नक्सलवाद पर कब थमेगा वामपंथियों का प्रोपेगेंडा ?

नक्सलवाद पर चल रही बहस में एक बड़ा सवाल उभरता है कि वामपंथी मीडिया हमेशा एक पक्ष ही क्यों दिखाता है? बस्तर की जमीन पर मौजूद वास्तविकता और नंदिनी सुंदर जैसे वामपंथियों के लेखों में प्रस्तुत नैरेटिव के बीच गहरा अंतर दिखाई देता है। पढ़िए क्या है पूरी सच्चाई!

The Narrative World    28-Apr-2026   
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दिल्ली के वातानुकूलित कमरों में बैठकर जब बस्तर की कहानी लिखी जाती है, तो वह अक्सर “संघर्ष” बन जाती है, “विरोध” बन जाती है, और कभी-कभी “न्याय की लड़ाई” भी बन जाती है। लेकिन वही कहानी जब बस्तर के गांवों में जाकर देखी जाती है, तो वह खून, डर, आतंक और नियंत्रण की कहानी होती है। यही वह मूल अंतर है, जो नंदिनी सुंदर जैसे वामपंथी लेखकों के लेखन और जमीनी वास्तविकता के बीच खड़ा दिखाई देता है।


द वायर में नंदिनी सुंदर के प्रकाशित लेख में एक बार फिर वही पुराना फ्रेम सामने आता है कि राज्य की हर कार्रवाई संदिग्ध है, और माओवादी हिंसा एक तरह से परिस्थितियों की उपज है। यह फ़्रेमिंग नई नहीं है। यह वर्षों से दोहराई जा रही है। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह फ़्रेमिंग पूरी सच्चाई है या यह भी एक चयनित नैरेटिव है, जिसमें कुछ तथ्यों को सामने लाया जाता है और कुछ को व्यवस्थित रूप से दबा दिया जाता है?


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बस्तर को समझने के लिए सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि माओवादी आतंक वहाँ कैसे पहुँचा। यह कोई स्वतःस्फूर्त विद्रोह नहीं था। माओवादी दस्तावेज़ खुद बताते हैं कि उन्होंने रणनीतिक रूप से उन क्षेत्रों को चुना, जहाँ राज्य की पकड़ कमजोर थी और जहाँ वे “आधार क्षेत्र” बना सकते थे। यानी शुरुआत से ही यह एक संगठित, वैचारिक और योजनाबद्ध विस्तार था, न कि अचानक भड़का "जन आंदोलन"।


इसके बाद जो हुआ, वह और भी महत्वपूर्ण है। बस्तर के समाज में धीरे-धीरे वैचारिक प्रोपेगैंडा फैलाया गया, लोगों को जोड़ा गया और फिर उसी समाज को एक “ढाल” की तरह इस्तेमाल किया गया। माओवादी रणनीति में यह स्पष्ट लिखा गया है कि जनता ही उनके लिए “पानी” है और वे खुद “मछली” हैं। यह कोई भावनात्मक उपमा नहीं, बल्कि एक रणनीतिक सोच है, जहाँ समाज को ही युद्ध का माध्यम बनाया जाता है। अब प्रश्न यह है कि जब यही समाज इस नियंत्रण से तंग आकर विरोध करता है, तो उसे क्या कहा जाएगा?


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बस्तर में यही हुआ। वर्षों तक चले नियंत्रण, हिंसा और हस्तक्षेप के बाद जब लोगों ने इसका विरोध किया, तो वह सलवा जुडूम के रूप में सामने आया। वामपंथियों द्वारा इसे आज “राज्य प्रायोजित हिंसा” के रूप में प्रस्तुत करना आसान है, लेकिन इसके मूल में जो कारण थे, उन्हें नजरअंदाज करना क्या सही विश्लेषण है?


बस्तर के गांवों में माओवादी प्रभाव केवल राजनीतिक नहीं था। उन्होंने जीवन के हर पहलू को नियंत्रित किया। बच्चों को पढ़ने से रोका गया, परिवारों से बच्चों को माओवादी संगठन में शामिल करने का दबाव बनाया गया, महिलाओं के साथ शारीरिक-मानसिक शोषण की घटनाएँ सामने आईं और आजीविका के साधनों तक पर नियंत्रण किया गया। यह केवल “संघर्ष” नहीं था, यह एक संगठित नियंत्रण तंत्र था।


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फिर भी, जब इन घटनाओं की चर्चा होती है, तो वे अक्सर फुटनोट बनकर रह जाती हैं। मुख्य नैरेटिव हमेशा यही रहता है कि राज्य ने क्या किया। यहाँ सबसे बड़ा सवाल खड़ा होता है कि क्या यह संतुलित दृष्टिकोण है?


जब नंदिनी सुंदर अपने लेख में राज्य की जवाबदेही की बात करती हैं, तो वह अपने लेख में माओवादी हिंसा के संरचनात्मक पहलुओं को सीमित कर देती है। सलवा जुडूम पर सुप्रीम कोर्ट का निर्णय इस पूरे विमर्श का सबसे विवादित बिंदु है। यह निर्णय एक संवैधानिक प्रक्रिया का हिस्सा था, और उसका सम्मान होना चाहिए। लेकिन उसके परिणामों पर चर्चा करना भी उतना ही जरूरी है।


जब यह निर्णय आया, तब जमीन पर क्या हुआ? जो लोग माओवादी हिंसा के खिलाफ खड़े हुए थे, वे अचानक निहत्थे हो गए। सुरक्षा ढांचा बदल गया, और कई क्षेत्रों में माओवादियों का प्रभाव फिर से बढ़ा। यह वह हिस्सा है, जो अक्सर लेखों में नहीं दिखता। और यहीं नैरेटिव की लड़ाई सबसे स्पष्ट हो जाती है।


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माओवादी दस्तावेज़ यह भी स्पष्ट करते हैं कि उनका संघर्ष केवल जंगलों तक सीमित नहीं है। शहरी क्षेत्रों में वैचारिक समर्थन, नेटवर्किंग और नैरेटिव निर्माण, यह उनकी रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा है। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या शहरी विमर्श पूरी तरह स्वतंत्र है, या वह भी इस व्यापक रणनीति से प्रभावित होता है?


यह एक ऐसा विषय है, जिस पर गंभीर चर्चा होनी चाहिए। लेकिन समस्या तब होती है जब इस तरह के प्रश्न उठाने को ही “निरस्त” कर दिया जाता है। बस्तर के लोगों के लिए यह बहस केवल विचारधारा की नहीं है। उनके लिए यह जीवन और मृत्यु का प्रश्न है। जिन परिवारों ने अपने बच्चों को खोया, जिन गांवों ने वर्षों तक डर में जीवन जिया, उनकी आवाज़ इस पूरे विमर्श में कहाँ है?


क्या वे केवल आंकड़े हैं? या फिर उनकी पीड़ा भी इस नैरेटिव का हिस्सा होनी चाहिए? नंदिनी सुंदर का लेख एक माओवादी दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है, जो पूरी तस्वीर नहीं है। और जब किसी जटिल परिस्तिथि को केवल एक ही फ्रेम में प्रस्तुत किया जाता है, तो वह विश्लेषण नहीं रहता, वह नैरेटिव बन जाता है।


शुभम उपाध्याय

संपादक, स्तंभकार, टिप्पणीकार