छत्तीसगढ़ के उत्तर क्षेत्र में जनजाति भूमि को लेकर एक बार फिर गंभीर विषय सामने आया है। सरगुजा जिले के लखनपुर ब्लॉक में विशेष संरक्षित जनजाति पंडो समुदाय की जमीन पर इस्लामिक जिहादियों द्वारा अवैध कब्जे के आरोपों ने प्रशासन को जांच शुरू करने के लिए मजबूर कर दिया है।
मुख्यमंत्री कार्यालय के निर्देश पर एसडीएम उदयपुर की अदालत में छत्तीसगढ़ भूमि राजस्व संहिता की धारा 170 बी के तहत मामला दर्ज कर कब्जाधारियों को नोटिस जारी किया गया है। अब 20 मार्च को होने वाली सुनवाई में मुस्लिम पक्षों को यह स्पष्ट करना होगा कि उन्हें यह जमीन किस आधार पर प्राप्त हुई।
स्थानीय स्तर पर यह मामला केवल एक जमीन विवाद नहीं बल्कि उत्तर छत्तीसगढ़ के कई जिलों में सामने आ रहे ऐसे षड्यंत्र का हिस्सा माना जा रहा है जिनमें जनजाति भूमि पर जिहादी नेटवर्क के जरिए लैंड जिहाद की बात कही जा रही है।
स्थानीय सामाजिक संगठनों और जनप्रतिनिधियों का दावा है कि यह प्रक्रिया धीरे-धीरे और योजनाबद्ध तरीके से की जाती है। पहले व्यापार या छोटे व्यवसाय के नाम पर गांव में प्रवेश किया जाता है और बाद में जमीन के दस्तावेजों पर अंगूठा लगवाकर या पट्टा प्रक्रिया का दुरुपयोग कर कब्जा बढ़ाया जाता है।
सरगुजा के लखनपुर क्षेत्र में सामने आए मामले में स्थानीय शिकायतों के अनुसार वर्ष 1987 के आसपास दो या तीन मुस्लिम परिवार चूड़ी और मनिहारी का कारोबार करने के बहाने पंडो बहुल बस्ती में पहुंचे थे। उस समय गांव के लोगों ने उन्हें रहने के लिए जमीन दी। बाद के वर्षों में इन मुस्लिम समूहों ने कुछ जनजाति परिवारों से मामूली रकम देकर कागजों पर अंगूठा लगवा लिया गया। 2012 के बाद उनके अन्य मुस्लिम रिश्तेदारों को बुलाकर बसाया गया और आज वहां लगभग 80 से 90 मुस्लिम परिवारों के रहने की बात सामने आ रही है।
इस मामले की शिकायत नगर निगम अंबिकापुर के भाजपा पार्षद आलोक दुबे ने मुख्यमंत्री कार्यालय और सरगुजा संभाग के कमिश्नर नरेंद्र दुग्गा से की। इसके बाद प्रशासनिक जांच शुरू हुई और राजस्व अधिकारियों को दस्तावेजों की जांच के निर्देश दिए गए।
यह विवाद इसलिए भी गंभीर माना जा रहा है क्योंकि जनजाति भूमि की सुरक्षा के लिए भारतीय संविधान और राज्य कानूनों में विशेष प्रावधान मौजूद हैं। संविधान की पांचवीं अनुसूची के तहत अनुसूचित क्षेत्रों में जनजाति समुदाय की जमीन की रक्षा के लिए अलग प्रशासनिक ढांचा बनाया गया है और राज्यपाल को यह अधिकार दिया गया है कि वह जनजाति भूमि के गैर जनजाति लोगों को हस्तांतरण पर प्रतिबंध लगा सके।
इसके अलावा
छत्तीसगढ़ भूमि राजस्व संहिता 1959 में भी स्पष्ट प्रावधान है कि अनुसूचित क्षेत्रों में जनजाति भूमि को गैर जनजाति व्यक्ति को हस्तांतरित नहीं किया जा सकता। यदि ऐसा पाया जाता है तो प्रशासन को जमीन वापस दिलाने का अधिकार है।
धारा 170 (बी) इसी व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इस प्रावधान के तहत यदि किसी जनजाति व्यक्ति की जमीन गैर जनजाति व्यक्ति के कब्जे में पाई जाती है और हस्तांतरण की वैध प्रक्रिया सिद्ध नहीं होती तो राजस्व अधिकारी उस जमीन को मूल मालिक को वापस दिलाने का आदेश दे सकते हैं। इस कानून को जनजाति भूमि की सुरक्षा का सबसे महत्वपूर्ण कानूनी उपकरण माना जाता है।
उत्तर छत्तीसगढ़ में जनजाति भूमि से जुड़े विवाद केवल सरगुजा तक सीमित नहीं हैं। बलरामपुर, जशपुर और कोरिया जिलों में भी समय समय पर ऐसे मामले सामने आते रहे हैं जहां स्थानीय लोगों ने इस्लामिक जिहादियों पर जमीन कब्जाने के आरोप लगाए। कई मामलों में यह आरोप लगाया गया कि पहले छोटे व्यापार या सामाजिक संबंधों के माध्यम से गांवों में प्रवेश किया गया और बाद में जमीन के दस्तावेज तैयार कराए गए।
दरअसल जनजाति क्षेत्रों में जमीन केवल आर्थिक संपत्ति नहीं बल्कि सामाजिक अस्तित्व का आधार होती है। पारंपरिक व्यवस्था में जमीन समुदाय के जीवन, संस्कृति और आजीविका से जुड़ी होती है। इसी कारण भारतीय कानून में जनजाति भूमि के हस्तांतरण पर कड़े प्रतिबंध लगाए गए हैं। कई समुदायों में जमीन सामुदायिक स्वामित्व की भावना से भी जुड़ी होती है और इसे बाहरी लोगों को देने पर रोक की परंपरा रही है।
इन क्षेत्रों में पंचायत विस्तार अधिनियम अर्थात PESA भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह कानून अनुसूचित क्षेत्रों में ग्राम सभा को विशेष अधिकार देता है और स्थानीय संसाधनों के संरक्षण में ग्राम सभा की सहमति को अनिवार्य मानता है। इस कानून के तहत भूमि और प्राकृतिक संसाधनों से जुड़े निर्णयों में ग्राम सभा की भूमिका महत्वपूर्ण मानी जाती है।
सरगुजा के मामले में भी शिकायतकर्ताओं ने कुछ राजस्व कर्मचारियों की भूमिका पर सवाल उठाए हैं। आरोप लगाया गया है कि जमीन के पट्टे जारी करने की प्रक्रिया में अनियमितताएं हुईं।
उत्तर छत्तीसगढ़ का यह पूरा इलाका जनजाति बहुल है और यहां जमीन के सवाल का सीधा संबंध सामाजिक संतुलन से भी जुड़ा है। यदि जनजाति भूमि बड़े पैमाने पर इस्लामिक जिहादियों के कब्जे में जाती है, तो इससे स्थानीय समाज में असंतोष और तनाव पैदा हो सकता है। यही कारण है कि ऐसे मामलों में प्रशासनिक कार्रवाई और कानूनी जांच को बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है।