भारत का आंतरिक सुदृढ़ीकरण: भू-राजनीतिक परिपक्वता की ओर एक कदम

नक्सल प्रभाव के क्षरण ने भारत को केवल आंतरिक सुरक्षा में नहीं, बल्कि संसाधन नियंत्रण, सीमाई रणनीति और वैश्विक विश्वसनीयता में भी मजबूत किया है।

The Narrative World    12-May-2026
Total Views |
Representative Image
 
2000 के दशक में अपने चरम पर, नक्सल–माओवादी विद्रोह उत्तर में नेपाल सीमा से लेकर दंडकारण्य के जंगलों और आगे आंध्र प्रदेश के तटीय क्षेत्रों तक "रेड कॉरिडोर" के रूप में फैल गया था। लंबे समय तक यह "रेड कॉरिडोर" खनिज-संपन्न लेकिन अविकसित जिलों का प्रतीक रहा, जो माओवादी हिंसा से ग्रस्त थे। इससे एक ऐसे राष्ट्र की छवि उभरती थी जो अपनी संप्रभुता को पूरी तरह स्थापित करने के लिए संघर्ष कर रहा हो।
 
माओवादियों ने खुले तौर पर "तिरुपति से पशुपति" तक अपने प्रभाव की बात की, जिसके पीछे भारत और नेपाल के माओवादी क्षेत्रों को जोड़कर पूरे उपमहाद्वीप में एक सतत संघर्ष क्षेत्र बनाने की महत्वाकांक्षा थी। इस योजना का केंद्र पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी (PLGA) थी, जो CPI (माओवादी) की सशस्त्र शाखा थी और चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) के तर्ज पर बनाई गई थी। आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़ और ओडिशा का त्रि-जंक्शन, दंडकारण्य के जंगल और दक्षिण गढ़चिरौली इसके सबसे मजबूत गढ़ माने जाते थे।
 
Representative Image
 
CPI (माओवादी), जो PLGA का संचालन करती थी, ने अपनी वैचारिक और सैन्य प्रेरणा माओ के सिद्धांतों से ली। उसका लक्ष्य एक कृषक-आधारित सशस्त्र क्रांति के माध्यम से भारतीय राज्य को उखाड़ फेंकना था। कई बार इसके नेताओं ने माओवादी चीन को मार्गदर्शक बताया है। सुरक्षा विशेषज्ञों ने अक्सर इस आंदोलन को "चीनी प्रॉक्सी" के रूप में वर्णित किया है, खासकर तब जब माओवादी ठिकानों से चीनी हथियार और उपकरण बरामद होते थे।
 
इस पृष्ठभूमि में "पशुपति–तिरुपति परियोजना" का विघटन स्पष्ट भू-राजनीतिक महत्व रखता है। पहला, यह नेपाल और भारत के माओवादियों को जोड़ने वाले एक संभावित अंतर-हिमालयी क्रांतिकारी नेटवर्क को समाप्त करता है। दूसरा, यह चीन को — कम से कम धारणा के स्तर पर — भारत के भीतर किसी एकीकृत विद्रोह का लाभ उठाने की संभावना से वंचित करता है। तीसरा, यह संकेत देता है कि भारत उस लंबे दौर को समाप्त कर रहा है जब वामपंथी आंदोलनों ने वैचारिक दिशा के लिए मॉस्को या बीजिंग की ओर देखा।
 
Representative Image
 
किसी राष्ट्र की वैश्विक स्थिति उसके आंतरिक सुदृढ़ीकरण से गहराई से जुड़ी होती है। जो राज्य अपनी सीमाओं के भीतर नियंत्रण बनाए रखने में असफल रहता है, उसकी अंतरराष्ट्रीय साख कमजोर पड़ती है। 2022 से 2024 के बीच नक्सल प्रभाव घटने के साथ, भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (ITBP) ने चीन सीमा पर 29 नए चौकी स्थापित किए, जिससे उच्च-ऊंचाई वाले क्षेत्रों में सालभर उपस्थिति सुनिश्चित हुई — यह आंतरिक सुरक्षा दबाव कम होने का अप्रत्यक्ष परिणाम था।
 
यह बदलाव संसाधन-भू-राजनीति में भी दिखाई देता है। रेड कॉरिडोर भारत के सबसे समृद्ध खनिज क्षेत्रों — लौह अयस्क, कोयला, बॉक्साइट और यूरेनियम — पर स्थित है। विद्रोह ने निवेश, अवसंरचना और संसाधन दोहन को बाधित किया। जैसे-जैसे सुरक्षा स्थिति सुधरती है, ये संसाधन अधिक सुलभ होते जा रहे हैं। इससे भारत की विनिर्माण क्षमता मजबूत होती है, रक्षा उद्योग को बल मिलता है, और वैश्विक खनिज आपूर्ति श्रृंखलाओं में उसकी स्थिति सुदृढ़ होती है, विशेषकर अमेरिका-चीन तकनीकी प्रतिस्पर्धा के संदर्भ में।
 
इसके अलावा, भारत की वैश्विक छवि में भी महत्वपूर्ण बदलाव आया है। पहले, विदेशी विश्लेषक माओवादी विद्रोह जैसी आंतरिक समस्याओं को भारत की संरचनात्मक कमजोरी मानते थे। आज, ध्यान भारत की डिजिटल अवसंरचना, सेमीकंडक्टर पहल, बहुपक्षीय सुरक्षा में भूमिका और बढ़ते वैश्विक प्रभाव पर केंद्रित है।
 
Representative Image
 
भारत द्वारा अपनाया गया समग्र मॉडल — जिसमें सुरक्षा अभियान, विकास और पुनर्वास का संतुलित मिश्रण है — वैश्विक दक्षिण के अन्य देशों के लिए एक उदाहरण प्रस्तुत करता है। पेरू के शाइनिंग पाथ या कोलंबिया के FARC जैसे मामलों में जहां कठोर सैन्य दृष्टिकोण अपनाया गया, वहीं भारत ने 'लोन वर्राटू' (घर वापसी) और 'पूना मार्गेम' (नई राह) जैसे कार्यक्रमों के माध्यम से आत्मसमर्पण और पुनर्वास पर जोर दिया, जो लोकतांत्रिक व्यवस्था की संवेदनशीलता को दर्शाता है।
 
भारत के लगभग 10.4 करोड़ जनजाति नागरिकों के प्रति नीति भी भू-राजनीतिक महत्व रखती है। पहले 'सलवा जुडूम' जैसे अभियानों की व्यापक आलोचना हुई थी। अब 'नियद नेल्लानार' (आपका गांव, हमारा गांव) जैसी पहलें विकास, संवाद और जनजाति अधिकारों के सम्मान पर जोर देती हैं। इससे भारत की अंतरराष्ट्रीय छवि मजबूत होती है और आलोचनाओं को कम करने में मदद मिलती है।
 
 
अप्रैल 2026 में गृह मंत्रालय द्वारा यह घोषणा कि नक्सल-प्रभावित जिलों की संख्या शून्य हो गई है, सिर्फ एक प्रशासनिक उपलब्धि नहीं है। यह भारत की वैश्विक भूमिका, G20 नेतृत्व और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता की आकांक्षाओं के संदर्भ में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है। यह भारत की रणनीतिक धैर्य, लोकतांत्रिक मजबूती और प्रभावी शासन का प्रमाण है।
 
 
रेड कॉरिडोर का सिमटना एक बहुआयामी राज्य-नीति की सफलता है। यह विश्वास बहाली, अवसंरचना विकास और दृढ़ सुरक्षा नीति का परिणाम है। यह आंतरिक स्थिरता भारत को बहुध्रुवीय विश्व में अधिक सक्षम बनाती है और यह दर्शाती है कि वह जटिल आंतरिक चुनौतियों से पार पाकर वैश्विक स्तर पर प्रभावी भूमिका निभाने के लिए तैयार है।
 
लेख
प्रियांश पांडेय व अंकित जाखड़