भारत के सुरक्षा इतिहास में 6 अप्रैल 2010 का दिन एक गहरे जख्म की तरह दर्ज है। छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले के घने जंगलों में ताड़मेटला के पास नक्सलियों ने ऐसा खूनी खेल खेला, जिसने पूरे देश को झकझोर दिया। इस हमले में 76 सुरक्षाबलों के जवानों ने अपने प्राणों का सर्वोच्च बलिदान दिया। आज देश उन वीर सपूतों को श्रद्धा से याद करता है और उनके साहस को नमन करता है।
सबसे पहले, ताड़मेटला हमले की घटनाओं को समझना जरूरी है। 6 अप्रैल 2010 की सुबह,
केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (CRPF) की 62वीं बटालियन के जवान सर्च ऑपरेशन पूरा करके अपने बेस कैंप की ओर लौट रहे थे। तभी चिंतलनार और ताड़मेटला के बीच घने जंगलों में पहले से घात लगाकर बैठे लगभग 1,000 माओवादियों ने अचानक हमला बोल दिया। नक्सलियों ने पहाड़ियों पर अपनी मजबूत स्थिति बनाई और ऊंचाई का फायदा उठाते हुए चारों तरफ से गोलियां बरसाईं।
जवानों ने बहादुरी से मुकाबला किया, लेकिन नक्सलियों की संख्या और उनकी रणनीति भारी पड़ी। इस कायराना हमले में 75 CRPF जवानों और राज्य पुलिस के एक जवान ने वीरगति प्राप्त की। इतना ही नहीं, हमलावर नक्सली जवानों के हथियार भी लूटकर भाग निकले। इस घटना ने इसे देश का सबसे भयावह नक्सली हमला बना दिया, जिसमें सबसे अधिक जवानों ने बलिदान दिया।
यह घटना वामपंथी उग्रवाद के असली स्वरूप को सामने लाती है। नक्सलवाद को केवल 1967 के नक्सलबाड़ी आंदोलन तक सीमित मानना अधूरा है; इसकी जड़ें 1920 के दशक से ही भारत में थीं। 1967 में इसे बस एक स्थानीय पहचान मिली, जहां माओ त्से तुंग के सिद्धांतों से प्रेरित यह विचार हिंसक रूप लेकर सशस्त्र संघर्ष को बढ़ावा देने लगा। हकीकत में, यही विचारधारा हिंसा और भय का आधार बन गई।
ताड़मेटला हमले में भी पीपुल्स लिबरेशन गेरिला आर्मी (PLGA), जो कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (माओवादी) का सैन्य विंग है, ने बर्बरता की सभी हदें पार कर दीं। नक्सलियों ने निर्दोष जवानों को निशाना बनाया और अपने राजनीतिक मकसद के लिए खून-खराबा किया। इस तरह के हमले साफ तौर पर साबित करते हैं कि कम्युनिस्ट विचारधारा के नाम पर फैलाया गया यह तथाकथित आंदोलन सिर्फ विनाश और भय का रास्ता दिखाता था।
हालांकि, समय के साथ स्थिति बदली है। केंद्र सरकार और सुरक्षाबलों ने लगातार प्रयास किए और नक्सलियों के नेटवर्क को कमजोर किया। आज कई बड़े नक्सली या तो मारे जा चुके हैं, गिरफ्तार हो चुके हैं या फिर आत्मसमर्पण कर चुके हैं। सरकार की सख्त रणनीति और सुरक्षाबलों की सतर्कता ने नक्सलवाद को काफी हद तक खत्म कर दिया है। देश अब तेजी से नक्सल मुक्त भारत की ओर बढ़ रहा है।
इसी बीच, हमें उन वीर जवानों के बलिदान को कभी नहीं भूलना चाहिए। ताड़मेटला की घटना को कवर करने वाले एक पत्रकार ने उस दिन की भयावहता को याद करते हुए कहा था कि 76 जवानों के शव देखकर उनके हाथ-पैर कांपने लगे और कैमरा निकालने की हिम्मत तक नहीं हुई। यह बयान उस दर्द और त्रासदी को साफ दिखाता है, जिसे देश ने उस दिन महसूस किया।
आज हम उन सभी वीरों को श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं, जिन्होंने देश की सुरक्षा के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए। उनका साहस और बलिदान हर भारतीय को प्रेरणा देता है। उनके परिवारों का दुख हम समझते हैं और उनके प्रति सम्मान व्यक्त करते हैं।
अंत में, ताड़मेटला हमला हमें एक स्पष्ट संदेश देता है। नक्सलवाद की हिंसक विचारधारा समाज के लिए खतरा है और इसे जड़ से खत्म करना जरूरी है। हमें अपने वीर जवानों के बलिदान को याद रखते हुए इस लड़ाई को जारी रखना होगा। तभी हम एक सुरक्षित और मजबूत भारत का निर्माण कर पाएंगे।
लेख
शोमेन चंद्र