
आज जब देश की सुरक्षा व्यवस्था पर आत्मविश्वास की चर्चा होती है, तब यह समझना आवश्यक है कि एक समय ऐसा भी था जब भारत आंतरिक मोर्चे पर गंभीर अस्थिरता के दौर से गुजर रहा था। नई पीढ़ी, जो उस कालखंड को केवल आंकड़ों के रूप में देखती है, उसके लिए यह जानना महत्वपूर्ण है कि UPA शासनकाल में आंतरिक सुरक्षा किस तरह लगातार कमजोर होती गई।
वर्ष 2009 में एक लेख में पूर्व खुफिया ब्यूरो प्रमुख अजित डोवाल ने देश की आंतरिक सुरक्षा स्थिति को लेकर गंभीर चिंता व्यक्त की थी। “Bleeding From Within” शीर्षक से लिखे गए एक लेख में उन्होंने संकेत दिया था कि खतरा केवल सीमाओं तक सीमित नहीं रहा, बल्कि देश के भीतर ऐसी परिस्थितियाँ बन रही थीं जो राष्ट्रीय सुरक्षा को प्रभावित कर रही थीं।
इस दौर में वामपंथी आतंकवाद एक प्रमुख चुनौती के रूप में उभरा। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, 2004 में यह समस्या लगभग 76 जिलों तक सीमित थी, जो कुछ ही वर्षों में बढ़कर 200 से अधिक जिलों तक पहुंच गई। हिंसा और मौतों के आंकड़ों में भी उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई। 1999 से 2003 के बीच जहां 1,550 लोगों की मौत हुई थी, वहीं 2004 से 2008 के बीच यह संख्या बढ़कर 3,177 हो गई। यह विस्तार उस गहराते संकट का संकेत था, जिसने देश के बड़े हिस्से को प्रभावित किया।

चिंता का विषय यह भी रहा कि इस चुनौती से निपटने के लिए अपेक्षित स्तर पर प्रतिक्रिया नहीं दिखी। जिस खतरे को स्वयं सरकार ने गंभीर बताया, उसके समाधान में ठोस और समन्वित प्रयासों की कमी दिखाई दी। उग्रवादी संगठनों की क्षमता और संसाधन बढ़ते गए, जबकि सरकारी प्रतिक्रिया कई स्तरों पर धीमी और असंगत रही।
इसी अवधि में आतंकवाद की चुनौती भी बनी रही। जुलाई 2006 के मुंबई विस्फोटों से लेकर नवंबर 2008 के 26/11 हमलों तक, देश ने कई बड़े हमलों का सामना किया। इन घटनाओं ने स्पष्ट किया कि आतंकी नेटवर्क सक्रिय और संगठित थे। इसके बावजूद, नीतिगत स्तर पर सख्ती के बजाय संवाद और कूटनीतिक प्रयासों पर अधिक जोर दिया गया, जिस पर लगातार सवाल उठते रहे।
विशेष रूप से 26/11 के बाद की स्थिति पर ध्यान देना आवश्यक है। जांच में सामने आया कि हमले की योजना और तैयारी लंबे समय तक चलती रही, जिसमें प्रशिक्षण, हथियारों की आपूर्ति और लॉजिस्टिक नेटवर्क शामिल था। इसके बावजूद, इस पूरे ढांचे के खिलाफ निर्णायक कार्रवाई नहीं हो सकी। इससे यह धारणा बनी कि प्रतिक्रिया अपेक्षित स्तर की नहीं थी।

जम्मू कश्मीर की स्थिति भी उस समय चिंता का कारण बनी रही। सुरक्षा एजेंसियों के अनुसार, सीमा पार से घुसपैठ और आतंकियों की सक्रियता जारी रही। बेहतर प्रशिक्षण और आधुनिक उपकरणों से लैस समूहों की मौजूदगी इस बात का संकेत थी कि समस्या व्यापक समर्थन से जुड़ी हुई थी। ऐसे में नीतिगत स्तर पर स्पष्टता और सख्ती को लेकर सवाल उठे।
राष्ट्रीय पहचान प्रणाली का मुद्दा भी इसी संदर्भ में महत्वपूर्ण रहा। वर्ष 2001 में जिस राष्ट्रीय पहचान पत्र योजना की परिकल्पना की गई थी, उसका उद्देश्य नागरिकों और अवैध घुसपैठियों के बीच अंतर स्थापित करना था। यह योजना प्रारंभिक स्तर पर आगे बढ़ी, लेकिन 2004 के बाद इसकी गति धीमी पड़ गई। इसके स्थान पर नई पहचान प्रणाली की दिशा में प्रयास शुरू हुए, जिससे नीति और क्रियान्वयन के बीच असंगति पैदा हुई। सुरक्षा विशेषज्ञों ने इसे एक महत्वपूर्ण कमी के रूप में देखा।

इन चुनौतियों के बीच खुफिया तंत्र और पुलिस व्यवस्था के आधुनिकीकरण की कमी भी स्पष्ट रही। जिस समय माओवादी और आतंकी संगठन संसाधनों और नेटवर्क के स्तर पर मजबूत हो रहे थे, उसी समय सुरक्षा एजेंसियों को आवश्यक समर्थन और ढांचा नहीं मिल पा रहा था। इसका असर जमीनी स्तर पर दिखाई दिया, जहां सुरक्षा बलों को कई बार सीमित संसाधनों के साथ काम करना पड़ा।
इन सभी पहलुओं को एक साथ देखें तो एक व्यापक तस्वीर सामने आती है। यह केवल अलग अलग घटनाओं का क्रम नहीं था, बल्कि एक ऐसी प्रवृत्ति थी जिसमें आंतरिक सुरक्षा के कई मोर्चों पर दबाव बढ़ता गया। नक्सलवाद, आतंकवाद, घुसपैठ और नीतिगत असंगति, ये सभी कारक मिलकर उस दौर को चुनौतीपूर्ण बनाते हैं।

“Bleeding From Within” शीर्षक इस स्थिति का सार प्रस्तुत करता है। यह केवल बाहरी खतरे की बात नहीं करता, बल्कि उस आंतरिक कमजोरी की ओर संकेत करता है जो किसी भी राष्ट्र के लिए अधिक गंभीर होती है। जब नीतिगत निर्णयों में स्पष्टता की कमी हो और प्रतिक्रिया समय पर न हो, तो समस्याएं धीरे धीरे गहराती जाती हैं।
आज, जब उन परिस्थितियों से निकल कर देश की आंतरिक सुरक्षा को लेकर एक अलग प्रकार का आत्मविश्वास दिखाई देता है, तब उस दौर को समझना और उससे सीख लेना और भी आवश्यक हो जाता है। इतिहास केवल अतीत का विवरण नहीं, बल्कि वर्तमान को समझने और भविष्य की दिशा तय करने का आधार भी होता है।

इस संदर्भ में कांग्रेस नीत UPA काल की आंतरिक सुरक्षा स्थिति एक महत्वपूर्ण अध्ययन का विषय है। यह दिखाती है कि नीति, निर्णय और क्रियान्वयन के बीच संतुलन कितना जरूरी है। साथ ही यह भी स्पष्ट करती है कि राष्ट्रीय सुरक्षा केवल सीमाओं की रक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह देश के भीतर की स्थिरता पर भी निर्भर करती है।
अंततः, उस दौर की सबसे बड़ी चुनौती आंतरिक थी। और जब तक किसी राष्ट्र की आंतरिक संरचना मजबूत नहीं होती, तब तक बाहरी सुरक्षा भी अधूरी रहती है। यही वह निष्कर्ष है, जिसे उस समय के अनुभव आज भी रेखांकित करते हैं।