पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के बड़े पैमाने पर संशोधन के बाद सियासी घमासान तेज हो गया है। चुनाव आयोग ने जब लाखों नाम हटाए, तो तुरंत इसे धार्मिक रंग देने की कोशिश शुरू हो गई। लेकिन जब हम पूरे आंकड़ों और घटनाओं को ध्यान से देखते हैं, तो तस्वीर बिल्कुल अलग नजर आती है। यहां मुद्दा किसी धर्म का नहीं, बल्कि फर्जी वोटर और अवैध घुसपैठ का है।
चुनाव आयोग ने 7 अप्रैल को जारी आंकड़ों में बताया कि अंतिम जांच के दौरान 27,16,393 मतदाता अयोग्य पाए गए। इससे पहले दिसंबर में जारी ड्राफ्ट सूची में 58.25 लाख नाम हटाए गए थे। ये वे लोग थे जो मृत थे, स्थानांतरित हो चुके थे या जिनके नाम दोहराए गए थे। इसके बाद 28 फरवरी को 5 लाख और नाम हटे। इस तरह कुल हटाए गए नामों की संख्या करीब 91 लाख तक पहुंच गई।
सबसे ज्यादा असर मुर्शिदाबाद जिले में दिखा, जहां 11 लाख संदिग्ध मतदाताओं में से 4.55 लाख अयोग्य पाए गए। यह जिला बांग्लादेश सीमा से लगा हुआ है, इसलिए यहां अवैध घुसपैठ का असर लंबे समय से चर्चा में रहा है। इसके उलट झारग्राम में केवल 1240 नाम हटे। कोलकाता उत्तर में 39,164 और कोलकाता दक्षिण में 28,468 नाम हटे।
जैसे ही ये आंकड़े सामने आए, तृणमूल कांग्रेस (TMC) और कुछ मीडिया संस्थानों ने इसे मुस्लिम मतदाताओं को निशाना बनाने का मामला बताना शुरू कर दिया। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने नदिया की रैली में आरोप लगाया कि मतुआ, राजबंशी और अल्पसंख्यकों को जानबूझकर बाहर किया जा रहा है। उन्होंने इसे राजनीतिक साजिश करार दिया।
कुछ मीडिया रिपोर्टों ने भी इसी दिशा में माहौल बनाया। एक रिपोर्ट में दावा किया गया कि नंदीग्राम में हटाए गए 95 प्रतिशत नाम मुस्लिमों के हैं। इस तरह की खबरों ने यह साबित करने की कोशिश की कि पूरी प्रक्रिया एकतरफा है और खास समुदाय को निशाना बनाया जा रहा है।
लेकिन जब हम पूरी तस्वीर देखते हैं, तो यह दावा अधूरा साबित होता है। असल में हजारों हिंदू मतदाताओं के नाम भी हटाए गए हैं। खास तौर पर मतुआ-नामशूद्र समुदाय को बड़ा झटका लगा है। बोंगांव लोकसभा क्षेत्र में, जहां भाजपा के शंतनु ठाकुर सांसद हैं, वहां सबसे ज्यादा नाम हटे हैं।
मतुआ बहुल पांच विधानसभा क्षेत्रों में करीब 1.38 लाख नाम हटे। चांदपाड़ा ग्राम पंचायत में तो 186 में से 183 नाम एक ही सूची में हट गए, जिनमें ज्यादातर मतुआ समुदाय के थे। यही नहीं, बगदा, बोंगांव उत्तर और गैघाटा जैसे भाजपा के मजबूत क्षेत्रों में भी हजारों मतदाता सूची से बाहर हुए।
इसका मुख्य कारण यह रहा कि कई लोग 2002 की मतदाता सूची से अपना सीधा संबंध साबित नहीं कर पाए। कई क्षेत्रों में हटाने की दर 7 से 15 प्रतिशत तक पहुंच गई, जो राज्य औसत से काफी ज्यादा है।
अब सवाल उठता है कि आखिर इतनी बड़ी संख्या में नाम क्यों हटे? इसका जवाब बंगाल की भौगोलिक और सामाजिक स्थिति में छिपा है। भारत और बांग्लादेश के बीच 4095 किलोमीटर लंबी सीमा है, जिसमें से 2216 किलोमीटर सीमा पश्चिम बंगाल से लगती है। दोनों तरफ के लोगों की भाषा और संस्कृति काफी हद तक समान है, जिससे घुसपैठ को पहचानना मुश्किल हो जाता है।
बंगाल के दस जिले सीधे बांग्लादेश से जुड़े हैं, जिनमें उत्तर 24 परगना, नदिया, मुर्शिदाबाद और मालदा प्रमुख हैं। लंबे समय से यह आरोप लगता रहा है कि बड़ी संख्या में बांग्लादेशी नागरिक फर्जी दस्तावेज बनाकर यहां बस गए और मतदाता सूची में शामिल हो गए।
पिछले तीन वर्षों में ही 2600 से अधिक बांग्लादेशी नागरिकों को पकड़ा गया और वापस भेजा गया। ऐसे में अगर चुनाव आयोग फर्जी और अवैध नामों को हटाने का अभियान चलाता है, तो सबसे ज्यादा असर उसी राज्य में दिखेगा जहां घुसपैठ सबसे ज्यादा है।
यहां एक और महत्वपूर्ण पहलू सामने आया है। जैसे ही चुनाव आयोग ने घर-घर जाकर सत्यापन की प्रक्रिया शुरू की, सीमावर्ती इलाकों में हलचल बढ़ गई। कई वीडियो सामने आए, जिनमें लोग बैग लेकर बांग्लादेश की ओर जाते दिखे। ये लोग सालों से भारत में रह रहे थे, लेकिन उनके पास कोई वैध दस्तावेज नहीं थे।
कुछ लोगों ने कैमरे पर खुद स्वीकार किया कि वे 5 से 10 साल से भारत में रह रहे थे और अब जांच के डर से वापस जा रहे हैं। कोई टैक्सी चला रहा था, तो कोई ईंट भट्ठों में काम कर रहा था। इन लोगों ने फर्जी पहचान पत्र बनाकर स्थानीय समाज में खुद को शामिल कर लिया था।
यह स्थिति साफ दिखाती है कि समस्या कितनी गंभीर है। जब सख्त जांच शुरू हुई, तो अवैध रूप से रह रहे लोग खुद ही भागने लगे। इससे यह भी साबित होता है कि मतदाता सूची में लंबे समय से गड़बड़ी मौजूद थी।
ऐसे में पूरे मुद्दे को केवल "मुस्लिम नाम हटाए जा रहे हैं" कहकर पेश करना वास्तविकता से ध्यान हटाने जैसा है। अगर कोई व्यक्ति, चाहे वह किसी भी धर्म का हो, अपनी नागरिकता और निवास का प्रमाण नहीं दे पाता, तो उसका नाम मतदाता सूची में नहीं रह सकता।
लोकतंत्र की मजबूती के लिए जरूरी है कि केवल वैध नागरिक ही वोट करें। अगर फर्जी नामों को हटाने की प्रक्रिया चलती है, तो यह एक जरूरी कदम है, भले ही इससे कुछ लोगों को असुविधा क्यों न हो।
अंत में यह स्पष्ट है कि पश्चिम बंगाल की मतदाता सूची में सुधार की यह प्रक्रिया किसी धर्म के खिलाफ नहीं है। यह एक प्रशासनिक कार्रवाई है, जिसका उद्देश्य व्यवस्था को साफ करना है। राजनीतिक दल इसे अपने फायदे के लिए अलग रंग देने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन सच्चाई यह है कि कानून सबके लिए समान है।
अगर कोई नागरिक सही दस्तावेज देता है, तो उसका नाम सुरक्षित रहता है। लेकिन जो लोग फर्जी तरीके से सूची में शामिल हुए, उनके लिए अब जगह नहीं बची है। यही इस पूरे अभियान का असली संदेश है।