खूंखार नक्सली प्रशांत बोस का अंत, परिवार ने अंतिम संस्कार से किया इनकार, प्रशासन ने निभाई जिम्मेदारी

जीवनभर हिंसा फैलाने वाला बोस अंत में धार्मिक ग्रंथों में डूबा रहा, परिवार ने शव लेने से किया इनकार और प्रशासन ने निभाया अंतिम संस्कार का दायित्व।

The Narrative World    05-Apr-2026   
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देश में नक्सल आतंक का बड़ा चेहरा रहा खूंखार नक्सली प्रशांत बोस आखिरकार अपनी मौत से बच नहीं सका। 200 से ज्यादा जवानों और करीब 1,000 निर्दोष नागरिकों की हत्या का आरोपी यह कुख्यात माओवादी नेता रांची के राजेंद्र आयुर्विज्ञान संस्थान में दम तोड़ गया। जिस व्यक्ति ने वर्षों तक हिंसा और खूनखराबे का रास्ता अपनाया, उसके अंतिम समय में उसे अपनाने वाला कोई नहीं मिला। प्रशासन ने ही उसका अंतिम संस्कार कराया।
 
प्रतिबंधित संगठन कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (माओवादी) का पोलित ब्यूरो सदस्य प्रशांत बोस, जिसे लोग किशन दा के नाम से जानते थे, 3 अप्रैल को रिम्स में मरा। उसके सिर पर एक समय एक करोड़ रुपये का इनाम घोषित था। सुरक्षा एजेंसियों ने उसे देश के सबसे खतरनाक नक्सली नेताओं में गिना। उसने झारखंड, बिहार, छत्तीसगढ़ और आंध्र प्रदेश समेत सात राज्यों में हिंसा का जाल फैलाया।
 
सुरक्षा एजेंसियों के अनुसार, प्रशांत बोस ने अपने जीवन में 200 से अधिक नक्सली हमलों की साजिश रची और उन्हें अंजाम दिलाया। इन घटनाओं में करीब 1,000 निर्दोष नागरिकों और 200 सुरक्षाकर्मियों की जान गई। उसने अपनी विचारधारा के नाम पर देश को खून से रंगने में कोई कसर नहीं छोड़ी। वह नक्सल संगठन का मुख्य रणनीतिकार और विचारक बना रहा और संगठन को मजबूत करने के लिए लगातार हिंसा को बढ़ावा देता रहा।
 
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गौरतलब है कि गिरफ्तारी के समय उसकी हालत बेहद खराब थी। वह लकवा और पार्किंसन जैसी बीमारियों से जूझ रहा था। सुरक्षा बलों ने उसे उसकी पत्नी शीला मरांडी के साथ गिरफ्तार किया था, जो खुद माओवादी संगठन की केंद्रीय समिति की सदस्य रही।
 
हैरानी की बात यह रही कि जिस व्यक्ति ने जीवन भर हिंसा और नफरत का रास्ता चुना, वही अपने अंतिम दिनों में धार्मिक ग्रंथों की शरण लेने लगा। वह रोज सुबह-शाम भगवद गीता और रामायण पढ़ता था। वह अपने पापों का प्रायश्चित करने की कोशिश करता दिखा। लेकिन यह सवाल भी खड़ा होता है कि जब वह निर्दोष लोगों की जान ले रहा था, तब उसे किसी धर्म या मानवता की याद क्यों नहीं आई।
 
 
जेल अधीक्षक कुमार चंद्रशेखर ने बताया कि बोस की पत्नी शीला मरांडी ने पत्र लिखकर प्रशासन से ही अंतिम संस्कार करने की बात कही। उसने साफ कहा कि बोस का कोई परिजन नहीं है जो शव लेने आए। इसके बाद प्रशासन ने नियमों के तहत उसका अंतिम संस्कार कराया।
 
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यह घटना नक्सलवाद की सच्चाई को साफ़ सामने लाती है। नक्सली संगठन भोले-भाले जनजातियों को बहकाते हैं, उन्हें धर्म और समाज से दूर करते हैं और हिंसा के रास्ते पर धकेलते हैं। लेकिन जब इन नेताओं का अंत समय आता है, तब वही लोग धर्म और आस्था का सहारा लेने लगते हैं। यह दोहरी सोच नक्सल विचारधारा की खोखलापन दिखाती है।
 
 
पश्चिम बंगाल का रहने वाला प्रशांत बोस दशकों तक नक्सली आतंक का चेहरा बना रहा। संगठन में उसकी हैसियत इतनी ऊंची थी कि सुरक्षा एजेंसियां उसे महासचिव नंबाला केशव राव के बाद दूसरा सबसे बड़ा नेता मानती थीं। उसने युवाओं को गुमराह किया और देश के खिलाफ हिंसा को बढ़ावा दिया।
 
अब उसकी मौत के साथ नक्सलियों का तथाकथित आंदोलन लगभग खत्म ही हो चुका है। हालांकि यह भी सच है कि जब तक इस विचारधारा को पूरी तरह जड़ से समाप्त नहीं किया जाएगा, तब तक इसका खतरा पूरी तरह खत्म नहीं माना जा सकता। सरकार और सुरक्षा बल लगातार इस दिशा में काम कर रहे हैं और उन्हें इसमें उल्लेखनीय सफलता भी मिल रही है।