बस्तर के खिलाफ दैनिक भास्कर का प्रोपेगेंडा : “ईसाई अत्याचार” का नैरेटिव गढ़कर जनजाति समाज को कटघरे में खड़ा करने की कोशिश

बस्तर के छिंदावाड़ा गांव से जुड़े शव दफन विवाद को दैनिक भास्कर ने “ईसाई अत्याचार” की कहानी के रूप में प्रस्तुत किया। लेकिन क्या वास्तव में ऐसा था? ग्राउंड रिपोर्ट, अदालत के दस्तावेज़, ग्रामसभा अधिकार और स्थानीय जनजातीय परंपराओं के आधार बताते हैं कि कैसे एक जटिल सामाजिक-सांस्कृतिक विवाद को भावनात्मक नैरेटिव में बदलकर पूरे जनजाति समाज को कटघरे में खड़ा करने की कोशिश की गई।

The Narrative World    14-May-2026   
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बस्तर को समझना आसान नहीं है। दिल्ली, रायपुर और भोपाल के वातानुकूलित न्यूज़रूम में बैठकर उसे केवलअल्पसंख्यक बनाम बहुसंख्यकयापीड़ित बनाम उत्पीड़ककी कहानी में बदल देना शायद आसान हो सकता है, लेकिन ज़मीन पर वास्तविकता कहीं अधिक जटिल, सांस्कृतिक और संवेदनशील है। यही कारण है कि जब दैनिक भास्कर ने छिंदावाड़ा गांव के शव दफन विवाद को लेकर अपनी तथाकथितग्राउंड रिपोर्टप्रकाशित की, तो वह रिपोर्ट पत्रकारिता से अधिक एक पूर्वनिर्धारित नैरेटिव का हिस्सा दिखाई दी।


दैनिक भास्कर के लिए नीरज झा नामक पत्रकार द्वारा की गई इस रिपोर्ट को इस तरह लिखा गया, मानो बस्तर के ग्रामीणों ने केवल इसलिए एक व्यक्ति के शव को दफनाने से रोक दिया क्योंकि वह ईसाई था। लेकिन जब उसी मामले की वास्तविक ग्राउंड रिपोर्ट, गांव वालों से बातचीत सामने आई, अदालत के दस्तावेज़ देखे गए और प्रशासनिक पक्ष को समझा गया, तो तस्वीर बिल्कुल अलग दिखाई देने लगी।


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दैनिक भास्कर की रिपोर्ट को पढ़ने के बाद सबसे पहला प्रश्न यही उठता है कि क्या यह वास्तव में ग्राउंड रिपोर्ट थी, या फिर पहले से तय एक वैचारिक निष्कर्ष को भावनात्मक भाषा में प्रस्तुत करने का प्रयास? क्योंकि पूरी रिपोर्ट में एक चीज लगातार दिखाई देती है जिसमें बस्तर के ग्रामीणों और स्थानीय समाज की सांस्कृतिक संवेदनशीलता को लगभग अदृश्य कर दिया गया है।


नीरज झा ने रिपोर्ट में बार-बार यह स्थापित करने की कोशिश की कि एक ईसाई परिवार को गांव में शव दफनाने नहीं दिया गया। जबकि वास्तविकता यह थी कि ग्रामीणों का विरोध शव दफनाने से नहीं, बल्कि गांव के पारंपरिक सनातनी शमशान में ईसाई रीति-रिवाज से दफनाने को लेकर था। यह अंतर मामूली नहीं है। यही पूरे विवाद का केंद्र था, जिसे रिपोर्ट ने लगभग धुंधला कर दिया।


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छिंदावाड़ा गांव का शमशान केवल एक खाली जमीन नहीं है। स्थानीय ग्रामीणों के अनुसार वह गांव की परंपरा, रूढ़ि-प्रथा और सामुदायिक संरचना से जुड़ा हुआ स्थल है, जहां उसी पद्धति से अंतिम संस्कार किए जाते हैं, जो पीढ़ियों से चली आ रही है। ग्रामीणों ने स्पष्ट कहा कि यदि मृतक का अंतिम संस्कार गांव की रूढ़ि-प्रथा के अनुसार किया जाए, तो उन्हें कोई आपत्ति नहीं है।


लेकिन मृतक स्वयं एक ईसाई पास्टर था और परिवार उसे ईसाई रीति-रिवाज से गांव के उसी पारंपरिक शमशान या निजी भूमि में दफनाना चाहता था। यही वह बिंदु था, जहां विवाद शुरू हुआ। लेकिन दैनिक भास्कर की रिपोर्ट ने इसेईसाई होने की वजह से विरोधकी तरह प्रस्तुत किया। जबकि जमीन पर विवादधर्मसे अधिकपद्धति और सामुदायिक परंपराको लेकर था।


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यही नहीं
, यह पूरा मामला किसी निजी वैमनस्य या अचानक पैदा हुई कट्टरता का परिणाम भी नहीं था। ग्रामीणों का कहना था कि पहले ही इस विषय पर निर्णय हो चुका था कि गांव के पारंपरिक शमशान का उपयोग केवल उसी रूढ़ि-प्रथा के अनुसार होगा, जिसके लिए वह निर्धारित है। यह क्षेत्र पांचवीं अनुसूची के अंतर्गत आता है, जहां स्थानीय जनजातीय समुदायों को अपनी परंपराओं, सांस्कृतिक प्रथाओं और सामुदायिक ढांचे को संरक्षित करने का संवैधानिक अधिकार प्राप्त है।


लेकिन दैनिक भास्कर की रिपोर्ट में न ग्रामसभा का उल्लेख दिखाई देता है, न पांचवीं अनुसूची का, न स्थानीय सांस्कृतिक अधिकारों का। पूरी रिपोर्ट को केवलधार्मिक उत्पीड़नकी दिशा में मोड़ दिया गया।


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रिपोर्ट का सबसे भावनात्मक हिस्सा “22 दिन तक शव पड़ा रहाऔरलाश नाले में फेंक दोजैसे कथनों पर आधारित था। लेकिन यही वह जगह है, जहां नीरज झा और दैनिक भास्कर की पत्रकारिता की विश्वसनीयता पर सबसे बड़ा प्रश्न खड़ा होता है।


“भास्कर ने इसे अपनी रिपोर्ट के हेडलाइन में लगाया लेकिन क्या इस कथन की किसी स्वतंत्र स्रोत ने पुष्टि की? क्या किसी ग्रामीण, प्रशासनिक अधिकारी या प्रत्यक्षदर्शी ने इसकी पुष्टि की? क्या पत्रकार ने दूसरे पक्ष से क्रॉस-चेक किया? नहीं! यानी एक एकतरफा और अप्रमाणित कथन को पूरे लेख का भावनात्मक केंद्र बना दिया गया। यह वही तकनीक है, जिसमें पहले पाठक को भावनात्मक रूप से विचलित किया जाता है और फिर उसे एक निश्चित वैचारिक निष्कर्ष की ओर धकेला जाता है।”


सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि न्यायालयों ने भी इस विवाद को केवलधार्मिक स्वतंत्रताका मामला नहीं माना। हाईकोर्ट और बाद में सुप्रीम कोर्ट ने भी गांव के पारंपरिक शमशान में ईसाई रीति-रिवाज से दफनाने का अधिकार नहीं दिया। अदालतों ने यही कहा कि अंतिम संस्कार ईसाइयों के लिए निर्धारित कब्रिस्तान में किया जाए।


यानी जिस बात को ग्रामीण शुरू से कह रहे थे, वही अंततः न्यायिक प्रक्रिया में भी सामने आई। लेकिन रिपोर्ट में इस तथ्य को जिस तरह प्रस्तुत किया गया, उससे ऐसा प्रतीत होता है मानो अदालतें भीअसहायथीं और एक पीड़ित ईसाई परिवार न्याय के लिए भटक रहा था। जबकि वास्तविकता कहीं अधिक संतुलित और जटिल थी।


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इस पूरे विवाद का एक और महत्वपूर्ण पहलू कन्वर्ज़न और चर्च गतिविधियों से जुड़ा है, जिसे दैनिक भास्कर की रिपोर्ट ने लगभग छिपा दिया। जिस चर्च में पत्रकार नीरज झा पहुंचे, वह मृतक पास्टर की निजी जमीन पर बना हुआ था। लेकिन क्या पत्रकार ने यह जांचने की कोशिश की कि उस चर्च की प्रशासनिक अनुमति है या नहीं?


स्थानीय तहसील में दायर आरटीआई के अनुसार प्रशासन के पास गांव में मौजूद चर्चों और ईसाई कन्वर्ज़न का स्पष्ट रिकॉर्ड नहीं है। इसका अर्थ यह है कि या तो कन्वर्ज़न की प्रक्रिया नियमानुसार दर्ज नहीं की गई, या सरकारी दस्तावेज़ों में धार्मिक पहचान अलग दिखाई जा रही है। लेकिन रिपोर्ट इन प्रश्नों से पूरी तरह बचती है। क्योंकि अगर ये प्रश्न उठते, तो कहानीपीड़ित परिवार बनाम कट्टर हिंदू ग्रामीणजितनी सरल नहीं रह जाती।


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रिपोर्ट का सबसे दिलचस्प विरोधाभास तब सामने आता है, जब रमेश बघेल के बयानों को देखा जाता है। पहले दिए गए इंटरव्यू और अदालत में दाखिल दस्तावेज़ों में उन्होंने खुद कोतीसरी पीढ़ी का ईसाईबताया था। लेकिन अभी दैनिक भास्कर को उन्होंने अलग कहानी बताई कि उनके पिता ईसाई बने थे। यह केवल एक सामान्य विरोधाभास नहीं है। यह पूरे नैरेटिव की विश्वसनीयता पर प्रश्न खड़ा करता है।


लेकिन दैनिक भास्कर के पत्रकार नीरज झा ने इस विरोधाभास पर कोई सवाल नहीं पूछा। न पुराने बयान जांचे गए, न परिवार की वास्तविक धार्मिक पृष्ठभूमि की पड़ताल की गई। क्योंकि ऐसा करने से भावनात्मक कहानी कमजोर पड़ सकती थी


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पूरी रिपोर्ट में एक और चीज लगातार दिखाई देती है कि बस्तर की वास्तविक सामाजिक संरचना को बाहरी शहरी वैचारिक भाषा में बदल देना।दलित हिंदूजैसा ढांचा उसी का उदाहरण है। बस्तर की सामाजिक पहचान मुख्यतः जनजातीय, सामुदायिक और रूढ़ि-प्रथा आधारित है। वहां की सामाजिक वास्तविकता को बाहरी वैचारिक फ्रेम में फिट करना न केवल बौद्धिक आलस्य है, बल्कि स्थानीय समाज की वास्तविकता को विकृत करना भी है।


दरअसल, यह पूरा मामला केवल शव दफन विवाद नहीं है। यह उस बड़े नैरेटिव पैटर्न का हिस्सा दिखाई देता है, जिसमें पहले स्थानीय सांस्कृतिक जटिलताओं को हटाया जाता है, फिर कन्वर्ज़न से पैदा हुए सामाजिक तनाव को गायब किया जाता है और अंत मेंअल्पसंख्यक उत्पीड़नका भावनात्मक ढांचा तैयार किया जाता है।


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यही कारण है कि बीबीसी, एबीसी, द वायर और अब दैनिक भास्कर जैसी रिपोर्टों में लगभग एक जैसी भावनात्मक संरचना दिखाई देती है। हर बार कहानी वही होती है, जिसमें पीड़ित ईसाई है, कट्टर हिंदू है, चुप है और असहिष्णु भारत है। लेकिन हर बार इनकी रिपोर्ट्स से गायब रहती है ग्रामसभा, पांचवीं अनुसूची, सामुदायिक अधिकार, स्थानीय परंपरा और अवैध कन्वर्ज़न का षड्यंत्र।



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सबसे गंभीर प्रश्न यही है कि आखिर बस्तर को बार-बार केवलउत्पीड़न की प्रयोगशालाकी तरह क्यों प्रस्तुत किया जाता है? क्या वहां के ग्रामीणों, उनकी परंपराओं और सांस्कृतिक संरचना की कोई वैधता नहीं है? क्या स्थानीय समुदायों को अपनी सामुदायिक भूमि और सांस्कृतिक व्यवस्था को संरक्षित करने का अधिकार नहीं है? और क्या हर बार केवल एक भावनात्मक कहानी दिखाकर पूरे समाज को कट्टर घोषित कर देना ही पत्रकारिता है?


दैनिक भास्कर और नीरज झा जैसे पत्रकारों से यही कहना है कि यदि आपको बस्तर को समझना है, तो उसकी परंपराओं, सामुदायिक संरचना और सांस्कृतिक संवेदनशीलता को समझना होगा। लेकिन समस्या यही है कि आज का एक बड़ा मीडिया वर्ग बस्तर को समझने नहीं, बल्कि पहले से तय नैरेटिव साबित करने जाता है। और जब पत्रकारिता की जगह वैचारिक एजेंडा ले लेता है, तबग्राउंड रिपोर्टभी धीरे-धीरे प्रोपेगेंडा में बदल जाती है।

शुभम उपाध्याय

संपादक, स्तंभकार, टिप्पणीकार