मई दिवस: मजदूरों के नाम पर कम्युनिस्ट प्रोपेगेंडा का वार्षिक मंच?

मई दिवस को दुनिया भर में मजदूरों के अधिकारों के प्रतीक के रूप में देखा जाता है, लेकिन इसका इतिहास कई परतों में बंटा हुआ है। शिकागो के हेमार्केट से लेकर सोवियत परेड और भारत के नक्सल आतंक तक, यह दिन केवल श्रमिक संघर्ष नहीं, बल्कि वैचारिक विमर्श का भी मंच बना।

The Narrative World    29-Apr-2026   
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हर साल 1 मई को दुनिया भर में मजदूर दिवस मनाया जाता है। रैलियां निकलती हैं, नारे लगते हैं और भाषण दिए जाते हैं। लेकिन सवाल बना रहता है कि क्या यह वास्तव में मजदूरों के आर्थिक अधिकारों का उत्सव है, या फिर एक वैचारिक अभियान, जिसने एक श्रम संघर्ष को वर्ग युद्ध और कम्युनिस्ट क्रांति की भाषा में ढाल दिया।


जांच पड़ताल से स्पष्ट होता है कि मई दिवस की शुरुआत अमेरिकी मजदूर आंदोलन से हुई, लेकिन बाद में सेकंड इंटरनेशनल और फिर सोवियत संघ सहित कम्युनिस्ट नेटवर्क ने इसे एक राजनीतिक औजार के रूप में विकसित किया। कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो की वर्ग संघर्ष की अवधारणा से लेकर भारत के शहरी नेटवर्क तक, यह दिन कई जगहों पर वैचारिक संदेश के प्रसार का माध्यम बन गया, जहां श्रमिक मुद्दों को व्यापक राजनीतिक नैरेटिव से जोड़ा गया।


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इसकी जड़ें 1886 के शिकागो के हेमार्केट अफेयर में मिलती हैं। उस समय अमेरिका में औद्योगिक मजदूर 10 से 16 घंटे तक काम करते थे। फेडरेशन ऑफ ऑर्गनाइज्ड ट्रेड्स एंड लेबर यूनियंस ने 1 मई 1886 को आठ घंटे के कार्यदिवस की मांग के साथ राष्ट्रव्यापी हड़ताल का आह्वान किया। शिकागो इस संघर्ष का केंद्र बना।

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मई को मैककॉर्मिक रीपर वर्क्स पर पुलिस फायरिंग में कई मजदूर मारे गए। 4 मई को हेमार्केट स्क्वायर में एक सभा चल रही थी, जिसे स्थानीय प्रशासन ने शांतिपूर्ण बताया। पुलिस के हस्तक्षेप के दौरान एक अज्ञात व्यक्ति ने बम फेंका। विस्फोट और उसके बाद हुई फायरिंग में कई पुलिसकर्मी और नागरिक मारे गए।


इस घटना के बाद आठ अराजकतावादी और सोशलिस्ट नेताओं पर मुकदमा चला। चार को फांसी दी गई, एक ने आत्महत्या की और बाकी को बाद में माफ कर दिया गया। बम फेंकने वाले की पहचान कभी स्पष्ट नहीं हुई। मुकदमे को पक्षपाती माना गया। हेमार्केट घटना श्रमिक अधिकारों के संघर्ष का प्रतीक बनी, लेकिन इसके साथ हिंसा और अराजकतावादी तत्वों की छाया भी जुड़ी रही।


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यही कारण भी है कि अमेरिका ने मई दिवस को आधिकारिक रूप से कभी स्वीकार नहीं किया। 1894 में पुलमैन स्ट्राइक के बाद राष्ट्रपति ग्रोवर क्लीवलैंड ने सितंबर में लेबर डे घोषित किया, ताकि श्रमिक आंदोलन को अलग दिशा दी जा सके और कम्युनिस्ट वैचारिक प्रभाव से दूरी बनाई जा सके।


इसके बाद 1889 में पेरिस में कम्युनिस्टों के सेकंड इंटरनेशनल की बैठक में 1 मई को अंतरराष्ट्रीय श्रमिक दिवस के रूप में मनाने का प्रस्ताव पारित हुआ। यह संगठन समाजवादी और मार्क्सवादी दलों का मंच था। इस निर्णय के साथ मई दिवस को एक वैश्विक राजनीतिक संदर्भ मिला। कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो में वर्णित वर्ग संघर्ष की अवधारणा यहां सार्वजनिक अभिव्यक्ति का माध्यम बनी।


“कम्युनिस्ट विचारधारा के अनुसार इतिहास को वर्ग संघर्ष के रूप में देखा गया। फ्रीमैन और स्लेव, पैट्रिशियन और प्लेबियन, लॉर्ड और सर्फ से लेकर बुर्जुआ और सर्वहारा तक, हर युग में संघर्ष को केंद्रीय तत्व माना गया। इस दृष्टिकोण में मजदूर वर्ग को संगठित कर राजनीतिक परिवर्तन लाना प्रमुख लक्ष्य था। आठ घंटे के कार्यदिवस की मांग तत्कालीन मुद्दा थी, लेकिन इसे व्यापक कम्युनिस्ट विचार से जोड़ा गया।”


1917 की तथाकथित रूसी क्रांति के बाद सोवियत संघ ने मई दिवस को बड़े वैचारिक-राजनीतिक प्रदर्शन में बदल दिया। रेड स्क्वायर की परेडों में सैन्य शक्ति, वैचारिक प्रतीक और राज्य की छवि का प्रदर्शन किया जाता था। टैंक, मिसाइलें, सैनिक के साथ-साथ मार्क्स तथा लेनिन के चित्र इस आयोजन का हिस्सा होते थे। ऐसे आयोजनों में मजदूरों को तो केंद्र में दिखाया जाता था, लेकिन उसी सोवियत कम्युनिस्ट शासन में स्वतंत्र श्रमिक यूनियनों की भूमिका नगण्य थी और श्रम पर पूरी तरह से राज्य का नियंत्रण था।


तत्पश्चात कोमिंटर्न के माध्यम से इस मॉडल को अन्य देशों में फैलाया गया। चीन, क्यूबा और पूर्वी यूरोप में मई दिवस पार्टी और राज्य की विचारधारा के प्रदर्शन का प्रमुख मंच बन गया। इस प्रक्रिया में मजदूरों की वास्तविक समस्याओं के साथ वामपंथ का राजनीतिक संदेश भी जोड़ा गया।


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वहीं भारत में मई दिवस का इतिहास वर्ष 1923 से जुड़ा है, जब मद्रास में इसे पहली बार मनाया गया। शुरुआती दौर में यह औद्योगिक श्रमिकों की मांगों से जुड़ा था, लेकिन समय के साथ विभिन्न राजनीतिक संगठनों ने इसे अपने-अपने दृष्टिकोण से अपनाया।


1967 की नक्सलबाड़ी हिंसा इस संदर्भ में एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुई। पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग जिले में कम्युनिस्ट नेताओं द्वारा की गई हिंसा ने माओवादी विचारधारा को जमीन पर स्थापित किया। चारु मजूमदार, कानू सान्याल और अन्य नेताओं ने सशस्त्र संघर्ष की लाइन अपनाई। इसके बाद शहरी क्षेत्रों में भी इसका प्रभाव देखा गया, जहां छात्र और बुद्धिजीवी वर्ग के कुछ हिस्से इससे जुड़े।


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1970 के दशक में यह प्रभाव शहरों तक फैल गया। वर्तमान मेंअर्बन नक्सलशब्द का इस्तेमाल उन्हीं शहरी नेटवर्क के लिए किया जाता है, जो वैचारिक और लॉजिस्टिक स्तर पर माओवादी गतिविधियों का समर्थन करते हैं। कोरेगांव-भीमा और एल्गार परिषद जैसे मामलों में कई अर्बन नक्सलियों की गिरफ्तारी इसी संदर्भ में हुई।


वहीं मई दिवस को देखें तो, भारत में विभिन्न ट्रेड यूनियन और राजनीतिक दल मई दिवस पर अपने-अपने कार्यक्रम आयोजित करते हैं। सीपीआई, सीपीएम और उनकी यूनियनें अपनी कम्युनिस्ट नीतियों को आगे बढ़ाते हुए विभिन्न मुद्दों पर विरोध दर्ज कराती हैं, जिसमें श्रमिकों के वास्तविक मुद्दों से अधिक व्यापक कम्युनिस्ट राजनीतिक एजेंडा प्रमुख रहता है।


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वहीं हम इन्हीं कम्युनिस्ट समूहों के इतिहास को देखें, तो यह दिखाता है कि जिन भी देशों में कम्युनिस्ट वैचारिक मॉडल लागू किए गए, वहां श्रमिक संगठनों की स्वतंत्रता ख़त्म कर दी गई और राज्य का नियंत्रण स्थापित हुआ, चाहे वो पूर्वकाल का सोवियत हो या वर्तमान का चीन हो।


भले ही आज मई दिवस कई जगहों पर एक सामान्य श्रमिक उत्सव के रूप में मनाया जाता है, लेकिन इसका ऐतिहासिक और वैचारिक पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है। हेमार्केट से लेकर सेकंड इंटरनेशनल, सोवियत मॉडल, नक्सलबाड़ी और वर्तमान कम्युनिस्ट शहरी नेटवर्क तक, इसकी यात्रा कई परतों में विकसित हुई है।


भारत जैसे लोकतंत्र में, जहां संवैधानिक तरीकों से बदलाव संभव है, यह जरूरी हो जाता है कि श्रमिक मुद्दों को किस रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। मई दिवस मनाना स्वयं में विवाद का विषय नहीं है, लेकिन इसका उपयोग किस उद्देश्य से किया जा रहा है, यह प्रश्न लगातार बना हुआ है। श्रमिकों के अधिकारों को केंद्र में रखना और उन्हें किसी व्यापक वैचारिक एजेंडे में सीमित न कर देना ही इस दिन की मूल भावना को बनाए रखने की सबसे बड़ी चुनौती है।

शुभम उपाध्याय

संपादक, स्तंभकार, टिप्पणीकार