
माओवादी रणनीति अपने आप सफल नहीं हुई। इसके पीछे केवल एक विचारधारा या संगठन की क्षमता नहीं थी, बल्कि वे परिस्थितियां थीं जिन्होंने इसे पनपने और फैलने का अवसर दिया। यह वह दौर था जब राज्य की उपस्थिति कई क्षेत्रों में कमजोर पड़ रही थी और नीति स्तर पर स्पष्टता का अभाव लगातार दिखाई दे रहा था। परिणामस्वरूप, हिंसा ने न केवल अपनी जड़ें मजबूत कीं, बल्कि उसने एक विस्तृत भूभाग पर नियंत्रण स्थापित करने की दिशा में निर्णायक कदम बढ़ाए।
2004 के बाद का समय इस संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जाता है। इसी अवधि में विभिन्न माओवादी संगठनों के एकीकरण के बाद माओवादी हिंसा ने एक संगठित स्वरूप ग्रहण किया। इसके बाद घटनाओं की गति तेज हो गई। छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा, बिहार और महाराष्ट्र के विस्तृत हिस्सों में माओवादी प्रभाव तेजी से बढ़ा। “रेड कॉरिडोर” अब केवल एक अवधारणा नहीं रहा, बल्कि वह एक ऐसा भौगोलिक क्षेत्र बन गया जहां राज्य की पहुंच सीमित होती जा रही थी और माओवादी नियंत्रण गहराता जा रहा था।

इस विस्तार का सबसे स्पष्ट और चिंताजनक उदाहरण छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र में देखा गया। यहां कई गांव ऐसे थे जहां प्रशासनिक उपस्थिति केवल कागजों तक सीमित रह गई थी। स्कूल भवनों का उपयोग या तो बंद हो गया था या उन्हें माओवादी गतिविधियों के लिए इस्तेमाल किया जाने लगा।
स्वास्थ्य सेवाएं लगभग ठप थीं और विकास कार्यों को या तो रोका गया या उन पर माओवादी नियंत्रण स्थापित हो गया। स्थानीय आबादी एक ऐसे द्वंद्व में फंसी हुई थी, जहां उसे न तो राज्य पर पूरी तरह भरोसा था और न ही वह माओवादी दबाव का विरोध करने की स्थिति में थी।

यह केवल प्रशासनिक विफलता नहीं थी, बल्कि एक व्यापक शासन संकट का संकेत था। माओवादी संगठनों ने इस शून्य का लाभ उठाते हुए समानांतर संरचनाएं खड़ी कीं। तथाकथित “जन अदालतों” के माध्यम से न्याय प्रणाली चलाई जाने लगी, जहां निर्णय भय और दबाव के आधार पर लिए जाते थे। स्थानीय विवादों का समाधान, आर्थिक वसूली और सामाजिक नियंत्रण, सब कुछ इसी ढांचे के भीतर संचालित होने लगा। यह वह चरण था जहां राज्य की वैधता को सीधे चुनौती दी जा रही थी।
इस पूरी स्थिति को केवल जमीनी कारकों से समझना पर्याप्त नहीं होगा। नीति स्तर पर भी एक गहरी असंगति दिखाई देती है। एक ओर तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने माओवादी हिंसा को देश की सबसे बड़ी आंतरिक सुरक्षा चुनौती के रूप में स्वीकार किया, वहीं दूसरी ओर उसके समाधान को लेकर स्पष्ट और एकरूप रणनीति विकसित नहीं की।

यहां एक महत्वपूर्ण वैचारिक द्वंद्व सामने आता है। नीति निर्माण के कुछ प्रमुख मंचों पर यह दृष्टिकोण प्रभावी था कि माओवादी हिंसा के मूल में सामाजिक और आर्थिक असंतोष है, और इसलिए इसका समाधान मुख्यतः विकास और कल्याणकारी उपायों के माध्यम से किया जाना चाहिए। यह दृष्टिकोण अपने आप में एक आयाम प्रस्तुत करता है, लेकिन जब यह सुरक्षा रणनीति के साथ संतुलित नहीं होता, तब यह नीति को अस्पष्ट और असंगत बना देता है।
यही असंगति जमीनी स्तर पर भी दिखाई दी। कई बार सुरक्षा बलों ने प्रभावी अभियान शुरू किए, लेकिन उन्हें निरंतरता नहीं दी गई। कुछ क्षेत्रों में कार्रवाई तेज हुई, तो कुछ में अचानक धीमी पड़ गई। इस प्रकार की रुक-रुक कर चलने वाली रणनीति ने माओवादी समूहों को पुनर्गठित होने, अपनी स्थिति मजबूत करने और नए क्षेत्रों में विस्तार करने का अवसर दिया। जहां निरंतर दबाव बनाए रखने की आवश्यकता थी, वहां अस्थिरता ने पूरे प्रयास को कमजोर किया।

इसके साथ ही खुफिया तंत्र और स्थानीय प्रशासन के बीच समन्वय की कमी भी एक बड़ी चुनौती बनी रही। माओवादी गतिविधियों के संकेत कई बार स्पष्ट थे, लेकिन उनके आधार पर समयबद्ध और प्रभावी कार्रवाई नहीं हो सकी। इससे यह धारणा मजबूत हुई कि राज्य न केवल भौतिक रूप से, बल्कि संस्थागत स्तर पर भी कमजोर पड़ रहा है।
माओवादी रणनीति का मूल सिद्धांत ही राज्य की अनुपस्थिति का लाभ उठाना था। जब प्रशासनिक ढांचा कमजोर होता है, जब विकास की पहुंच सीमित रहती है और जब सुरक्षा तंत्र असंगत तरीके से काम करता है, तब वैकल्पिक संरचनाएं तेजी से जगह बना लेती हैं। यही हुआ उस दौर में, जब कई क्षेत्रों में माओवादी संगठनों ने खुद को एक प्रभावी समानांतर व्यवस्था के रूप में स्थापित कर लिया।

यह स्थिति केवल प्रभावित राज्यों तक सीमित नहीं रही, बल्कि इसने देश की समग्र आंतरिक सुरक्षा को प्रभावित किया। माओवादी समूहों की बढ़ती क्षमता, उनके हमलों की तीव्रता और उनके प्रभाव क्षेत्र का विस्तार, यह संकेत दे रहे थे कि यह चुनौती अब स्थानीय नहीं रही, बल्कि राष्ट्रीय स्तर की बन चुकी है।
इस पूरे दौर का एक और महत्वपूर्ण पहलू यह था कि नीति और कार्रवाई के बीच एक स्पष्ट अंतर दिखाई देता था। जहां कागजों पर योजनाएं और रणनीतियां मौजूद थीं, वहीं जमीनी स्तर पर उनका क्रियान्वयन कई बार कमजोर और असंगत रहा। इससे न केवल प्रभाव कम हुआ, बल्कि इससे यह संदेश भी गया कि राज्य अपनी ही घोषित रणनीति को लेकर स्पष्ट नहीं है।

यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि इस अवधि में माओवादी रणनीति को जिस स्तर का विस्तार मिला, वह केवल उनकी योजना का परिणाम नहीं था, बल्कि उन परिस्थितियों का भी परिणाम था जहां कांग्रेस सरकार अपनी भूमिका प्रभावी ढंग से निभाने में असफल रही।
आगे के भाग में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि यह आतंकी ढाँचा केवल जंगलों तक सीमित नहीं रहा। इसके समानांतर एक वैचारिक और शहरी नेटवर्क विकसित हुआ, जिसने इसे एक व्यापक रूप देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यही वह पहलू है, जो इस पूरी चुनौती को और जटिल बनाता है और जिसे समझना आवश्यक है।