छत्तीसगढ़ में 'धर्म स्वातंत्र्य कानून' लागू, अवैध धर्मांतरण पर सख्ती का नया दौर शुरू

अवैध धर्मांतरण पर कड़ा शिकंजा, सामूहिक धर्म बदलवाने पर आजीवन सजा का प्रावधान, प्रलोभन और दबाव से जुड़े मामलों में अब सख्त कार्रवाई होगी।

The Narrative World    08-Apr-2026   
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छत्तीसगढ़ में धर्मांतरण को लेकर लंबे समय से चल रही बहस अब एक ठोस कानूनी ढांचे में बदल गई है। 7 अप्रैल 2026 को राज्यपाल रमेन डेका ने छत्तीसगढ़ धर्म स्वातंत्र्य (संशोधन) विधेयक, 2026 पर हस्ताक्षर कर दिए। इसके साथ ही यह विधेयक कानून बन गया और पूरे राज्य में लागू हो गया। राज्य सरकार ने इस कानून के जरिए स्पष्ट संदेश दिया है कि अब धर्मांतरण केवल व्यक्तिगत निर्णय का विषय नहीं रहेगा, बल्कि इसे एक नियामित और पारदर्शी प्रक्रिया के तहत देखा जाएगा।
 
इस कानून के लागू होते ही धर्मांतरण से पहले जिला मजिस्ट्रेट के पास आवेदन देना अनिवार्य हो गया है। प्रशासन आवेदन की जानकारी वेबसाइट, ग्राम पंचायत और संबंधित थाने में सार्वजनिक करेगा। इसके बाद 30 दिनों के भीतर दावा-आपत्ति और जांच की प्रक्रिया पूरी की जाएगी। गवाहों से पूछताछ, शपथ पत्र और अन्य साक्ष्यों के आधार पर ही आवेदन को वैध माना जाएगा। यदि निर्धारित तिथि से 90 दिनों के भीतर धर्मांतरण नहीं होता है तो पूरी प्रक्रिया स्वतः समाप्त हो जाएगी।
 
राज्य सरकार ने इस कानून में अवैध सामूहिक धर्मांतरण को गंभीर अपराध की श्रेणी में रखा है। यदि दो या अधिक व्यक्तियों का अवैध रूप से धर्मांतरण कराया जाता है, तो दोषियों को आजीवन कारावास तक की सजा मिल सकती है। वहीं अंतरधार्मिक विवाह कराने वाले धर्मगुरुओं को भी अब विवाह से आठ दिन पहले सक्षम प्राधिकारी के समक्ष घोषणा पत्र देना अनिवार्य होगा।
 
दरअसल, इस कानून की आवश्यकता लंबे समय से महसूस की जा रही थी। छत्तीसगढ़ के कई जिलों में पिछले कुछ वर्षों के दौरान धर्मांतरण को लेकर विवाद सामने आए। नारायणपुर, कोंडागांव, कांकेर जैसे जनजातीय क्षेत्रों से लेकर दुर्ग, भिलाई और रायपुर जैसे शहरों तक सामाजिक तनाव और टकराव की घटनाएं सामने आईं। कई मामलों में आरोप लगे कि धर्मांतरण स्वेच्छा से नहीं बल्कि प्रलोभन, दबाव या सुनियोजित प्रयासों के जरिए कराया गया।
 
ऐसी परिस्थितियों में राज्य के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि स्पष्ट कानून के अभाव में कार्रवाई कैसे की जाए। 1968 का पुराना कानून समय के साथ कमजोर साबित हुआ और अधिकतर मामलों में प्रशासन केवल विवाद होने के बाद ही हस्तक्षेप कर पाता था। इसी कमी को दूर करने के लिए यह नया कानून लाया गया।
 
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मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने पहले ही घोषणा कर दी थी कि जबरन धर्मांतरण रोकने के लिए सरकार कड़ा कदम उठाएगी। उसी दिशा में यह कानून एक निर्णायक पहल के रूप में सामने आया। वहीं 19 मार्च को विधानसभा में गृहमंत्री विजय शर्मा ने यह विधेयक पेश किया था, जिसे ध्वनिमत से पारित किया गया।
 
इस कानून की सबसे बड़ी खासियत इसकी स्पष्टता और संरचना है। इसमें "धर्मांतरण", "प्रलोभन", "बल" और "अवैध धर्मांतरण" जैसी अवधारणाओं को साफ-साफ परिभाषित किया गया है। इससे पहले इन शब्दों को लेकर भ्रम बना रहता था, जिसके कारण कई मामलों में विवाद बढ़ जाते थे। अब प्रशासन के पास एक स्पष्ट कानूनी आधार होगा, जिसके तहत वह जांच और कार्रवाई कर सकेगा।
 
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इसके अलावा यह कानून केवल दंडात्मक नहीं है, बल्कि यह प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने पर भी जोर देता है। पहले जहां धर्मांतरण के मामलों में केवल आरोप-प्रत्यारोप चलते थे, अब हर कदम का दस्तावेजीकरण होगा। इससे न केवल विवाद कम होंगे बल्कि यह भी सुनिश्चित होगा कि कोई भी धर्म परिवर्तन वास्तव में स्वैच्छिक है।
 
अंतरधार्मिक विवाह को लेकर भी यह कानून महत्वपूर्ण बदलाव लाता है। कई मामलों में आरोप लगे कि विवाह को धर्म परिवर्तन का माध्यम बनाया गया। अब ऐसे मामलों में पूर्व सूचना और निगरानी की व्यवस्था से पारदर्शिता बढ़ेगी और विवादों पर अंकुश लगेगा।
 
 
संवैधानिक दृष्टि से भी यह कानून महत्वपूर्ण माना जा रहा है। भारतीय संविधान धार्मिक स्वतंत्रता देता है, लेकिन यह स्वतंत्रता सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य के अधीन है। ऐसे में यदि कोई गतिविधि सामाजिक असंतुलन पैदा करती है, तो राज्य को हस्तक्षेप करने का अधिकार मिलता है। यह कानून उसी संवैधानिक दायरे में रहकर बनाया गया है।
 
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जनजातीय क्षेत्रों के संदर्भ में इस कानून का महत्व और बढ़ जाता है। इन क्षेत्रों में सामाजिक जीवन सामुदायिक आधार पर चलता है। ऐसे में किसी एक व्यक्ति का धर्म परिवर्तन पूरे समुदाय को प्रभावित कर सकता है। कई बार इससे सामाजिक विभाजन और तनाव की स्थिति भी बनती है। इसलिए राज्य ने इस कानून के जरिए इन क्षेत्रों की सामाजिक संरचना को सुरक्षित रखने की कोशिश की है।
 
 
इसके साथ ही प्रशासनिक स्तर पर भी अब स्पष्टता आएगी। पहले अधिकारियों के पास सीमित विकल्प होते थे, जिससे कार्रवाई में देरी या भ्रम की स्थिति बनती थी। अब एक तय प्रक्रिया के तहत हर शिकायत की जांच होगी और निर्णय लिया जाएगा। इससे प्रशासनिक दक्षता और पारदर्शिता दोनों बढ़ेंगी।
समग्र रूप से देखें तो छत्तीसगढ़ धर्म स्वातंत्र्य कानून राज्य में सामाजिक संतुलन और पारदर्शिता को मजबूत करने वाला एक ठोस कदम बनकर सामने आया है। यह कानून साफ संकेत देता है कि आस्था का निर्णय पूरी तरह स्वतंत्र और निष्पक्ष होना चाहिए।
 
इसके लागू होने से अब धर्मांतरण से जुड़े मामलों में स्पष्टता आएगी और पहले जैसी अनिश्चित स्थिति नहीं बनेगी। साथ ही, यह व्यवस्था लोगों के बीच विश्वास को मजबूत करेगी और राज्य में स्थिर माहौल बनाए रखने में अहम भूमिका निभाएगी।