तमिलनाडु विधानसभा में सनातन का अपमान: इस्लाम या ईसाइयत पर कहा होता तब भी जोसेफ़ विजय चुप रहते?

तमिलनाडु विधानसभा में “सनातन को मिटाने” जैसी टिप्पणी ने एक बार फिर बड़ा विवाद खड़ा कर दिया है। लेकिन इस बार सबसे ज्यादा सवाल मुख्यमंत्री जोसेफ विजय की चुप्पी पर उठ रहे हैं। क्या किसी दूसरे धर्म पर ऐसी टिप्पणी होती, तब भी सत्ता पक्ष इसी तरह मौन रहता?

The Narrative World    12-May-2026   
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तमिलनाडु विधानसभा में आज (12 मई, 2026) जो हुआ, वह केवल एक राजनीतिक बयान नहीं था। वह भारत की सभ्यता, करोड़ों हिंदुओं की आस्था और तथाकथित “धर्मनिरपेक्ष राजनीति” के दोहरे चेहरे को उजागर करने वाला क्षण था। डीएमके के नेता उदयनिधि स्टालिन ने एक बार फिर वही बात दोहराई, जिसने 2023 में पूरे देश में विवाद खड़ा किया था। “सनातन को समाप्त किया जाना चाहिए।” फर्क सिर्फ इतना था कि इस बार विवाद केवल बयान तक सीमित नहीं रहा। इस बार सबसे ज्यादा चर्चा उस चुप्पी की हो रही है, जो मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठे सी. जोसेफ विजय ने बनाए रखी।


विधानसभा में बैठे विजय हाथ जोड़कर उदयनिधि स्टालिन की ओर देखते रहे, लेकिन उन्होंने एक शब्द तक नहीं कहा। न विरोध। न आपत्ति। न यह स्पष्ट करने की कोशिश कि उनकी सरकार करोड़ों हिंदुओं की आस्था के खिलाफ इस तरह की भाषा का समर्थन नहीं करती। यही वह क्षण था, जिसने तमिलनाडु की नई राजनीति के दावों पर सबसे बड़ा प्रश्नचिह्न लगा दिया।


क्योंकि सवाल केवल इतना नहीं है कि उदयनिधि स्टालिन ने क्या कहा। सवाल यह है कि मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठा व्यक्ति उस बयान पर मौन क्यों रहा?


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अगर विधानसभा में कोई नेता खड़े होकर कहता कि “ईसाई धर्म को मिटा देना चाहिए” या “इस्लाम को समाप्त कर देना चाहिए”, तो क्या पूरा राजनीतिक और मीडिया तंत्र इसी तरह शांत बैठा रहता? क्या तब भी इसे “राजनीतिक अभिव्यक्ति” कहकर टाल दिया जाता? क्या तब भी ईसाई मुख्यमंत्री हाथ जोड़कर चुप बैठे रहते? यही वह सवाल है, जिसने इस पूरे घटनाक्रम को केवल तमिलनाडु की राजनीति तक सीमित नहीं रहने दिया।


दरअसल, उदयनिधि स्टालिन का “सनातन विरोध” कोई नई बात नहीं है। 2023 में उन्होंने सनातन धर्म की तुलना डेंगू, मलेरिया और कोरोना जैसी बीमारियों से करते हुए कहा था कि इसे “सिर्फ विरोध नहीं, समाप्त” किया जाना चाहिए। उस वक्त भी देशभर में भारी विरोध हुआ था। लेकिन द्रविड़ मुनेत्र कषगम ने इसे “सामाजिक न्याय” और “ब्राह्मणवाद विरोध” की भाषा में बचाने की कोशिश की। यहीं सबसे बड़ा खेल छिपा है।


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जब भी हिंदू आस्था, मंदिरों, सनातन परंपराओं या धार्मिक प्रतीकों पर हमला होता है, तो उसे “प्रगतिशील राजनीति”, “सामाजिक न्याय” और “तर्कवाद” की पैकेजिंग दे दी जाती है। लेकिन यही भाषा किसी दूसरे धर्म के लिए इस्तेमाल करने की कल्पना भी नहीं की जा सकती।


यानी भारत की तथाकथित धर्मनिरपेक्ष राजनीति में “सहनशीलता” का पूरा भार केवल हिंदू समाज पर डाल दिया गया है।


तमिलनाडु की राजनीति में यह कोई नया स्वरूप नहीं है। दशकों से द्रविड़ राजनीति के भीतर हिंदू प्रतीकों के प्रति एक वैचारिक आक्रामकता दिखाई देती रही है। मंदिरों, सनातन परंपराओं और हिंदू पहचान को “सामाजिक शत्रु” की तरह प्रस्तुत करना एक राजनीतिक रणनीति का हिस्सा बन चुका है। लेकिन आज जो सबसे ज्यादा चिंता पैदा करता है, वह यह नहीं कि उदयनिधि स्टालिन क्या कह रहे हैं। चिंता इस बात की है कि अब इस भाषा को सामान्य बनाने की कोशिश हो रही है। और इसी जगह ईसाई मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है।


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विजय को “नई राजनीति” के चेहरे के रूप में प्रस्तुत किया गया था। कहा गया कि वे तमिलनाडु को पुरानी द्रविड़ वैचारिक कट्टरता से बाहर निकालेंगे। चुनाव अभियान के दौरान उन्होंने “एकता”, “सभी समुदायों का सम्मान” और “नई शुरुआत” जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया। लेकिन सत्ता में आने के दो दिन बाद ही विधानसभा में जब सनातन को मिटाने की बात दोहराई गई, तब वही विजय मौन बैठे रहे।


राजनीति में कई बार शब्दों से ज्यादा खतरनाक चुप्पी होती है। क्योंकि चुप्पी केवल निष्क्रियता नहीं होती। कई बार वह मौन समर्थन बन जाती है। और आज सामाजिक माध्यमों पर सबसे ज्यादा यही सवाल पूछा जा रहा है कि क्या विजय की चुप्पी को सहमति माना जाए?


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उनके समर्थक इसे “राजनीतिक शिष्टाचार” कह रहे हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या करोड़ों हिंदुओं की आस्था को “मिटाने” की भाषा पर भी केवल शिष्टाचार दिखाया जाएगा? अगर यही बयान किसी चर्च, बाइबल या ईसाई धर्म के खिलाफ होता, तो क्या विजय उसी तरह हाथ जोड़कर शांत बैठे रहते? यही वह प्रश्न है, जिसका उत्तर आज तमिलनाडु की राजनीति नहीं दे पा रही।


दरअसल, इस पूरे घटनाक्रम ने एक और चीज साफ कर दी है। तमिलनाडु की तथाकथित “नई राजनीति” वास्तव में उतनी नई नहीं है, जितनी उसे बताया गया था। चेहरे बदल सकते हैं, लेकिन वैचारिक रेखाएं वही बनी रहती हैं। द्रविड़ मुनेत्र कषगम का पुराना सनातन विरोध आज भी उसी तरह मौजूद है और अगर मुख्यमंत्री उस पर सार्वजनिक आपत्ति तक दर्ज नहीं कर पा रहे, तो यह केवल व्यक्तिगत चुप्पी नहीं है। यह राजनीतिक संदेश है।


यही कारण है कि आज कई हिंदू संगठन और सामाजिक समूह इस मुद्दे को केवल बयान नहीं, बल्कि “हिंदू विरोधी राजनीति के सामान्यीकरण” के रूप में देख रहे हैं।


सबसे दिलचस्प बात यह है कि भारत में “घृणा भाषण” की बहस हमेशा चयनात्मक दिखाई देती है। अगर कोई अन्य धार्मिक पहचान से जुड़ी तीखी टिप्पणी कर दे, तो राष्ट्रीय मीडिया, अंतरराष्ट्रीय मंच और तथाकथित बुद्धिजीवी वर्ग तुरंत सक्रिय हो जाते हैं। लेकिन जब “सनातन को मिटाने” जैसी भाषा इस्तेमाल होती है, तब वही वर्ग अचानक “परिप्रेक्ष्य”, “विचारधारा” और “राजनीतिक अभिव्यक्ति” की बात करने लगता है। यानी धर्मनिरपेक्षता की पूरी परिभाषा ही एकतरफा हो चुकी है।


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यह विवाद इसलिए भी बड़ा है क्योंकि “सनातन” केवल एक धार्मिक शब्द नहीं है। यह भारत की हजारों वर्षों पुरानी सभ्यतागत पहचान का हिस्सा है। यही वह परंपरा है, जिसने इस भूमि को सांस्कृतिक रूप से जोड़े रखा। लेकिन आज उसी सनातन को “मिटाने” की भाषा इस्तेमाल करना और फिर उस पर मुख्यमंत्री का मौन रहना एक बड़े वैचारिक संघर्ष की तरफ संकेत करता है।


तमिलनाडु विधानसभा का यह दृश्य आने वाले वर्षों में बार-बार याद किया जाएगा। क्योंकि यह केवल एक बयान का विवाद नहीं था। यह उस राजनीति का चेहरा था, जो “समावेश” की बात करती है, लेकिन हिंदू आस्था के खिलाफ सबसे आक्रामक भाषा पर भी चुप रहती है।


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और शायद यही वजह है कि आज सबसे बड़ा सवाल उदयनिधि स्टालिन से ज्यादा सी. जोसेफ विजय पर उठ रहा है। क्योंकि उदयनिधि से लोग यही उम्मीद करते थे। लेकिन विजय से नहीं। उनकी चुप्पी ने अब यह बहस शुरू कर दी है कि क्या तमिलनाडु की नई सरकार वास्तव में “सभी धर्मों का सम्मान” करेगी, या फिर “सनातन विरोध” को ही नई राजनीतिक सामान्यता बना दिया जाएगा।


भारत की राजनीति में कई बयान आते हैं और चले जाते हैं। लेकिन कुछ क्षण ऐसे होते हैं, जो शब्दों से ज्यादा प्रतीकों के कारण याद रखे जाते हैं। तमिलनाडु विधानसभा का यह क्षण भी शायद उन्हीं में से एक है। एक तरफ “सनातन को मिटाने” की आवाज थी। दूसरी तरफ मुख्यमंत्री की चुप्पी। और इन दोनों के बीच करोड़ों हिंदू यह देख रहे थे कि आखिर उनके धर्म के लिए इस देश की धर्मनिरपेक्ष राजनीति में जगह कितनी बची है।

शुभम उपाध्याय

संपादक, स्तंभकार, टिप्पणीकार