
नई दिल्ली ने बांग्लादेश में भारत के अगले उच्चायुक्त के रूप में वरिष्ठ राजनेता दिनेश त्रिवेदी को भेजने का फैसला करके भारतीय उपमहाद्वीप की राजनीति में एक स्पष्ट संदेश दे दिया है। यह केवल एक राजनयिक नियुक्ति नहीं है। इसे भारत की उस नई रणनीति के रूप में देखा जा रहा है, जिसमें अब पड़ोसी देशों के साथ संबंधों को केवल विदेश मंत्रालय और नौकरशाही तक सीमित रखने की बजाय सीधे राजनीतिक स्तर पर भी साधने की तैयारी दिखाई दे रही है।
दिल्ली के रणनीतिक गलियारों में लंबे समय से यह चर्चा चल रही थी कि बांग्लादेश में बदलते राजनीतिक समीकरणों के बीच भारत को अपनी पुरानी कार्यशैली बदलनी होगी। शेख हसीना के नेतृत्व वाली अवामी लीग के साथ भारत के मजबूत संबंध किसी से छिपे नहीं रहे, लेकिन पिछले दो वर्षों में ढाका की राजनीति में जो अस्थिरता उभरी, उसने नई दिल्ली को यह सोचने पर मजबूर किया कि यदि सत्ता समीकरण बदलते हैं तो भारत की स्थिति क्या होगी।

यही वह पृष्ठभूमि है, जिसमें दिनेश त्रिवेदी की नियुक्ति को देखा जा रहा है। विदेश सेवा के किसी शीर्ष अधिकारी की जगह एक राजनीतिक चेहरे को ढाका भेजना इस बात का संकेत माना जा रहा है कि भारत अब बांग्लादेश में केवल सरकार से सरकार के रिश्ते नहीं, बल्कि पार्टी से पार्टी के स्तर पर भी संवाद मजबूत करना चाहता है।
दिल्ली की चिंता केवल राजनयिक नहीं है। इसके पीछे सुरक्षा, सीमा प्रबंधन, अवैध घुसपैठ, हिंदू अल्पसंख्यकों की स्थिति, चीन का बढ़ता प्रभाव और पूर्वोत्तर भारत की रणनीतिक स्थिरता जैसे कई मुद्दे जुड़े हुए हैं। बांग्लादेश भारत के लिए केवल एक पड़ोसी देश नहीं, बल्कि पूर्वी भारत की सुरक्षा और कनेक्टिविटी का सबसे महत्वपूर्ण भू-राजनीतिक केंद्र है।
इसीलिए इस नियुक्ति को भारतीय उपमहाद्वीप में भारत की “पॉलिटिकल डिप्लोमेसी” के नए चरण की शुरुआत माना जा रहा है।

दिलचस्प बात यह है कि भारत में इस तरह की राजनीतिक नियुक्तियां अब तक बहुत सीमित रही हैं। अमेरिका में कुछ मौकों पर राजनीतिक पृष्ठभूमि वाले लोगों को राजदूत बनाया गया, लेकिन बांग्लादेश जैसे संवेदनशील पड़ोसी देश में यह प्रयोग पहली बार हो रहा है।
रणनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह बदलाव अचानक नहीं आया। पिछले कुछ वर्षों में चीन ने बांग्लादेश के भीतर अपनी पकड़ लगातार मजबूत की है। चीन केवल आर्थिक परियोजनाओं तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उसने राजनीतिक दलों के साथ भी निरंतर संपर्क बनाए रखा। विशेष रूप से बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी यानी BNP के साथ चीन की सक्रियता दिल्ली के लिए चिंता का विषय रही है।

सूत्रों के अनुसार, ढाका में चीनी राजनयिक BNP नेतृत्व से नियमित मुलाकातें करते रहे हैं। इसके विपरीत, भारत लंबे समय तक BNP के साथ उसी स्तर का राजनीतिक संवाद विकसित नहीं कर पाया।
भारत की विदेश नीति लंबे समय तक इस धारणा पर आधारित रही कि अवामी लीग के साथ मजबूत संबंध ही बांग्लादेश में उसके हितों की रक्षा के लिए पर्याप्त होंगे। लेकिन शेख हसीना सरकार के कमजोर पड़ने और राजनीतिक अस्थिरता बढ़ने के बाद दिल्ली को यह एहसास हुआ कि केवल एक राजनीतिक धड़े पर निर्भर रहना भविष्य में जोखिम पैदा कर सकता है।
यही कारण है कि अब भाजपा और BNP के बीच औपचारिक राजनीतिक संपर्क बढ़ाने की कोशिशें सामने आ रही हैं। हाल ही में BNP प्रमुख तारिक रहमान द्वारा भाजपा नेतृत्व को भेजे गए संदेश को इसी संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

यह वही BNP है, जिस पर अतीत में भारत विरोधी रुख अपनाने के आरोप लगते रहे। खालिदा जिया के दौर में भारत और BNP के संबंध लगातार तनावपूर्ण रहे थे। यहां तक कि 2011-12 में मनमोहन सिंह सरकार द्वारा शुरू की गई राजनीतिक पहल भी ज्यादा आगे नहीं बढ़ सकी थी। दिल्ली यात्रा से लौटने के बाद खालिदा जिया ने फिर भारत विरोधी बयानबाजी शुरू कर दी थी।
लेकिन अब परिस्थितियां बदल चुकी हैं। बांग्लादेश की राजनीति में जमात-ए-इस्लामी और कट्टरपंथी समूहों की सक्रियता बढ़ने के बीच BNP भी अपने राजनीतिक विकल्पों को लेकर अधिक व्यावहारिक दिखाई दे रही है। दिल्ली में इसे एक अवसर के रूप में देखा जा रहा है।

भारत अच्छी तरह समझता है कि बांग्लादेश में राजनीतिक अस्थिरता का सीधा असर पूर्वोत्तर भारत पर पड़ सकता है। सीमा पार आतंकवाद, अवैध हथियारों की तस्करी और कट्टरपंथी नेटवर्क की गतिविधियां पहले भी सुरक्षा एजेंसियों के लिए चिंता का कारण रही हैं। ऐसे में दिल्ली अब केवल राजनयिक चैनलों पर निर्भर नहीं रहना चाहती।
दिनेश त्रिवेदी की नियुक्ति को इसी व्यापक रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। पश्चिम बंगाल से उनका गहरा राजनीतिक और सांस्कृतिक जुड़ाव भी इस फैसले में अहम माना जा रहा है। बंगाल और बांग्लादेश के बीच भाषा, संस्कृति और समाज का रिश्ता इतना गहरा है कि राजनीतिक संदेश भी वहां अलग तरीके से काम करते हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि एक राजनीतिक उच्चायुक्त कई बार वह संदेश सीधे पहुंचा सकता है, जो पारंपरिक नौकरशाही भाषा में कमजोर पड़ जाता है। यही वजह है कि दिल्ली अब “राजनीतिक संचार” को भी विदेश नीति का हिस्सा बना रही है।
इस पूरे घटनाक्रम में एक और दिलचस्प पहलू है। BNP द्वारा मतुआ समुदाय से जुड़ी सुभर्णा ठाकुर को आगे बढ़ाना केवल बांग्लादेश की आंतरिक राजनीति नहीं माना जा रहा। इसे पश्चिम बंगाल और भारत की राजनीति के संदर्भ में भी देखा जा रहा है।
मतुआ समुदाय पश्चिम बंगाल की राजनीति में प्रभावशाली भूमिका रखता है और भाजपा लंबे समय से इस समुदाय के बीच अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश करती रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का 2021 में ओराकांडी दौरा भी इसी रणनीति का हिस्सा माना गया था।
इसके साथ ही, बांग्लादेश में हिंदू अल्पसंख्यकों पर हमलों को लेकर भारत की चिंता लगातार बढ़ी है। मोहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार के दौरान अल्पसंख्यकों पर हुए हमलों ने भारत में राजनीतिक प्रतिक्रिया भी पैदा की थी। दिल्ली अब इस मुद्दे पर अधिक मुखर और सक्रिय दिखाई दे रही है। यानी बांग्लादेश को लेकर भारत की नई नीति केवल कूटनीतिक नहीं है। इसमें राजनीति, समाज, सुरक्षा, सीमा प्रबंधन और क्षेत्रीय शक्ति संतुलन सभी शामिल हैं।

चीन का बढ़ता प्रभाव इस पूरी कहानी की सबसे महत्वपूर्ण परतों में से एक है। बीजिंग ने भारतीय उपमहाद्वीप में लंबे समय से “राजनीतिक पहुंच” की नीति पर काम किया है। श्रीलंका, नेपाल और मालदीव के बाद बांग्लादेश में भी चीन अपनी पकड़ मजबूत करना चाहता है। भारत अब उसी मॉडल का जवाब अपने तरीके से देने की तैयारी करता दिखाई दे रहा है।
इसलिए दिनेश त्रिवेदी की ढाका नियुक्ति को केवल एक राजनयिक बदलाव मानना शायद इस पूरे संकेत को बहुत छोटा करके देखना होगा।
दरअसल, यह उस बड़े परिवर्तन का हिस्सा है, जहां भारत पहली बार अपने पड़ोस में केवल कूटनीति नहीं, बल्कि राजनीतिक प्रभाव की खुली रणनीति पर काम करता दिखाई दे रहा है। और संभवतः आने वाले वर्षों में भारतीय उपमहाद्वीप की राजनीति इसी नई प्रतिस्पर्धा से तय होगी।