महाराष्ट्र में कन्वर्जन नेक्सस पर लगाम की तैयारी, कड़े क़ानून का मसौदा तैयार

महाराष्ट्र सरकार ने जबरन और लालच देकर कराए जाने वाले कन्वर्जन पर लगाम लगाने के लिए ‘महाराष्ट्र फ्रीडम ऑफ रिलिजन एक्ट 2026’ के मसौदे को मंजूरी दी है। प्रस्तावित कानून में सख्त सजा, प्रशासन को पूर्व सूचना और पुलिस जांच जैसे प्रावधान शामिल हैं।

The Narrative World    08-Mar-2026   
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महाराष्ट्र में जबरन और धोखे से कराए जाने वाले कन्वर्जन के मामलों को लेकर लंबे समय से उठ रही चिंताओं के बीच राज्य सरकार ने एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है। राज्य मंत्रिमंडल ने प्रस्तावित “महाराष्ट्र फ्रीडम ऑफ रिलिजन एक्ट 2026” के मसौदे को मंजूरी दे दी है।
 
सरकार का कहना है कि यह कानून उन संगठित नेटवर्कों पर रोक लगाने के उद्देश्य से तैयार किया गया है जो आर्थिक प्रलोभन, दबाव या छल के माध्यम से लोगों को कन्वर्जन के लिए प्रेरित करते हैं। अब इस विधेयक को राज्य विधानसभा और विधान परिषद में पेश किया जाएगा, जहां मंजूरी मिलने के बाद इसे कानून का रूप दिया जा सकता है।
 
पिछले कुछ वर्षों में महाराष्ट्र के कई हिस्सों से ऐसे मामले सामने आए हैं जिनमें आर्थिक मदद, विवाह या सामाजिक सहायता के बहाने कन्वर्जन कराने के आरोप लगे। कई घटनाओं में संगठित गिरोह सक्रिय पाए गए जो शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा या विवाह जैसे माध्यमों से लोगों को प्रभावित करते हैं और बाद में उन्हें अपना धर्म बदलने के लिए प्रेरित करते हैं। इसी पृष्ठभूमि में महायुति सरकार ने सख्त कानून लाने का फैसला किया है।
 
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महाराष्ट्र सरकार में मंत्री और भाजपा नेता नितेश राणे ने कैबिनेट के फैसले की जानकारी देते हुए कहा कि राज्य में जबरन कन्वर्जन की घटनाओं को गंभीरता से लिया गया है। उन्होंने कहा कि प्रस्तावित कानून का उद्देश्य किसी व्यक्ति की आस्था को सीमित करना नहीं बल्कि उसकी स्वतंत्रता की रक्षा करना है। सरकार का कहना है कि यदि कोई व्यक्ति अपनी इच्छा से धर्म बदलना चाहता है तो उसे कानून के दायरे में इसकी अनुमति होगी, लेकिन यदि इसमें किसी प्रकार का दबाव, धोखा या लालच शामिल पाया जाता है तो कड़ी कार्रवाई की जाएगी।
 
प्रस्तावित कानून में कई सख्त प्रावधान शामिल किए गए हैं। ड्राफ़्ट के अनुसार यदि किसी व्यक्ति को जबरन, धोखे से या लालच देकर कन्वर्जन कराया जाता है तो दोषियों के खिलाफ कठोर दंड का प्रावधान होगा। इसमें जेल और भारी जुर्माना शामिल हो सकता है। कुछ मामलों में अपराध को गैर जमानती श्रेणी में रखने का प्रस्ताव है ताकि आरोपियों को आसानी से जमानत न मिल सके। सरकार का मानना है कि कठोर दंड ही ऐसे संगठित नेटवर्कों को रोकने का प्रभावी उपाय हो सकता है।
 
कानून का एक महत्वपूर्ण प्रावधान यह भी है कि कन्वर्जन से पहले संबंधित व्यक्ति को प्रशासन को सूचना देनी होगी। प्रस्ताव के अनुसार यदि कोई व्यक्ति अपनी इच्छा से धर्म बदलना चाहता है तो उसे कम से कम 60 दिन पहले जिला प्रशासन को इसकी जानकारी देनी होगी। इस अवधि के दौरान प्रशासन यह सुनिश्चित करेगा कि प्रक्रिया पूरी तरह स्वेच्छा से हो रही है और इसके पीछे किसी प्रकार का दबाव या प्रलोभन नहीं है। इसके बाद कन्वर्जन होने के 25 दिनों के भीतर उसका आधिकारिक पंजीकरण कराना भी अनिवार्य होगा।
 
सरकारी सूत्रों का कहना है कि इस व्यवस्था का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि किसी भी व्यक्ति को मजबूर या भ्रमित करके अपना धर्म बदलने के लिए तैयार न किया जाए। कई बार ऐसे मामलों में पीड़ित व्यक्ति सामाजिक दबाव या भय के कारण खुलकर शिकायत नहीं कर पाता। प्रशासनिक जांच की व्यवस्था से ऐसी परिस्थितियों की पहचान करने में मदद मिल सकती है।
 
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प्रस्तावित कानून में यह भी प्रावधान है कि यदि किसी कन्वर्जन को लेकर परिवार के सदस्य आपत्ति दर्ज कराते हैं तो पुलिस मामले की जांच शुरू कर सकती है। ऐसे मामलों को संज्ञेय अपराध की श्रेणी में रखने का प्रस्ताव है, जिससे पुलिस बिना वारंट कार्रवाई कर सकेगी। सरकार का तर्क है कि संगठित कन्वर्जन नेटवर्क अक्सर कानूनी खामियों का लाभ उठाकर बच निकलते हैं, इसलिए जांच एजेंसियों को पर्याप्त अधिकार देना आवश्यक है।
 
भारत में कन्वर्जन विरोधी कानूनों का इतिहास कई दशकों पुराना है। ओडिशा ने 1967 में इस प्रकार का कानून लागू किया था। बाद में गुजरात, हिमाचल प्रदेश, मध्य प्रदेश, उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश सहित कई राज्यों ने भी ऐसे कानून बनाए जिनका उद्देश्य जबरन, धोखे से या लालच देकर कराए जाने वाले कन्वर्जन को रोकना है।
इन कानूनों का मूल सिद्धांत यह रहा है कि धर्म बदलना व्यक्ति की स्वतंत्र पसंद का विषय हो सकता है, लेकिन इसमें किसी प्रकार की जबरदस्ती या प्रलोभन शामिल नहीं होना चाहिए।
 
भारत जैसे विविध समाज में कन्वर्जन का प्रश्न केवल व्यक्तिगत आस्था तक सीमित नहीं रहता बल्कि सामाजिक संतुलन से भी जुड़ जाता है। कई क्षेत्रों में आर्थिक रूप से कमजोर और सामाजिक रूप से हाशिए पर रहने वाले समुदायों को निशाना बनाकर कन्वर्जन कराने के आरोप लगाए गए हैं।
 
 
इन मामलों में अक्सर आर्थिक सहायता, नौकरी का वादा, शिक्षा या चिकित्सा सुविधा जैसे साधनों का इस्तेमाल किया जाता है। प्रस्तावित कानून का उद्देश्य ऐसे मामलों को रोकना और यह सुनिश्चित करना है कि किसी व्यक्ति की आस्था किसी मजबूरी के कारण न बदले।
 
सरकारी अधिकारियों के अनुसार महाराष्ट्र के जनजातीय और ग्रामीण इलाकों में पिछले वर्षों में कन्वर्जन से जुड़े विवाद सामने आए हैं। कुछ सामाजिक संगठनों ने आरोप लगाया कि बाहरी फंडिंग और संगठित नेटवर्क के माध्यम से कन्वर्जन कराने की कोशिशें की जाती हैं। सरकार का मानना है कि कानूनी ढांचा मजबूत होने से ऐसी गतिविधियों पर अंकुश लगाया जा सकेगा।
 
 
राज्य सरकार के अनुसार प्रस्तावित कानून सामाजिक सौहार्द बनाए रखने की दिशा में भी महत्वपूर्ण कदम है। जबरन कन्वर्जन के आरोप कई बार स्थानीय स्तर पर तनाव और विवाद का कारण बनते हैं। प्रशासन का कहना है कि यदि ऐसे मामलों को रोकने के लिए स्पष्ट कानूनी व्यवस्था होगी तो समाज में विश्वास और स्थिरता बनाए रखने में मदद मिलेगी।
 
यदि विधानसभा और विधान परिषद दोनों से इसे मंजूरी मिल जाती है तो महाराष्ट्र भी उन राज्यों की सूची में शामिल हो जाएगा जहां कन्वर्जन विरोधी कानून लागू हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि कानून लागू होने के बाद कन्वर्जन से जुड़े मामलों की जांच और कानूनी कार्रवाई अधिक व्यवस्थित तरीके से की जा सकेगी।

शुभम उपाध्याय

संपादक, स्तंभकार, टिप्पणीकार