पुणे में एक सरकारी छात्रावास के सांस्कृतिक कार्यक्रम से सामने आया एक वीडियो अब राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसियों और पुलिस की जांच के दायरे में है। वीडियो में छात्र एक ऐसे गाने पर नृत्य करते दिखते हैं, जो माओवादी आतंकी माड़वी हिड़मा का महिमामंडन करता है। यह घटना 6 से 14 अप्रैल के बीच डॉ. भीमराव आंबेडकर जयंती के अवसर पर आयोजित कार्यक्रमों के दौरान पुणे के विश्रांतवाड़ी स्थित सरकारी छात्रावास में हुई।
रिपोर्ट के अनुसार, “ओ रे बंदूक वाले” नामक गीत पर छात्रों का समूह नृत्य करता दिख रहा है, जो एक शीर्ष माओवादी आतंकी के महिमामंडन के लिए बनाया गया था। पुलिस और खुफिया एजेंसियों ने इस वीडियो का संज्ञान लिया है और छात्रों से पूछताछ की जा रही है।
प्रशासन की ओर से शुरुआती प्रतिक्रिया आई है कि यह प्रथम दृष्ट्या निर्दोष हो सकते हैं। लेकिन यही वह बिंदु है जहां सवाल और गहरा हो जाता है। क्या एक ऐसे व्यक्ति के नाम पर सार्वजनिक मंच पर प्रदर्शन वास्तव में “निर्दोष” माना जा सकता है, जो दशकों तक हिंसक माओवादी गतिविधियों का चेहरा रहा हो?
माड़वी हिड़मा कोई सामान्य व्यक्ति नहीं था। वह प्रतिबंधित Communist Party of India (Maoist) का केंद्रीय कमेटी सदस्य था और देश के सबसे वांछित नक्सली आतंकियों में गिना जाता था। वह कई घातक हमलों का मास्टरमाइंड रहा और उस पर इनाम भी घोषित था।
माओवादी आतंकी संगठन स्वयं भारत में एक प्रतिबंधित और हिंसक संगठन है, जिसका घोषित उद्देश्य लोकतांत्रिक व्यवस्था को सशस्त्र संघर्ष के माध्यम से चुनौती देना है। ऐसे व्यक्ति पर गीत बनना और उस पर नृत्य होना, केवल एक सांस्कृतिक घटना नहीं है। यह उस विचारधारा के सामान्यीकरण की ओर संकेत करता है, जिसने दशकों तक देश के भीतर हिंसा फैलाई।
यह पहली बार नहीं है जब हिड़मा जैसे नाम सार्वजनिक रूप से सामने आए हों। नवंबर 2025 में दिल्ली के इंडिया गेट पर हुए एक विरोध प्रदर्शन के दौरान
“हर घर से हिड़मा निकलेगा” जैसे नारे लगाए गए थे। इस घटना ने राष्ट्रीय स्तर पर बहस छेड़ दी थी कि क्या देश के भीतर माओवादी विचारधारा को वैचारिक समर्थन मिल रहा है?
उसके बाद केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने यह आरोप लगाया था कि राहुल गांधी ने ऐसे कंटेंट को साझा कर अप्रत्यक्ष रूप से इस प्रकार की सोच को बढ़ावा दिया। यह आरोप केवल राजनीतिक बयान भर नहीं था, बल्कि इस व्यापक चिंता का हिस्सा था कि क्या देश के भीतर कुछ वैचारिक समूह हिंसक आंदोलनों के प्रति सहानुभूति बना रहे हैं?
इतिहास गवाह है कि माओवादी आतंक केवल बंदूक के दम पर नहीं चलता। यह विचार, संस्कृति और प्रतीकों के माध्यम से भी फैलता है। ‘जन नाट्य मंडली’ जैसे संगठन इसी उद्देश्य से बनाए गए थे कि गीत, नाटक और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के जरिए वैचारिक आधार तैयार किया जा सके।
पुणे की घटना इसी पैटर्न की याद दिलाती है। जब एक सरकारी संस्थान के भीतर, एक सांस्कृतिक मंच पर, ऐसे गीत प्रस्तुत होते हैं, तो यह केवल एक कार्यक्रम नहीं रह जाता, बल्कि यह एक वैचारिक संदेश बन जाता है। रिपोर्ट्स के अनुसार, इस कार्यक्रम में भाग लेने वाले कई छात्र जनजातीय पृष्ठभूमि से थे और कुछ गढ़चिरौली जैसे नक्सल प्रभावित क्षेत्रों से आए थे।
यही वह क्षेत्र हैं, जहां नक्सलवाद ने सबसे ज्यादा नुकसान किया है। जहां स्कूल जले, सड़कें रुकीं और आम लोगों का जीवन असुरक्षित रहा। ऐसे क्षेत्रों से आने वाले युवाओं के बीच यदि उसी विचारधारा के प्रतीकों का महिमामंडन हो रहा है, तो यह केवल एक सांस्कृतिक घटना नहीं, बल्कि वैचारिक प्रभाव का संकेत है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि एक सरकारी छात्रावास में इस प्रकार का कार्यक्रम कैसे आयोजित हुआ। क्या आयोजकों ने सामग्री की जांच नहीं की? क्या प्रशासन की कोई जिम्मेदारी नहीं बनती कि वह इस प्रकार की गतिविधियों को रोके?
यदि इसे “अज्ञानता” कहकर छोड़ दिया जाता है, तो यह एक खतरनाक मिसाल बनेगी। क्योंकि इससे यह संदेश जाएगा कि हिंसक विचारधाराओं से जुड़े प्रतीकों का सार्वजनिक महिमामंडन भी स्वीकार्य है।
इस पूरे मामले में सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि इसे सामान्य बनाने की कोशिश की जा रही है। “बच्चे हैं”, “समझ नहीं थी”, “सांस्कृतिक कार्यक्रम था” जैसे तर्क समस्या को हल नहीं करते, बल्कि उसे ढकते हैं। आज यह एक गाना है, कल यह एक नारा बनता है, और परसों वही विचार जमीन पर असर दिखाता है। यही वह क्रम है, जिसे समय रहते पहचानना जरूरी है।
पुणे की घटना को केवल एक स्थानीय खबर मानकर नजरअंदाज करना आसान है, लेकिन यह एक बड़े पैटर्न की ओर इशारा करती है। जब दिल्ली में नारे लगते हैं और पुणे में गीत बजते हैं, तो यह अलग-अलग घटनाएं नहीं होतीं, बल्कि एक ही वैचारिक प्रवाह के संकेत होते हैं। यह समय है स्पष्टता का। यह तय करने का कि क्या हम हिंसक विचारधाराओं के प्रतीकों को सांस्कृतिक रूप में स्वीकार करेंगे या उनके प्रति स्पष्ट असहमति रखेंगे।