लाल गलियारे का सच: रणनीति, विस्तार और पतन | भाग 1: यह आंदोलन नहीं, एक रणनीति थी

माओवादी हिंसा को अक्सर एक आंदोलन के रूप में देखा गया, लेकिन इसकी वास्तविकता एक सुनियोजित रणनीति में छिपी थी। विदेशी विचारधारा से प्रेरित इस मॉडल ने भारत के कई हिस्सों में राज्य की उपस्थिति को चुनौती दी।

The Narrative World    30-Mar-2026   
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Representative Imageमाओवादी हिंसा को लंबे समय तक एक ‘आंदोलन’ के रूप में प्रस्तुत किया गया, लेकिन इसकी जड़ें ऐसी विचारधारा में थीं जो भारत की सामाजिक और राजनीतिक संरचना से बाहर विकसित हुई थी। यह केवल असंतोष की अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि एक सुनियोजित सशस्त्र रणनीति थी, जिसका उद्देश्य क्रमिक तरीके से राज्य की उपस्थिति को कमजोर करना और अंततः उसे चुनौती देना था।


इस हिंसा को समझने के लिए इसके वैचारिक आधार पर ध्यान देना आवश्यक है। इसकी प्रेरणा सीधे तौर पर माओ त्सेतुंग की उस वामपंथी अवधारणा से ली गई, जिसे “People’s War” कहा जाता है। यह मॉडल मूलतः चीन की परिस्थितियों में विकसित हुआ था, जहां ग्रामीण क्षेत्रों को आधार बनाकर धीरे-धीरे सत्ता संरचना को चुनौती देने की रणनीति अपनाई गई। इसी ढांचे को भारत के कुछ हिस्सों में लागू करने का प्रयास किया गया, जबकि दोनों देशों की सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियां भिन्न थीं।


माओवादी रणनीति का मूल लक्ष्य त्वरित तरीके से सत्ता प्राप्त करना नहीं था। इसके विपरीत, यह एक दीर्घकालिक योजना थी, जिसमें राज्य की संरचना को भीतर से कमजोर करने पर जोर दिया गया। इस रणनीति को चरणबद्ध तरीके से लागू किया गया, जिसे आम तौर पर तीन हिस्सों में समझा जाता है।


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पहले चरण, जिसे रणनीतिक रक्षात्मक अवस्था कहा जाता है, में माओवादी संगठन उन क्षेत्रों में अपनी उपस्थिति बनाते हैं जहां राज्य का प्रभाव सीमित होता है। घने जंगल, दूरस्थ इलाके और प्रशासनिक रूप से उपेक्षित क्षेत्र इस चरण के लिए उपयुक्त माने जाते हैं। यहां स्थानीय असंतोष को आधार बनाकर समर्थन जुटाया जाता है और छोटे हमलों के माध्यम से अपनी सक्रियता दर्ज कराई जाती है।


दूसरे चरण, यानी रणनीतिक गतिरोध की अवस्था में, संगठन अपनी पकड़ मजबूत करते हैं और समानांतर नियंत्रण स्थापित करने लगते हैं। इस दौरान तथाकथित “जनताना सरकार” और “जन अदालतों” के माध्यम से वैकल्पिक शासन संरचना खड़ी की जाती है। स्थानीय विवादों का निपटारा, संसाधनों पर नियंत्रण और आर्थिक वसूली जैसे कार्य इसी ढांचे के तहत संचालित होते हैं। यह वह चरण होता है जहां राज्य की वैधता को सीधे चुनौती दी जाती है।




तीसरे चरण, जिसे रणनीतिक आक्रामक अवस्था कहा जाता है, में उद्देश्य राज्य के साथ प्रत्यक्ष टकराव की स्थिति बनाना होता है। भारत में यह चरण पूर्ण रूप से विकसित नहीं हो सका, लेकिन कई क्षेत्रों में इसके संकेत दिखाई दिए, जहां सुरक्षा बलों पर बड़े हमले किए गए और प्रभाव क्षेत्र बढ़ाने का प्रयास हुआ।


इस पूरी रणनीति का एक महत्वपूर्ण पहलू यह रहा कि इसे उन क्षेत्रों में लागू किया गया जहां शासन व्यवस्था पहले से कमजोर थी। छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा और महाराष्ट्र के कुछ हिस्सों में फैला तथाकथित “रेड कॉरिडोर” इसी प्रक्रिया का परिणाम था। इन इलाकों में बुनियादी सुविधाओं की कमी, प्रशासनिक पहुंच का अभाव और सामाजिक-आर्थिक चुनौतियों ने इस विस्तार को संभव बनाया।


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हालांकि, यह प्रक्रिया केवल भौगोलिक विस्तार तक सीमित नहीं थी। माओवादी संगठनों ने वैचारिक स्तर पर भी प्रभाव स्थापित करने की कोशिश की। उन्होंने अपने अभियान को स्थानीय असंतोष से जोड़कर प्रस्तुत किया, जिससे इसे वैधता देने का प्रयास हुआ। “राज्य बनाम जनता” का नैरेटिव इसी रणनीति का हिस्सा था, जिसके माध्यम से समर्थन जुटाया गया।


यह भी स्पष्ट है कि यह पूरा ढांचा स्वतःस्फूर्त नहीं था। यह एक स्थापित वैचारिक मॉडल पर आधारित था, जिसे भारत की परिस्थितियों में लागू करने का प्रयास किया गया। इस कारण यह केवल स्थानीय असंतोष का परिणाम नहीं, बल्कि एक संगठित और दीर्घकालिक रणनीतिक प्रयास के रूप में सामने आया।


इस संदर्भ में माओवादी हिंसा को केवल एक स्थानीय आंदोलन के रूप में देखना पर्याप्त नहीं है। यह एक ऐसी संरचना थी जिसमें विचारधारा, संगठन और सशस्त्र कार्रवाई का समन्वय था। इसका उद्देश्य तात्कालिक प्रभाव से आगे बढ़कर एक वैकल्पिक सत्ता ढांचे की स्थापना करना था।


आगे के भागों में यह समझना आवश्यक होगा कि यह रणनीति भारत में किन परिस्थितियों में प्रभावी हुई, किन कारणों से इसका विस्तार हुआ, और समय के साथ इसे किस प्रकार चुनौती दी गई। यही वे प्रश्न हैं, जिन पर इस श्रृंखला के आगामी लेख केंद्रित होंगे।

शुभम उपाध्याय

संपादक, स्तंभकार, टिप्पणीकार