभीर पहलू यह था कि इस चुनौती के प्रति सरकार की प्रतिक्रिया स्पष्ट और सुसंगत नहीं थी। जहां एक ओर कुछ राज्यों ने सख्त कार्रवाई का रास्ता अपनाया, वहीं कई क्षेत्रों में कार्रवाई शुरू करके बीच में ही रोक दी गई। बस्तर में एक चरण पर सुरक्षा बलों ने प्रभावी अभियान चलाकर नक्सलियों को पीछे धकेला था, लेकिन बाद में इन अभियानों को रोक दिया गया, जिससे नक्सलियों को दोबारा मजबूत होने का अवसर मिल गया।
इस असंगत नीति के पीछे केवल प्रशासनिक कारण नहीं थे, बल्कि राजनीतिक और वैचारिक दबाव भी प्रभाव डाल रहे थे। कुछ वामपंथी बौद्धिक और सामाजिक समूहों द्वारा नक्सलवाद को वैचारिक आंदोलन के रूप में प्रस्तुत किया गया, जिससे सरकार के निर्णयों में अनिश्चितता बनी रही। परिणामस्वरूप, जहां निर्णायक कार्रवाई की आवश्यकता थी, वहां अक्सर हिचकिचाहट देखने को मिली।

इस पूरी स्थिति का एक और महत्वपूर्ण पहलू खुफिया तंत्र और सुरक्षा ढांचे की कमजोरी थी। नक्सली समूह खुले तौर पर बड़ी संख्या में संचालित होते रहे, लेकिन उनकी गतिविधियों पर प्रभावी निगरानी और समय रहते कार्रवाई नहीं हो सकी। इससे यह स्पष्ट हुआ कि समस्या केवल जमीनी स्तर पर नहीं, बल्कि नीति और संस्थागत ढांचे में भी थी।
यदि इस दौर की तुलना देश के अन्य हिस्सों से की जाए, तो अंतर और स्पष्ट हो जाता है। उत्तर पूर्व और पंजाब जैसे क्षेत्रों में उग्रवाद से निपटने के लिए राज्य ने लगातार उपस्थिति बनाए रखी और पीछे हटने का विकल्प नहीं चुना। इसके विपरीत, नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में कई बार ऐसा लगा कि राज्य ने नियंत्रण छोड़ दिया है, जिससे स्थिति और बिगड़ती गई।

हालांकि, यह तस्वीर अब पूरी तरह बदल चुकी है। पिछले कुछ वर्षों में नक्सलवाद के खिलाफ रणनीति में स्पष्ट परिवर्तन देखने को मिला है। केंद्र और राज्य सरकारों के बीच बेहतर समन्वय, सुरक्षा बलों की क्षमता में वृद्धि और खुफिया तंत्र को मजबूत करने जैसे कदमों ने स्थिति को बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
आज नक्सलवाद का प्रभाव पहले की तुलना में काफी सीमित हो चुका है। जहां एक समय यह समस्या सैकड़ों जिलों में फैली हुई थी, वहीं अब यह लगभग समाप्ति की ओर है। सुरक्षा बलों द्वारा लगातार अभियान चलाकर नक्सली ढांचे को कमजोर किया गया है और उनके प्रभाव वाले क्षेत्रों में प्रशासन की पुनर्स्थापना की गई है।
रणनीतिक स्तर पर भी बदलाव स्पष्ट है। अब केवल प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि पूर्व नियोजित और समन्वित कार्रवाई पर जोर दिया जा रहा है। क्षेत्र पर नियंत्रण स्थापित करने, विकास कार्यों को लागू करने और स्थानीय समुदायों को साथ जोड़ने की नीति ने नक्सलवाद की जड़ों को कमजोर किया है। यह वही दृष्टिकोण है, जिसकी कमी पहले स्पष्ट रूप से महसूस की जाती थी।
यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि आज नक्सलवाद अपने अंतिम चरण में है। हालांकि चुनौती पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है, लेकिन उसका स्वरूप और प्रभाव दोनों बदल चुके हैं। जहां पहले नक्सली समूह बड़े भूभाग पर नियंत्रण स्थापित कर चुके थे, वहीं अब वे सीमित क्षेत्रों में सिमटकर अपनी मौजूदगी बनाए रखने की कोशिश कर रहे हैं।

इस पूरे घटनाक्रम को एक व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखें तो एक स्पष्ट अंतर दिखाई देता है। एक दौर था जब राज्य पीछे हट रहा था, नीतियां अस्पष्ट थीं और कार्रवाई असंगत थी। और आज एक स्थिति है जहां राज्य स्पष्ट रणनीति के साथ आगे बढ़ रहा है और नियंत्रण स्थापित कर रहा है।
अंततः, यह अनुभव एक महत्वपूर्ण सबक देता है। किसी भी आंतरिक सुरक्षा चुनौती का समाधान केवल बल प्रयोग से नहीं, बल्कि स्पष्ट नीति, मजबूत संस्थागत ढांचे और निरंतर कार्रवाई से संभव है। जब इन तत्वों का अभाव होता है, तो समस्या बढ़ती है। और जब ये तत्व एक साथ काम करते हैं, तो सबसे जटिल चुनौतियां भी नियंत्रित की जा सकती हैं। यही अंतर उस दौर और आज की स्थिति के बीच स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।