
छत्तीसगढ़ के नारायणपुर जिले के अबूझमाड़ क्षेत्र में स्थित नेलंगुर गांव में पिछले सप्ताह एक ऐसा बदलाव दर्ज हुआ है, जिसे केवल एक विकास परियोजना का परिणाम कहकर नहीं समझा जा सकता। दशकों से बुनियादी सुविधाओं से वंचित इस दुर्गम गांव में जल जीवन मिशन के तहत पहली बार घरों तक नल से पानी पहुंचा है। करीब 115 आबादी और 35 परिवारों वाले इस गांव में अब वह दृश्य बदल रहा है, जहां कभी पानी के लिए रोजाना लंबी दूरी तय करना जीवन का अनिवार्य हिस्सा था।
नेलंगुर, नारायणपुर जिला मुख्यालय से लगभग 52 किलोमीटर दूर पहाड़ी और घने जंगलों से घिरे इलाके में स्थित है।यह गांव महाराष्ट्र के भामरागढ़ तहसील के कुवाकोडी गांव से भी करीब 8 किलोमीटर अंदर है। भौगोलिक रूप से अलग थलग यह इलाका लंबे समय तक प्रशासनिक पहुंच से बाहर रहा। यहां तक पहुंचना ही अपने आप में एक चुनौती रहा है, जहां सड़क, संचार और बुनियादी सेवाएं लंबे समय तक लगभग नदारद रहीं।
इस गांव की सबसे बड़ी समस्या पानी रही। अब तक ग्रामीण पूरी तरह प्राकृतिक जलधाराओं और मौसमी स्रोतों पर निर्भर थे। गर्मियों में यह संकट और गहरा हो जाता था, जब जलधाराएं सूखने लगती थीं और लोगों को कई किलोमीटर दूर जाकर पानी लाना पड़ता था।

यह काम मुख्य रूप से महिलाओं और बच्चों के हिस्से आता था, जिनके दिन का बड़ा हिस्सा पानी जुटाने में ही बीत जाता था। यह स्थिति इसलिए निर्मित हुई थी क्योंकि माओवादियों ने यहाँ कभी शासकीय योजनाओं को आने ही नहीं दिया, ग्रामीणों का कबी विकास ही नहीं होने दिया।
पिछले सप्ताह जल जीवन मिशन के तहत गांव में पाइपलाइन आधारित जल आपूर्ति प्रणाली शुरू होने के साथ यह स्थिति बदली है। नारायणपुर की कलेक्टर के अनुसार, गांव में सौर ऊर्जा से संचालित पंप के जरिए जल स्रोत से पानी उठाकर सीधे घरों तक पहुंचाया जा रहा है। इस प्रणाली से गांव के सभी परिवारों को जोड़ा गया है, जिससे अब पानी के लिए बाहरी स्रोतों पर निर्भरता खत्म हो रही है।
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इस बदलाव को केवल तकनीकी उपलब्धि के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा। इसके पीछे उस सुरक्षा परिदृश्य में आया परिवर्तन भी उतना ही महत्वपूर्ण है, जिसने इस तरह की परियोजनाओं को संभव बनाया। अबूझमाड़ का यह क्षेत्र लंबे समय तक माओवादी गतिविधियों का केंद्र रहा है। 1980 के दशक से यह इलाका एक सघन प्रभाव क्षेत्र के रूप में देखा जाता रहा, जहां प्रशासनिक हस्तक्षेप सीमित था और विकास कार्यों की गति बेहद धीमी रही।
पिछले वर्ष अप्रैल में नेलंगुर के आसपास सुरक्षा बलों ने एक पुलिस कैंप स्थापित किया। यह कदम केवल सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करने तक सीमित नहीं था, बल्कि इसने उस शून्य को भरा, जिसने लंबे समय तक माओवादी प्रभाव को टिकाए रखा था। स्थानीय अधिकारियों के अनुसार, इस कैंप की स्थापना के बाद क्षेत्र में सुरक्षा स्थिति में सुधार हुआ और प्रशासनिक गतिविधियों के लिए रास्ता खुला।

यह भी उल्लेखनीय है कि पिछले कुछ वर्षों में अबूझमाड़ क्षेत्र में माओवादी प्रभाव में कमी दर्ज की गई है। सुरक्षा बलों की निरंतर उपस्थिति और समन्वित कार्रवाई के परिणामस्वरूप कई ऐसे क्षेत्र, जो लंबे समय तक प्रभाव में थे, अब धीरे-धीरे सामान्य स्थिति की ओर लौट रहे हैं। नेलंगुर में जल आपूर्ति परियोजना का क्रियान्वयन इसी बदलते परिदृश्य का संकेत है।
गांव के लोगों के लिए यह बदलाव सीधा और ठोस है। अब उन्हें पानी के लिए लंबी दूरी तय नहीं करनी पड़ती। इससे न केवल समय और श्रम की बचत हुई है, बल्कि दैनिक जीवन की गुणवत्ता में भी सुधार आया है। विशेष रूप से महिलाओं के लिए यह परिवर्तन महत्वपूर्ण है, जिन पर पानी लाने की जिम्मेदारी अधिक होती थी।

जिला कलेक्टर नम्रता जैन का कहना है कि, “सौर पंप आधारित यह प्रणाली बिजली की अनुपलब्धता के बावजूद निरंतर जल आपूर्ति सुनिश्चित कर रही है। सभी परिवारों को इससे जोड़ा गया है, जिससे अब पानी घरों तक पहुंच रहा है। इससे न केवल दैनिक जीवन आसान हुआ है, बल्कि स्वच्छता के प्रति जागरूकता भी बढ़ी है।”
विकास के इस क्रम में एक और महत्वपूर्ण परियोजना राष्ट्रीय राजमार्ग 130डी का निर्माण है, जिसका कार्य पिछले वर्ष शुरू हुआ है। यह सड़क परियोजना पूरी होने के बाद इस क्षेत्र को मुख्य मार्गों से जोड़ेगी और आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा देगी। सड़क निर्माण को यहां केवल एक बुनियादी सुविधा के रूप में नहीं देखा जा सकता, बल्कि यह प्रशासनिक पहुंच और बाजार तक संपर्क का माध्यम भी बनेगा।

हालाँकि स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति भी अभी चुनौतीपूर्ण बनी हुई है। गांव के लोगों को प्राथमिक उपचार के लिए करीब 3 किलोमीटर दूर पदमकोट जाना पड़ता है। एक आंगनवाड़ी केंद्र को चालू किया गया है और एक पक्के स्कूल भवन का निर्माण जारी है, लेकिन इन सेवाओं का विस्तार अभी भी आवश्यक है।
नेलंगुर की कहानी इस व्यापक सवाल की ओर भी इशारा करती है कि विकास और सुरक्षा के बीच संबंध को कैसे समझा जाए। जिन क्षेत्रों में लंबे समय तक प्रशासनिक उपस्थिति कमजोर रही, वहां विकास कार्यों का अभाव स्वाभाविक था। लेकिन जैसे-जैसे सुरक्षा स्थिति में सुधार हुआ, वैसे-वैसे बुनियादी सुविधाओं का विस्तार संभव हुआ।

यह एक ऐसा चक्र है, जिसमें सुरक्षा और विकास एक-दूसरे को प्रभावित करते हैं। नेलंगुर में पानी की उपलब्धता इसी प्रक्रिया का एक उदाहरण है, जहां पहले सुरक्षा स्थिति में सुधार हुआ और उसके बाद विकास परियोजनाओं को जमीन पर उतारा जा सका।
फिर भी अबूझमाड़ जैसे इलाकों में भौगोलिक चुनौतियां, सीमित संसाधन और बुनियादी ढांचे की कमी अभी भी बड़ी बाधाएं हैं। लेकिन यह भी उतना ही स्पष्ट है कि जिन इलाकों को कभी पहुंच से बाहर माना जाता था, वहां अब बदलाव की शुरुआत हो चुकी है।
नेलंगुर के घरों में नल से बहता पानी केवल एक सुविधा नहीं है, बल्कि यह उस लंबे अंतराल के बाद लौटती हुई राज्य की उपस्थिति का संकेत है। यह संकेत है कि जो क्षेत्र कभी नक्शों में सीमित थे, वे अब धीरे-धीरे प्रशासनिक और विकासात्मक ढांचे में शामिल हो रहे हैं।
इस छोटे से गांव में आया यह बदलाव एक बड़े परिदृश्य की झलक देता है। यह दिखाता है कि जब बुनियादी सुविधाएं दूरस्थ इलाकों तक पहुंचती हैं, तो उनका असर केवल जीवन स्तर तक सीमित नहीं रहता, बल्कि वह सामाजिक और आर्थिक परिवर्तन की दिशा भी तय करता है।