छत्तीसगढ़ के कांकेर में दशकों बाद बड़ा बदलाव देखने को मिला है। नक्सल प्रभाव घटने के बीच अब पुलिस बिना हथियार मेले की व्यवस्था संभाल रही है, जो सामान्य हालात लौटने का संकेत है।
तीन दशकों तक खौफ के साये में जीने वाला बड़गांव का प्रसिद्ध मड़ई मेला आज एक नई कहानी दर्शा रहा है। जिस जगह कभी गोलियों और चीखने-चिल्लाने की आवाज गूंजती थी, आज वहीं खुशियों की किलकारिय गूंज रही है, आज वहीं जनसैलाब देखने को मिल रहा है।
मेला परिसर में उमड़ा जनसैलाब सिर्फ भीड़ नहीं, बल्कि उस भरोसे की वापसी है जो दशकों पहले कही खो चुकी थी। लोग अब बिना किसी डर के अपने परिवार के साथ मेले का आनंद ले रहे हैं, जैसे की जिंदगी ने एक बार फिर सामान्य रफ्तार पकड़ ली हो।
कांकेर जिले से सामने आई यह तस्वीर उस बड़े बदलाव की गवाही देती है, जो कभी नक्सल हिंसा से प्रभावित रहे इलाकों में अब धीरे-धीरे नजर आ रहा है। बीते करीब 30-35 वर्षों में पहली बार ऐसा हुआ है, जब पुलिस बिना हथियार के किसी मेले की व्यवस्था संभाल रही है।
एक समय था जब इस इलाके में नक्सलियों का गहरा असर था। हालात इतने संवेदनशील थे कि पुलिस और सुरक्षा बलों को हर वक्त हथियारों के साथ ही ड्यूटी करनी पड़ती थी। छोटे-से-छोटे आयोजन में भी खतरे की आशंका बनी रहती थी,और हर कदम सतर्कता के साथ उठाया जाता था।
नक्सल प्रभाव के दौरान सार्वजनिक आयोजन करना भी आसान नहीं था। लोगों के मन में हमेशा एक डर बैठा रहता था, कहीं कुछ अनहोनी न हो जाए। यही वजह थी कि कई बार मेले और त्योहारों की रौनक भी फीकी पड़ जाती थी।
लेकिन अब जो द्रिश्य सामने है, वह पूरी तरह बदला चूका है। मेले में पुलिसकर्मी बिना हथियार, सामान्य तरीके से ड्यूटी करते नजर आए, भीड़ में घुलते-मिलते, लोगों से बात करते और बिना किसी तनाव के व्यवस्था संभालते हुए। यह बदलाव सिर्फ सुरक्षा व्यवस्था में सुधार नहीं, बल्कि पूरे माहौल के बदलने का इशारा है।
पुलिस जवानों के चेहरों पर अब डर नहीं, बल्कि आत्मविश्वास और सुकून नजर आ रहा है। जहां दशको पहले हर पल खतरे की आशंका हुआ करती थी, वहीं अब हालात इतने सामान्य हो गए हैं कि बिना हथियार भी ड्यूटी मुमकिन हो गयी है।
यह बदलाव अचानक नहीं आया है। इसके पीछे लंबे समय तक चले सुरक्षा प्रयास, नक्सल नेटवर्क पर दबाव और इलाके में बेहतर नियंत्रण की अहम भूमिका रही है। नक्सल गतिविधियों में आई कमी ने आम लोगों को राहत दी है और धीरे-धीरे सामान्य जीवन को वापस पटरी पर लाया गया है।
हालांकि पूरी तरह से खतरा खत्म होने की बात कहना अभी जल्दबाजी होगी, लेकिन यह दावा है कि हालात पहले से कहीं ज्यादा बेहतर हैं। यही वजह है कि अब ऐसे आयोजनों का शांतिपूर्ण और सफल आयोजन संभव हो पा रहा है।
सबसे बड़ा बदलाव लोगों के मन में आया है। अब वे बिना डर के घर से निकल रहे हैं, मेलों में जा रहे हैं और अपने परिवारों के साथ खुलकर खुशियां मना रहे हैं।
कांकेर से सामने आई यह तस्वीर सिर्फ एक खबर नहीं, बल्कि एक लंबे संघर्ष के बाद आई राहत की झलक है। जहां कभी डर का साया था, वहां आज भरोसा लौट रहा है और बिना हथियार मेला संभालती पुलिस उसी बदलाव की सबसे मजबूत तस्वीर बनकर सामने आई है।
Written by
मोक्षी जैन
उपसंपादक, द नैरेटिव