
लोकतंत्र में संस्थाओं की आलोचना आवश्यक है, लेकिन जब यह आलोचना पूरे तंत्र की विश्वसनीयता पर ही प्रश्नचिह्न खड़ा करने लगे, तब यह विमर्श नहीं, बल्कि अविश्वास पैदा करने का प्रयास बन जाती है। The Print पर Vir Sanghvi का हालिया लेख इसी प्रवृत्ति को दर्शाता है, जहां आलोचना और धारणा के बीच का अंतर धुंधला हो जाता है।
लेख की शुरुआत एक व्यापक निष्कर्ष से होती है कि भारत में संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों में “शर्म” और “मर्यादा” का अभाव है। इस तरह के दावे के लिए ठोस और व्यवस्थित प्रमाण अपेक्षित होते हैं, लेकिन पूरे लेख में इसके समर्थन में कोई ठोस तथ्य प्रस्तुत नहीं किए गए। इसके बजाय, विभिन्न उदाहरणों को इस तरह जोड़ा गया है कि एक समग्र नकारात्मक छवि निर्मित हो सके।
मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति को लेकर उठाए गए प्रश्नों को भी इसी संदर्भ में देखना चाहिए। यह भी तथ्य है कि नियुक्ति प्रक्रिया संसद द्वारा पारित कानून के आधार पर निर्धारित की गई है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में संसद को कानून बनाने का अधिकार है। ऐसे में केवल इस आधार पर प्रक्रिया को संदिग्ध ठहराना कि वह किसी एक पक्ष के अनुकूल प्रतीत होती है, एकतरफा दृष्टिकोण को दर्शाता है।

लेख में यह संकेत दिया गया है कि मुख्य चुनाव आयुक्त को अपनी निष्पक्षता साबित करनी चाहिए और वह इसमें असफल रहे हैं। लेकिन यह प्रश्न उठता है कि किसी संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति की निष्पक्षता का आकलन धारणा के आधार पर किया जाना चाहिए या उसके कार्यों के ठोस परिणामों के आधार पर? यदि हर निर्णय को पहले से ही संदेह की दृष्टि से देखा जाएगा, तो किसी भी संस्था के लिए विश्वास अर्जित करना कठिन हो जाएगा।
यहां एक व्यापक सामान्यीकरण भी दिखाई देता है। चुनाव आयोग, न्यायपालिका और नौकरशाही को एक साथ रखकर यह संकेत दिया गया है कि पूरा तंत्र ही पक्षपाती हो चुका है। लोकतांत्रिक संस्थाओं में कमियां हो सकती हैं और निर्णयों पर असहमति भी स्वाभाविक है, लेकिन पूरे तंत्र को अविश्वसनीय घोषित करना एक गंभीर निष्कर्ष है, जिसके लिए ठोस आधार आवश्यक है।

लेख में ऐतिहासिक संदर्भों का उपयोग भी इसी प्रवृत्ति को आगे बढ़ाता है। इंदिरा गांधी के दौर की “प्रतिबद्ध नौकरशाही” और न्यायपालिका से जुड़े उदाहरणों का उल्लेख किया गया है, लेकिन इन संदर्भों को वर्तमान स्थिति से जोड़ते समय आवश्यक संतुलन नहीं रखा गया। इससे विश्लेषण की निष्पक्षता प्रभावित होती है।
इस प्रकार की लेखन शैली का प्रभाव केवल बौद्धिक विमर्श तक सीमित नहीं रहता। जब यह लगातार कहा जाता है कि संस्थाएं निष्पक्ष नहीं हैं या किसी राजनीतिक पक्ष के प्रभाव में हैं, तो इसका असर सार्वजनिक विश्वास पर पड़ता है। लोकतंत्र केवल संस्थाओं से नहीं, बल्कि उन पर नागरिकों के विश्वास से संचालित होता है। इस विश्वास का कमजोर होना पूरे तंत्र को प्रभावित कर सकता है।

यहां आलोचना और अविश्वास के बीच का अंतर समझना आवश्यक है। आलोचना सुधार की दिशा में एक आवश्यक प्रक्रिया है, जबकि अविश्वास व्यवस्था की वैधता पर ही प्रश्न खड़ा करता है। जब बिना पर्याप्त प्रमाण के व्यापक निष्कर्ष निकाले जाते हैं, तो यह आलोचना की सीमा से आगे जाकर नैरेटिव निर्माण बन जाता है।
मुख्य चुनाव आयुक्त से जुड़े प्रश्नों का समाधान न्यायिक और संस्थागत प्रक्रियाओं के माध्यम से ही होगा। यही वह ढांचा है जिस पर लोकतंत्र आधारित है। लेकिन जब इन प्रक्रियाओं के पूर्ण होने से पहले ही निष्कर्ष तय कर दिए जाते हैं, तो यह न केवल प्रक्रिया को प्रभावित करता है, बल्कि जनता के मन में पूर्वाग्रह भी पैदा करता है।

अंततः, लोकतंत्र में संस्थाओं की जवाबदेही जितनी महत्वपूर्ण है, उतनी ही उनकी विश्वसनीयता भी है। दोनों के बीच संतुलन बनाए रखना आवश्यक है। यदि इस संतुलन को नजरअंदाज किया जाता है, तो लोकतांत्रिक संरचना कमजोर हो सकती है।
इसलिए यह कहना अधिक उचित होगा कि समस्या केवल संस्थाओं में नहीं, बल्कि उन्हें देखने और प्रस्तुत करने के तरीके में भी है। जब विश्लेषण के स्थान पर धारणा और संतुलन के स्थान पर चयनात्मकता आ जाती है, तो एक ऐसा नैरेटिव बनता है जो प्रभावशाली तो लगता है, लेकिन जरूरी नहीं कि वह पूरी तरह सटीक हो।
लोकतंत्र की मजबूती केवल उसकी संस्थाओं से नहीं, बल्कि उन पर नागरिकों के विश्वास से तय होती है। इस विश्वास को बनाए रखना सामूहिक जिम्मेदारी है। इसी कारण आलोचना को भी अपनी सीमाओं का ध्यान रखना चाहिए, ताकि वह सुधार का माध्यम बने, न कि अविश्वास का कारण।