
भारत में “संत” शब्द केवल किसी धार्मिक व्यक्ति की उपाधि नहीं है। यह भारतीय सभ्यता की स्मृति में गहराई तक बैठा हुआ एक भाव है। इस शब्द के साथ त्याग, करुणा, सहिष्णुता और आत्मबोध की छवियाँ जुड़ी हुई हैं। भारतीय समाज जब किसी को संत कहता है तो उसके सामने कबीर, गुरु नानक, तुकाराम, रविदास, मीराबाई, चैतन्य महाप्रभु या तिरुवल्लुवर जैसे व्यक्तित्व उभरते हैं। ऐसे लोग जिन्होंने सत्ता से दूरी बनाकर समाज की आत्मा से संवाद किया। जिन्होंने मनुष्य को भीतर से मुक्त करने की बात की। भारतीय परंपरा में संत वह है जो मनुष्य को उसके भीतर की चेतना तक पहुँचने का मार्ग दिखाता है, न कि किसी एक संगठित सत्ता के अधीन कर देने का अभियान चलाता है।
लेकिन इतिहास में शब्द अक्सर एक जैसे दिखते हैं, जबकि उनके अर्थ बिल्कुल अलग होते हैं। यूरोप के कैथोलिक चर्च में “Saint” की अवधारणा भारतीय संत परंपरा से पूरी तरह भिन्न थी। वहाँ किसी व्यक्ति को “Saint” घोषित किया जाना केवल आध्यात्मिक साधना का सम्मान नहीं था। यह चर्च के प्रति उसकी निष्ठा, उसके विस्तार के लिए किए गए कार्यों और “अविश्वासियों” को चर्च के अधीन लाने में उसकी भूमिका का भी सम्मान था। यूरोप के मध्यकालीन इतिहास में ऐसे अनेक व्यक्तियों को संत घोषित किया गया जिन्होंने साम्राज्यों के साथ मिलकर चर्च विस्तार की परियोजनाओं में भाग लिया। चर्च के लिए काम करना, उसके प्रभाव का विस्तार करना और गैर-ईसाई समाजों को “सच्चे धर्म” में लाने का प्रयास करना भी saintliness का हिस्सा माना जाता था।

भारत में फ्रांसिस ज़ेवियर का नाम लंबे समय तक इसी भ्रम के भीतर प्रतिष्ठित किया गया। स्कूलों, कॉलेजों और चर्च संस्थानों ने उसके नाम को शिक्षा, आधुनिकता और सेवा के प्रतीक के रूप में स्थापित किया। “सेंट ज़ेवियर्स” नाम सुनते ही भारत का एक बड़ा शिक्षित वर्ग प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थानों की छवि के बारे में सोचता है। गोवा में बॉम जीसस बेसिलिका में रखे उसके शव को आज भी श्रद्धा के साथ देखा जाता है। चर्च साहित्य उसे “Apostle of the Indies” और “Patron Saint of the East” कहकर प्रस्तुत करता है। लेकिन इतिहास केवल संस्थागत श्रद्धा से नहीं समझा जा सकता। इतिहास का प्रश्न यह है कि वह व्यक्ति वास्तव में किस भूमिका में था और उसकी गतिविधियों का प्रभाव किन समाजों पर पड़ा।
फ्रांसिस ज़ेवियर को समझना केवल एक मिशनरी की जीवनी पढ़ना नहीं है। उसे समझना उस समय को समझना है जब यूरोपीय साम्राज्यवाद और चर्च विस्तार एक-दूसरे में विलीन हो चुके थे। यह वह युग था जब समुद्र केवल व्यापार का मार्ग नहीं रहे थे। वे साम्राज्य, धर्म और सभ्यतागत हस्तक्षेप के नए रास्ते बन चुके थे। यूरोप अपने इतिहास के एक निर्णायक मोड़ से गुजर रहा था। स्पेन और पुर्तगाल जैसे कैथोलिक राष्ट्र समुद्री शक्ति के सहारे एशिया और अफ्रीका तक पहुँच रहे थे। लेकिन उनके जहाज़ केवल व्यापारिक वस्तुएँ नहीं लेकर चलते थे। वे अपने साथ एक धार्मिक दृष्टि भी लेकर चलते थे, ऐसी दृष्टि जो संसार को दो हिस्सों में बाँटकर देखती थी: ईसाई और गैर-ईसाई।

15वीं और 16वीं शताब्दी का यूरोप केवल खोज और व्यापार का यूरोप नहीं था। वह धार्मिक संघर्षों से भरा हुआ यूरोप था। कैथोलिक चर्च स्वयं को सम्पूर्ण सत्य का एकमात्र संरक्षक मानता था। उसके लिए गैर-ईसाई समाज केवल “दूसरी संस्कृतियाँ” नहीं थे, बल्कि वे ऐसे लोग थे जिन्हें इसाइयत के “सच्चे धर्म” में लाना आवश्यक समझा जाता था। इसी मानसिकता ने “mission” को जन्म दिया। चर्च के लिए मिशन केवल धार्मिक संवाद नहीं था। वह आत्माओं को “बचाने” का अभियान था। और जहाँ persuasion पर्याप्त न हो, वहाँ सत्ता और कानून का सहारा लेना भी अनुचित नहीं माना जाता था।
भारत उस समय विश्व की सबसे समृद्ध सभ्यताओं में से एक था। यहाँ विकसित नगर थे, समुद्री व्यापार था, विशाल मंदिर संरचनाएँ थीं, दार्शनिक परंपराएँ थीं और विविधता थी। लेकिन चर्च की दृष्टि में यह सब “सत्य” नहीं था। यूरोपीय मिशनरी साहित्य में हिंदू समाज को अक्सर “idolatrous” अर्थात मूर्तिपूजक समाज कहा गया। यह शब्द केवल धार्मिक असहमति का शब्द नहीं था। इसके भीतर एक वैचारिक श्रेष्ठता छिपी हुई थी। चर्च यह मानता था कि गैर-ईसाई समाजों की धार्मिक परंपराएँ “भ्रम” हैं और उन्हें “सत्य” तक पहुँचाना चर्च का दायित्व है।
फ्रांसिस ज़ेवियर इसी मानसिकता का प्रतिनिधि बनकर भारत आया। उसका जन्म वर्ष 1505 में स्पेन के Navarre क्षेत्र में हुआ था। उसका परिवार सामाजिक और राजनीतिक रूप से प्रतिष्ठित था। उसके पिता Juan de Jassu, Arragon के राजा की सेवा में थे। युवा ज़ेवियर उच्च शिक्षा के लिए पेरिस गया, जहाँ उसकी मुलाकात Ignatius Loyola से हुई। यही वह क्षण था जिसने उसके जीवन की दिशा तय कर दी।

Ignatius Loyola स्वयं सैनिक पृष्ठभूमि से आया हुआ व्यक्ति था। उसने चर्च के लिए एक नए प्रकार के संगठन की कल्पना की थी। यह संगठन पारंपरिक मठवासी जीवन से अलग था। उसका उद्देश्य केवल प्रार्थना नहीं था। उसका उद्देश्य था कि चर्च की शक्ति का विस्तार किया जा सके। इसी विचार से Society of Jesus की स्थापना हुई, जिसे आगे चलकर Jesuits कहा गया। Jesuits को चर्च की “spiritual army” कहा जाता है। उनके भीतर सैनिक अनुशासन विकसित किया जाता था। पूर्ण आज्ञाकारिता, संगठन के प्रति समर्पण और चर्च के आदेश को सर्वोच्च मानना उनके प्रशिक्षण का हिस्सा था।
Jesuits का उदय उसी समय हुआ जब यूरोप Protestant Reformation से हिल चुका था। मार्टिन लूथर और अन्य सुधारकों ने चर्च की सत्ता और भ्रष्टाचार को चुनौती दी थी। ऐसे में चर्च को एक ऐसे संगठन की आवश्यकता थी जो केवल धार्मिक उपदेश न दे, बल्कि पूरी दुनिया में कैथोलिक प्रभाव को पुनर्स्थापित करे। Jesuits इसी आवश्यकता का उत्तर था। वे शिक्षा संस्थान स्थापित करते थे, राजाओं के दरबारों तक पहुँचते थे, मिशनरी नेटवर्क बनाते थे और दुनिया के दूरस्थ हिस्सों में जाकर चर्च विस्तार का कार्य करते थे। फ्रांसिस ज़ेवियर इस संगठन के शुरुआती और सबसे सक्रिय सदस्यों में से एक था।

पुर्तगाल का राजा Joao III पूर्व में चर्च समर्थित साम्राज्य स्थापित करना चाहता था। भारत उसके लिए केवल मसालों और व्यापार का केंद्र नहीं था। यह चर्च विस्तार का प्रवेश द्वार था। पुर्तगाली जहाज जहाँ जाते, वहाँ चर्च भी पहुँचता। बंदरगाहों के साथ चर्च बनते। व्यापारिक चौकियों के साथ मिशनरी केंद्र स्थापित किए जाते। साम्राज्य और चर्च के बीच यह संबंध केवल सहयोग का नहीं था। दोनों एक ही परियोजना के दो हिस्से थे। साम्राज्य भूभागों पर अधिकार स्थापित करता था और चर्च आत्माओं पर।
वर्ष 1542 में फ्रांसिस ज़ेवियर गोवा पहुँचा। तब तक गोवा पुर्तगाली सत्ता का प्रमुख केंद्र बन चुका था। 1510 में Albuquerque द्वारा गोवा पर कब्ज़ा करने के बाद पुर्तगाल उसे एशिया में अपने साम्राज्य की राजधानी की तरह विकसित कर रहा था। गोवा केवल व्यापारिक केंद्र नहीं था। वह चर्च विस्तार का मुख्य आधार बनने जा रहा था।

ज़ेवियर का स्वागत किसी सामान्य पादरी की तरह नहीं हुआ। उसे विशेष अधिकार दिए गए। उसे “Royal Inspector of Missions” बनाया गया। उसे सीधे पुर्तगाल के राजा से संपर्क का अधिकार मिला। पोप ने उसे Apostolic Nuncio का दर्जा दिया। यह दिखाता है कि वह केवल धर्मोपदेशक नहीं था; वह चर्च और साम्राज्य दोनों का प्रतिनिधि था।
गोवा पहुँचने के बाद उसने जल्दी ही यह समझ लिया कि केवल विदेशी पादरियों के सहारे मिशन लंबे समय तक नहीं चल सकता। उसे स्थानीय ढाँचे की आवश्यकता थी। इसी सोच के तहत उसने College of St. Paul की स्थापना की। चर्च इतिहासकार इसे उसकी दूरदर्शिता बताते हैं, लेकिन इसके पीछे एक स्पष्ट रणनीति थी। भारतीय समाज के भीतर से ऐसे लोगों को तैयार करना जो चर्च के विस्तार के लिए कार्य करें। यह केवल शिक्षा संस्थान नहीं था। यह वैचारिक पुनर्गठन का केंद्र था। स्थानीय लोगों को प्रशिक्षित कर ईसाई मिशनरी का "टूल" बनाया जा रहा था ताकि चर्च भारतीय समाज के भीतर स्थायी जड़ें जमा सके।

लेकिन गोवा केवल शुरुआत थी। ज़ेवियर की दृष्टि जल्द ही दक्षिण भारत के समुद्री तटों की ओर गई। विशेषकर उन क्षेत्रों की ओर जहाँ पुर्तगाली शक्ति पहुँच चुकी थी। Coromandel Coast के Parava मछुआरे उसके मिशन का महत्वपूर्ण हिस्सा बने। अरब समुद्री व्यापारियों और लुटेरों के दबाव में जी रहे इन समुदायों को पुर्तगालियों ने सुरक्षा देने का प्रस्ताव दिया। बदले में उनसे बपतिस्मा स्वीकार करने को कहा गया। इतिहास में इसे कन्वर्ज़न कहा जाता है, लेकिन यह केवल धार्मिक निर्णय नहीं था, यह भय और सुरक्षा के बीच का एक विशाल ढाँचा था।
फ्रांसिस ज़ेवियर ने इन क्षेत्रों में केवल धर्मोपदेश नहीं दिया। उसने यह सुनिश्चित करने का प्रयास किया कि नए कन्वर्ट्स अपनी पुरानी धार्मिक परंपराओं से पूरी तरह अलग हो जाएँ। उसके पत्रों और चर्च रिकॉर्ड्स में हिंदू देवताओं और मंदिरों के लिए “false gods” और “idols” जैसे शब्द बार-बार दिखाई देते हैं। यह केवल धार्मिक मतभेद की भाषा नहीं थी। यह उस मानसिकता की भाषा थी जो दूसरे समाज की आस्था को वैध नहीं मानती थी।

यही कारण है कि आगे चलकर उसके द्वारा मंदिरों के विरुद्ध अभियान दिखाई देने लगते हैं। चर्च साहित्य स्वयं इस बात का उल्लेख करता है कि नए कन्वर्ट्स को पुराने “idols” तोड़ने के लिए प्रेरित किया गया। यह केवल धार्मिक परिवर्तन नहीं था। यह सांस्कृतिक स्मृति को तोड़ने का प्रयास था। जब किसी समाज को उसकी परंपराओं, प्रतीकों और धार्मिक संरचनाओं से अलग किया जाता है, तो केवल उसकी पूजा पद्धति नहीं बदलती; उसकी सभ्यतागत निरंतरता भी प्रभावित होती है।
ज़ेवियर के पत्रों में यह स्पष्ट दिखाई देता है कि वह राज्य शक्ति को चर्च विस्तार का आवश्यक साधन मानता था। उसने पुर्तगाल के राजा को लिखा कि अधिकारियों को कन्वर्ज़न बढ़ाने के लिए बाध्य किया जाए और जो ऐसा न करें उन्हें दंडित किया जाए। यह दिखाता है कि उसके लिए चर्च और सत्ता अलग-अलग नहीं थे। साम्राज्य की शक्ति चर्च विस्तार का उपकरण थी। यही मानसिकता आगे चलकर Goa Inquisition जैसी संस्थाओं में दिखाई देती है।

भारत में फ्रांसिस ज़ेवियर की कहानी इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि वह केवल एक व्यक्ति की कहानी नहीं है। वह उस ऐतिहासिक प्रक्रिया का प्रतीक है जिसमें समुद्री साम्राज्यवाद और मिशनरी विस्तार साथ-साथ आगे बढ़े। पुर्तगाली जहाज़ बंदरगाहों पर नियंत्रण स्थापित कर रहे थे और चर्च स्थानीय समाजों की आत्मा पर। व्यापार, सत्ता, कानून और धर्म एक-दूसरे से जुड़े हुए थे।
भारत ने पहले भी विदेशी आक्रमण देखे थे। लेकिन यूरोपीय चर्च-साम्राज्य मॉडल अलग था। यहाँ केवल राजनीतिक अधिकार स्थापित करना पर्याप्त नहीं था। यहाँ समाज की धार्मिक संरचना को बदलना भी लक्ष्य था। यही कारण है कि फ्रांसिस ज़ेवियर को केवल “संत” कहकर समझना इतिहास को अधूरा पढ़ना है। वह एक ऐसे युग का प्रतिनिधि था जिसमें क्रॉस और साम्राज्य साथ-साथ चल रहे थे। चर्च आत्माओं को जीतना चाहता था और साम्राज्य भूभागों को। लेकिन दोनों की दिशा एक ही थी।

गोवा के तट पर 1542 में उतरा वह मिशन आगे चलकर केवल चर्च निर्माण तक सीमित नहीं रहा। आने वाले वर्षों में यह कन्वर्ज़न, मंदिर विध्वंस, धार्मिक नियंत्रण और इंक्विज़िशन जैसी संस्थाओं की ओर बढ़ा। भारत के पश्चिमी और दक्षिणी तटों पर शुरू हुआ यह अभियान धीरे-धीरे एक ऐसी संरचना में बदला जिसमें चर्च, कानून और सत्ता एक-दूसरे के पूरक बन गए।
फ्रांसिस ज़ेवियर केवल एक व्यक्ति नहीं था। वह एक प्रतीक था, क्रॉस और साम्राज्य के गठबंधन का प्रतीक।
संदर्भ
* Sita Ram Goel, Francis Xavier SJ – The Man And His Mission
* Joseph Wicki, Documenta Indica, Vol. I
* History of Christianity in India, Vol. I
* C.R. Boxer, writings on Portuguese expansion in Asia