
छत्तीसगढ़ और तेलंगाना सीमा से लगे कर्रेगुट्टा के दुर्गम पहाड़ अब केवल एक भौगोलिक क्षेत्र नहीं थे। भारतीय सुरक्षा एजेंसियों के लिए यह वह युद्धक्षेत्र बन चुके थे, जहां नक्सलियों ने वर्षों तक अपने सबसे बड़े सैन्य ढांचे को छिपाकर रखा। 5000 फीट ऊंची पहाड़ियों, गहरी खाइयों, प्राकृतिक गुफाओं और घने जंगलों के बीच तैयार इस नेटवर्क का खुलासा तब हुआ जब पिछले वर्ष सुरक्षा बलों ने यहां लंबा और जोखिम भरा ऑपरेशन शुरू किया।
जांच में सामने आया कि पूरे क्षेत्र में करीब 1500 आईईडी बिछाए गए थे और कई हिस्सों में हर 30 मीटर पर विस्फोटक लगाए गए थे। सुरक्षा एजेंसियों के अधिकारियों का कहना है कि यह केवल एक छिपने का ठिकाना नहीं था बल्कि नक्सलियों का संगठित “माउंटेन वारफेयर बेस” था, जहां से दक्षिण बस्तर से लेकर तेलंगाना तक हिंसक गतिविधियों का संचालन किया जाता था।

कर्रेगुट्टा का नाम लंबे समय से सुरक्षा एजेंसियों की निगरानी सूची में था, लेकिन इस क्षेत्र की वास्तविक भयावहता बीते वर्ष हुए ऑपरेशन के दौरान सामने आई। जंगलों के भीतर बने संकरे रास्तों, ऊंची चट्टानों और बारूदी सुरंगों ने इसे देश के सबसे खतरनाक एंटी नक्सल ऑपरेशन क्षेत्रों में बदल दिया। ऑपरेशन में शामिल अधिकारियों के अनुसार, यहां कदम रखना भी मौत को न्योता देने जैसा था। कई जगहों पर प्रेशर आईईडी लगाए गए थे, जबकि कुछ स्थानों पर कमांड वायर से नियंत्रित विस्फोटक छिपाए गए थे। इनका उद्देश्य केवल सुरक्षा बलों की गति रोकना नहीं बल्कि बड़े पैमाने पर जानहानि करना था।
मीडिया की विस्तृत रिपोर्टों ने इस पूरे नेटवर्क की कई परतें उजागर की हैं। रिपोर्टों के मुताबिक, कर्रेगुट्टा को माओवादी संगठन ने वर्षों में विकसित किया। पहाड़ी की प्राकृतिक संरचना को सैन्य सुरक्षा ढांचे में बदला गया। ऊंचाई के कारण यहां से कई किलोमीटर दूर तक गतिविधियों पर नजर रखी जा सकती थी। जंगलों की मोटी परत और गुफाओं का जाल हेलीकॉप्टर निगरानी और ड्रोन सर्विलांस को भी सीमित कर देता था। यही कारण था कि नक्सलियों का शीर्ष नेतृत्व लंबे समय तक इस क्षेत्र को सबसे सुरक्षित ठिकाना मानता रहा।

सुरक्षा एजेंसियों के अनुसार, इस पूरे क्षेत्र में नक्सलियों ने केवल अस्थायी कैंप नहीं बनाए थे बल्कि स्थायी सैन्य व्यवस्था तैयार की थी। यहां हथियारों का भंडारण, विस्फोटक निर्माण, ट्रेनिंग और रणनीतिक बैठकें आयोजित की जाती थीं। जांच में यह भी सामने आया कि कई रास्तों को जानबूझकर इस तरह डिजाइन किया गया था कि सुरक्षा बल एक निश्चित दिशा में आगे बढ़ें और फिर पहले से बिछाए गए आईईडी की चपेट में आ जाएं।
ऑपरेशन के दौरान सामने आई सबसे महत्वपूर्ण जानकारी पूर्व पीएलजीए कमांडर बारसे देवा के बयान से जुड़ी है। उसने खुलासा किया कि कर्रेगुट्टा को संगठन ने “अंतिम सुरक्षा घेरा” मानकर तैयार किया था। उसके अनुसार, पिछले वर्ष के ऑपरेशन के दौरान यदि सुरक्षा बल पहाड़ियों से पीछे नहीं हटते तो भारी संख्या में जवानों की मौत हो सकती थी। देवा ने बताया कि इलाके में इतने विस्फोटक लगाए गए थे कि पूरी पहाड़ी को एक विशाल बारूदी क्षेत्र में बदल दिया गया था।

ऑपरेशन में शामिल एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि कई बार जवानों को आगे बढ़ने से पहले हर कदम पर जमीन की मैन्युअल जांच करनी पड़ी। आधुनिक माइंस डिटेक्टर, डॉग स्क्वॉड और ड्रोन तकनीक के बावजूद इलाके की जटिलता इतनी अधिक थी कि कई स्थानों पर हाथों से मिट्टी हटाकर विस्फोटक खोजने पड़े। बारिश और चट्टानी ढलानों ने इस चुनौती को और कठिन बना दिया।
कर्रेगुट्टा ऑपरेशन लगभग तीन सप्ताह तक चला। इस दौरान सुरक्षा बलों ने जंगल के भीतर कई संदिग्ध ठिकानों को ध्वस्त किया। बड़ी संख्या में विस्फोटक निष्क्रिय किए गए और नक्सलियों की सप्लाई लाइन को नुकसान पहुंचाया गया। हालांकि सुरक्षा एजेंसियां अभी भी यह मान रही हैं कि पूरे क्षेत्र को पूरी तरह सुरक्षित घोषित करना जल्दबाजी होगी, क्योंकि कई इलाकों में अब भी सक्रिय आईईडी हो सकते हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि कर्रेगुट्टा केवल एक स्थानीय नक्सली बेस नहीं था बल्कि दंडकारण्य क्षेत्र में माओवादी रणनीति का केंद्रीय हिस्सा था। बस्तर, सुकमा, बीजापुर और तेलंगाना के जंगलों को जोड़ने वाला यह इलाका लंबे समय से नक्सलियों के लिए सुरक्षित गलियारे की तरह काम करता रहा। यहां से कैडर मूवमेंट, हथियारों की आवाजाही और कमांड संरचना संचालित होती थी। यही कारण है कि सुरक्षा एजेंसियों ने इस ऑपरेशन को पिछले कई वर्षों के सबसे महत्वपूर्ण अभियानों में माना था।
लेकिन कर्रेगुट्टा की कहानी केवल सैन्य रणनीति तक सीमित नहीं है। इसने एक बार फिर उस बहस को भी तेज कर दिया है जिसमें नक्सलवाद को “जनआंदोलन” या “जनजातीय प्रतिरोध” के रूप में पेश करने की कोशिश की जाती रही है। सुरक्षा अधिकारियों का कहना है कि 1500 आईईडी, बारूदी सुरंगों का जाल और पहाड़ियों को विस्फोटक क्षेत्र में बदल देना किसी लोकतांत्रिक आंदोलन की रणनीति नहीं हो सकती। यह प्रशिक्षित गुरिल्ला युद्ध और संगठित हिंसा का स्पष्ट उदाहरण है।

स्थानीय ग्रामीणों की गवाही भी इस भयावहता को सामने लाती है। कई गांव के लोगों ने बताया कि वर्षों तक वे कुछ रास्तों पर जाने से डरते थे। बच्चों को जंगल के भीतर खेलने से रोका जाता था क्योंकि किसी भी समय विस्फोट हो सकता था। ग्रामीणों के अनुसार, नक्सलियों ने इलाके में ऐसा माहौल बना दिया था जहां सामान्य जीवन भी भय के साये में चलता था।
कर्रेगुट्टा ऑपरेशन ने नक्सली संगठन को केवल सामरिक नहीं बल्कि मनोवैज्ञानिक नुकसान भी पहुंचाया था। जिन पहाड़ियों को माओवादी संगठन ने वर्षों तक “अभेद्य किला” बताया, वहां सुरक्षा बलों की लगातार मौजूदगी ने उनके आत्मविश्वास को झटका दिया है। कई खुफिया रिपोर्टों में संकेत मिले हैं कि ऑपरेशन के बाद नक्सली दस्ते छोटे समूहों में विभाजित होकर जंगलों के भीतर नई सुरक्षित जगहें खोजने की कोशिश कर रहे हैं।

हालांकि सुरक्षा एजेंसियां मानती हैं कि कर्रेगुट्टा जैसी पहाड़ियां केवल हथियारों से नहीं बल्कि वर्षों की तैयारी से सैन्य ठिकानों में बदली जाती हैं। यही कारण है कि अब सुरक्षा बल केवल ऑपरेशन पर नहीं बल्कि सड़क निर्माण, मोबाइल नेटवर्क, स्थानीय इंटेलिजेंस और प्रशासनिक पहुंच बढ़ाने पर भी जोर दे रहे हैं।
दरअसल, कर्रेगुट्टा की असली कहानी बारूद से ज्यादा उस सोच की कहानी है जिसने जंगलों को युद्धभूमि में बदल दिया। यहां पहाड़ियां केवल प्राकृतिक संरचनाएं नहीं थीं। उन्हें रणनीतिक ढाल बनाया गया। गुफाओं को बंकर में बदला गया। संकरी पगडंडियों को विस्फोटक गलियारों में बदल दिया गया। और पूरे इलाके को इस तरह तैयार किया गया कि बाहरी दुनिया के लिए यह लगभग अभेद्य दिखाई दे।
कर्रेगुट्टा की पहाड़ियों में दबे बारूद ने केवल जमीन नहीं हिलाई। उसने उस पूरे नैरेटिव को भी चुनौती दी है जिसमें नक्सली हिंसा को अक्सर वैचारिक रोमांच की तरह प्रस्तुत किया जाता था। यहां मिली सच्चाई कहीं अधिक कठोर है। यह एक संगठित सैन्य ढांचा था, जहां हर 30 मीटर पर मौत छिपाई गई थी।
और शायद यही कर्रेगुट्टा की सबसे बड़ी कहानी है। जंगल के भीतर खड़ी वह अदृश्य युद्ध मशीन, जिसे नक्सलियों ने वर्षों तक अजेय माना, अब धीरे धीरे उजागर हो रही है।