
किसी भी समाज का गौरव उन व्यक्तित्वों से तय होता है, जिनकी विरासत उस समाज को जोड़ती है, उसे सुरक्षित बनाती है और उसकी सांस्कृतिक चेतना को समृद्ध करती है। ऐसे में यह सवाल स्वाभाविक है कि क्या एक ऐसा व्यक्ति, जिसका गहरा संबंध माओवादी आतंकवाद से रहा हो, उसे तेलंगाना का “गौरव” कहा जा सकता है? माओवादी कवि ग़द्दार को लेकर उठे हालिया विवाद ने इसी प्रश्न को केंद्र में ला खड़ा किया है।
विषय तब सामने आया जब अमित शाह ने गद्दार को “नक्सल” कहा। इसके बाद कांग्रेस नेताओं ने इसे तेलंगाना के सम्मान से जोड़ते हुए विरोध किया। लेकिन इस प्रतिक्रिया के बीच एक मूल प्रश्न दब गया कि क्या गद्दार की पहचान एक जनकवि की थी, या वह उससे कहीं अधिक विवादास्पद थी?
गौरतलब है कि गुम्मादी उर्फ गद्दार एक कुख्यात माओवादी था, जिसकी वर्ष 2023 में मौत हो गई थी। जैसा कि भारतीय वामपंथी मीडिया का चरित्र है, उसी के अनुसार आज भी इस माओवादी को मीडिया के द्वारा 'जनकवि', 'क्रांतिकारी कवि', 'क्रांतिकारी विचारक' और 'लेखक' के रूप में पेश किया जाता है। लेकिन गुम्मादी उर्फ गद्दार की वास्तविकता यह नहीं है।

गुम्मादी उर्फ गद्दार एक हार्डकोर नक्सली विचारक था, जिसने 'गीत-संगीत-नृत्य-नाट्य' के माध्यम से नक्सलवाद-माओवाद की विचारधारा को फैलाने का काम किया। वर्ष 1972 में गुम्मादी ने 'जन नाट्य मंडली' नामक एक संगठन का गठन किया, जिसका मुख्य उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में कला के माध्यम से माओवादी विचार का प्रचार-प्रसार करना और ग्रामीण युवाओं को नक्सल आतंक के काले साये में धकेलना था।
गुम्मादी द्वारा गठित किए गए इस संगठन 'जन नाट्य मंडली' को नक्सल आतंकियों के लिए काम करने के चलते आतंकी संगठन के रूप में सूचीबद्ध कर प्रतिबंधित किया गया है। यहां तक कि जब वर्ष 2022 में जन नाट्य मंडली का दुर्दांत नक्सली दप्पू रमेश की मौत हुई, तब प्रतिबंधित माओवादी आतंकी संगठन सीपीआई-माओवादी ने उसके प्रति श्रद्धांजलि अर्पित की थी।

यह केवल कला नहीं थी, बल्कि एक वैचारिक अभियान था, जिसका उद्देश्य युवाओं को एक ऐसे हिंसक आंदोलन की ओर आकर्षित करना था, जो भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था के खिलाफ खड़ा रहा है। यहां यह समझना जरूरी है कि नक्सलवाद कोई सामान्य राजनीतिक विचारधारा नहीं है।
यह एक ऐसा हिंसक आंदोलन रहा है, जिसने दशकों तक देश के कई हिस्सों में आतंक को जन्म दिया है। इस विचारधारा के नाम पर हजारों निर्दोष नागरिकों और सुरक्षाकर्मियों की हत्या हुई है। ऐसे में यदि कोई व्यक्ति इस विचारधारा के प्रचार-प्रसार में सक्रिय भूमिका निभाता रहा हो, तो क्या उस पहलू को पूरी तरह नजरअंदाज किया जा सकता है?

खूंखार माओवादी आतंकियों के साथ भारत की लोकतांत्रिक गणतांत्रिक व्यवस्था को खंडित कर माओवादी तानाशाही व्यवस्था लागू करने के उद्देश्य से गुम्मादी राव ने 1970 के दशक में युवाओं से नक्सली बनने का आह्वान किया और स्वयं भी 1985 से 1990 तक अंडरग्राउंड होकर नक्सलवाद के लिए काम करने लगा।
इस दौरान गुम्मादी उर्फ गद्दार ने नक्सल संगठन के लिए कैडर भर्ती करने और उन्हें नक्सल आतंक के अंतहीन युद्ध में झोंकने का कार्य किया। उसने एक ऐसे वैचारिक वातावरण का निर्माण किया, जिसमें नक्सलवाद को एक “क्रांति” के रूप में प्रस्तुत किया गया। लेकिन इस तथाकथित क्रांति की वास्तविकता क्या रही है, यह देश के उन क्षेत्रों से बेहतर कोई नहीं जानता जहां वर्षों तक हिंसा और अस्थिरता का दौर चला है।
गौरतलब है कि गुम्मादी पर तब भी आपराधिक मामले चल रहे थे, जिसमें आम ग्रामीणों की हत्या से लेकर पुलिसकर्मियों की हत्या तक का मामला था। कर्नाटक में हुए नक्सल हमले में वह सीधा आरोपी भी था।

दरअसल 10 फरवरी, 2005 में नक्सल आतंकियों ने कर्नाटक के तुमकुर जिले के पावगड़ा में आतंकी हमला किया था। इस दौरान 200 माओवादियों ने कर्नाटक स्टेट रिजर्व पुलिस कक नौवीं बटालियन पर हमला किया। माओवादियों के इस हमले में 7 पुलिसकर्मी समेत बलिदान हुए थे, वहीं एक नागरिक की भी मौत हुई थी।
पुलिस ने इस हमले के मामले में 109 आरोपियों को गिरफ्तार किया और 2 लोगों के विरुद्ध चार्जशीट फ़ाइल की। इसमें गुम्मादी राव को अपराधी नंबर 11 बनाया गया, जो बताता है कि कैसे गुम्मादी स्वयं भी माओवादी आतंकी हमलों की साजिश में शामिल रहता था।
कांग्रेस द्वारा गद्दार को तेलंगाना का गौरव बताना और उनके नाम पर पुरस्कार तथा संस्थाएं स्थापित करना इस पूरे विमर्श को और विवादित बना देता है। एक ऐसे व्यक्ति को, जिसकी पहचान एक हिंसक विचारधारा से जुड़ी हो, इसे समाज की सामूहिक स्वीकृति के रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं है।
ग़ौरतलब है कि वर्ष 2017 तक गुम्मादी स्वयं माओवादी आतंकियों से संबंध रखते हुए नक्सल आतंक की विचारधारा के साथ देश को तोड़ने के सपने पाले हुए था, जिसने बाद में कांग्रेस के साथ मिलकर उसका समर्थन करना शुरू कर दिया। अक्टूबर 2018 में ही गुम्मादी ने कांग्रेस नेता राहुल गांधी और सोनिया गांधी से मुलाकात की और फिर उसके बाद से ही गुम्मादी कांग्रेस का प्रिय हो गया।

गुम्मादी ने अविभाजित आंध्र प्रदेश और छत्तीसगढ़ के जंगलों में घूम-घूमकर स्थानीय ग्रामीणों के बच्चों और युवाओं को तो नक्सलवाद-माओवाद के आतंक में झोंक दिया, लेकिन उसके खुद के बच्चे शिक्षित और अमीर बनते गए।
एक ओर जहां तेलंगाना, आंध्र और छत्तीसगढ़ से नक्सलवाद में शामिल हुए कई युवा अपना जीवन बर्बाद कर चुके हैं, कोई मारा जा चुका है तो कोई जेल चला गया, कोई जंगल में भटकता रह गया तो किसी ने अभाव में दम तोड़ दिया, लेकिन इन मासूम ग्रामीणों को नक्सली बनाने वाले गुम्मादी के बच्चे आज पढ़ लिख कर करोड़ों की संपत्ति के साथ नेता बन चुके हैं, और इन्हें साथ मिला है कांग्रेस पार्टी का।
वहीं कांग्रेस पार्टी ऐसे भारत विरोधी, लोकतंत्र विरोधी और आतंक समर्थक व्यक्ति को ना सिर्फ 'महान' बता रही है, बल्कि ऐसे लोगों को तेलंगाना का गौरव बता रही है।

तेलंगाना की पहचान केवल किसी एक व्यक्ति से नहीं बनती, खसकार एक ऐसा व्यक्ति जो माओवादी आतंकवाद से जुड़ा रहा और जिस आतंकवाद के कारण हज़ारों निर्दोषों ने अपनी जान गँवाईं।
अंततः यह सवाल केवल गद्दार जैसे माओवादी तक सीमित नहीं है। किसी भी समाज के लिए यह जरूरी है कि वह अपने प्रतीकों का चयन सावधानी से करे। क्योंकि प्रतीक केवल अतीत का प्रतिनिधित्व नहीं करते, बल्कि भविष्य की दिशा भी तय करते हैं। और यही वह बिंदु है, जहां यह प्रश्न फिर सामने आता है कि क्या एक ऐसा व्यक्ति, जिसका संबंध एक हिंसक आतंकी विचारधारा से रहा हो, वास्तव में तेलंगाना का गौरव हो सकता है?