दिल्ली, असम और नेपाल से जुड़े नेटवर्क में पढ़ा-लिखा युवक ऋतुपर्णा गोस्वामी 8000 अर्बन नक्सलियों का नेतृत्व करते हुए अगले दो वर्षों में चुनावी संस्थाओं को निशाना बनाने की साजिश रच रहा है।
देश में सुरक्षाबलों ने जंगलों में नक्सलवाद को लगभग खत्म कर दिया है, लेकिन खतरा पूरी तरह टला नहीं है। अब नक्सलियों ने अपनी रणनीति बदल दी है और शहरों में अर्बन नेटवर्क के जरिए नई साजिश रच रहे हैं। खुफिया एजेंसियों को मिले इनपुट
साफ संकेत देते हैं कि नक्सलियों की अर्बन कमेटी अगले दो से तीन वर्षों में बड़े पैमाने पर हिंसा फैलाने की तैयारी कर चुकी है।
इस साजिश का नेतृत्व असम के गुवाहाटी का रहने वाला ऋतुपर्णा गोस्वामी कर रहा है। वह दिल्ली यूनिवर्सिटी का पूर्व छात्र रहा है और उसने 2012 में नक्सल मामलों में गिरफ्तार प्रोफेसर जीएन साईबाबा के मार्गदर्शन में पीएचडी की। पढ़ाई के दौरान ही उसने रेडिकल डेमोक्रेटिक फ्रंट जैसे छात्र संगठन की स्थापना की और धीरे-धीरे नक्सल विचारधारा को शहरों में फैलाने का काम शुरू किया।
ऋतुपर्णा ने केवल वैचारिक स्तर पर ही नहीं बल्कि सैन्य स्तर पर भी खुद को तैयार किया। उसने नक्सलियों के पूर्व महासचिव गणपति के साथ जंगलों में समय बिताया और पीएलजीए से सैन्य प्रशिक्षण लिया। इसके अलावा उसने मिलिंद तेलतुमडे जैसे शहरी नक्सली रणनीतिकारों से भी प्रशिक्षण हासिल किया। यही कारण है कि संगठन ने उसे अर्बन नेटवर्क का प्रमुख बना दिया।
खुफिया जानकारी बताती है कि नक्सलियों ने शहरों में करीब 8,000 समर्थकों का नेटवर्क तैयार किया है। इनमें से लगभग 2,000 लोग सक्रिय स्लीपर सेल के रूप में काम कर रहे हैं। ये लोग आम नागरिकों के बीच रहकर मौका मिलने पर हिंसा फैलाने की क्षमता रखते हैं। एजेंसियां इनकी गतिविधियों पर लगातार नजर बनाए हुए हैं।
ऋतुपर्णा की भूमिका केवल संगठन चलाने तक सीमित नहीं है। उसने दिल्ली यूनिवर्सिटी, जेएनयू और अन्य संस्थानों से छात्रों की भर्ती कर एक मजबूत शहरी ढांचा खड़ा किया। वह इस नेटवर्क के जरिए युवाओं को वैचारिक रूप से प्रभावित करता है और उन्हें धीरे-धीरे नक्सली गतिविधियों में शामिल करता है।
एजेंसियों के अनुसार ऋतुपर्णा इस समय नेपाल में छिपा हुआ है और असम, बांग्लादेश तथा अन्य माओवादी संगठनों से संपर्क बनाए हुए है। उसकी रणनीति साफ है कि वह सीधे सामने आए बिना अपने स्लीपर सेल के जरिए दंगे और हिंसा फैलाए।
इसका उदाहरण पहले भी सामने आ चुका है। 2018 के भीमा कोरेगांव हिंसा के दौरान उसने हथियारों की व्यवस्था करने में भूमिका निभाई। जांच एजेंसियों को एक पत्र भी मिला था जिसमें उसने अपने साथियों को हिंसा फैलाने और सुरक्षाबलों पर हमला करने के निर्देश दिए थे। इसके बाद से वह एजेंसियों के रडार पर है।
इसी तरह 2020 के दिल्ली दंगों में भी नक्सल पैटर्न देखने को मिला। एजेंसियों का मानना है कि इन घटनाओं में वही रणनीति अपनाई गई, जिसमें पहले लोगों को भड़काया जाता है और फिर योजनाबद्ध तरीके से हिंसा करवाई जाती है।
अब नक्सलियों की नई योजना और भी खतरनाक है। वे चुनाव आयोग, ईडी, सीबीआई और आयकर विभाग जैसी संस्थाओं के खिलाफ लोगों में अविश्वास पैदा करना चाहते हैं। इसके लिए वे पहले विरोध प्रदर्शन खड़े करेंगे और फिर उन आंदोलनों को हिंसक रूप देंगे। इस पूरी रणनीति का उद्देश्य देश की स्थिरता को कमजोर करना है।
अर्बन नक्सली केवल शहरों तक सीमित नहीं हैं। उन्होंने जनजातीय इलाकों में भी समाज को बांटने की कोशिश की है। छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, झारखंड और ओडिशा के क्षेत्रों में उन्होंने राम और रावण के नाम पर विवाद खड़ा किया। कई जगहों पर हिंसा हुई, मंदिरों को नुकसान पहुंचाया गया और धार्मिक तनाव बढ़ाया गया।
राजनांदगांव और मोहला में मंदिरों को जलाने की घटनाएं सामने आईं। कांकेर में एक संत की हत्या तक कर दी गई। इन घटनाओं में अर्बन नक्सलियों की भूमिका सामने आई और पुलिस ने कई मामलों में कार्रवाई भी की। जांच में यह भी सामने आया कि इन घटनाओं के पीछे सुनियोजित साजिश थी, जिसका उद्देश्य समाज को बांटना था।
नक्सलियों ने धर्मांतरण और सामाजिक विवादों को भी हथियार बनाया। उन्होंने जनजातियों और ईसाइयों के बीच टकराव पैदा किया और कई जगहों पर हिंसा करवाई। पिछले चार वर्षों में ऐसी 17 बड़ी घटनाएं सामने आईं, जिनमें सैकड़ों लोग घायल हुए।
दरअसल अर्बन नक्सलियों की जड़ें 2007 में तैयार हुई रणनीति में हैं। उस समय उन्होंने तय किया कि केवल जंगलों में लड़ाई लड़ना काफी नहीं होगा। उन्होंने शहरों में घुसपैठ की योजना बनाई और छात्रों, मजदूर संगठनों, एनजीओ और विभिन्न सामाजिक समूहों के जरिए अपना नेटवर्क फैलाया।
उन्होंने लेयरिंग की रणनीति अपनाई, जिसमें वे अलग-अलग पहचान के साथ समाज में घुलमिल जाते हैं। वे छोटे-छोटे संगठनों के जरिए लोगों को जोड़ते हैं और धीरे-धीरे उन्हें अपने एजेंडे के लिए इस्तेमाल करते हैं।
आज स्थिति यह है कि अर्बन नक्सलियों का नेटवर्क एक संगठित और खतरनाक रूप ले चुका है। वे सीधे हथियार उठाने के बजाय समाज के भीतर से ही व्यवस्था को चुनौती देने की कोशिश कर रहे हैं। यही कारण है कि एजेंसियां इसे गंभीर खतरे के रूप में देख रही हैं।
अंततः यह स्पष्ट है कि नक्सलवाद का नया चेहरा शहरों में सक्रिय है और वह पहले से अधिक जटिल और खतरनाक है। इसलिए जरूरी है कि समाज सतर्क रहे, युवाओं को जागरूक किया जाए और ऐसे तत्वों की पहचान कर समय रहते कार्रवाई की जाए।