
झारखंड में एक बार फिर “आदिवासी पहचान” की राजनीति तेज हो गई है। जनजाति सुरक्षा मंच द्वारा 24 मई को दिल्ली में आयोजित होने वाले “जनजाति सांस्कृतिक समागम” के विरोध में झारखंड के कई संगठनों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और तथाकथित आंदोलनों से जुड़े लोगों (कांग्रेस, झमुमो एवं ईसाई मिशनरी तत्व भी शामिल) ने संयुक्त बयान जारी कर इस कार्यक्रम के बहिष्कार की अपील की है।
बयान में कहा गया कि यह आयोजन “जनजाति विरोधी” है और इसका उद्देश्य जनजातियों को हिंदू पहचान में समाहित करना है। विरोध करने वाले समूहों ने यह भी कहा कि जनजाति सुरक्षा मंच जनजातियों को “हिंदू वर्ण व्यवस्था के आखिरी पायदान” पर खड़े “जनजाति” के रूप में देखता है।
लेकिन इस पूरे विवाद में सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि आखिर “जनजाति” शब्द से अचानक इतनी समस्या क्यों हो रही है? और इससे भी बड़ा प्रश्न यह है कि क्या वास्तव में यह लड़ाई जनजाति अधिकारों की है, या फिर इसके पीछे एक बहुत बड़ा वैचारिक और मिशनरी एजेंडा काम कर रहा है?

बात यह है कि यदि “जनजाति” शब्द ही अपमानजनक, मनुवादी या ब्राह्मणवादी अवधारणा है, तो फिर भारतीय संविधान में प्रयुक्त “अनुसूचित जनजाति” शब्द क्या है? क्या संविधान निर्माताओं ने यह शब्द किसी षड्यंत्र के तहत चुना था? क्या बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर और जनजातीय समाज के बड़े नेता बाबा कार्तिक उरांव भी यही सोचते थे, जिन्होंने संवैधानिक ढांचे में “जनजाति” शब्द को स्वीकार किया?
भारत में आरक्षण, पांचवीं अनुसूची, जनजातीय आयोग, संवैधानिक संरक्षण और तमाम विशेष अधिकार “अनुसूचित जनजाति” की संवैधानिक अवधारणा पर आधारित हैं। यदि “जनजाति” शब्द ही गलत है, तो फिर क्या उसके आधार पर मिलने वाले आरक्षण और संवैधानिक अधिकार भी गलत हैं? क्या अब संविधान की भाषा को भी “गलत” घोषित कर दिया जाएगा?

दरअसल, यहां विवाद केवल शब्द का नहीं है। विवाद उस वैचारिक राजनीति का है, जिसमें जनजातीय समाज को उसकी सांस्कृतिक जड़ों और भारतीय सभ्यता से काटकर एक अलग राजनीतिक पहचान ब्लॉक में बदलने की कोशिश की जाती है। यही कारण है कि “सरना बनाम सनातन” का नैरेटिव पिछले कुछ वर्षों में तेजी से खड़ा किया गया है।
यह कोई नई रणनीति नहीं है। औपनिवेशिक काल में भी अंग्रेज़ मानवशास्त्रियों और ईसाई मिशनरियों ने भारतीय जनजातीय समाज को “हिंदू सभ्यता से अलग” दिखाने की कोशिश की थी। इसके पीछे केवल शैक्षणिक रुचि नहीं थी, बल्कि कन्वर्ज़न और सांस्कृतिक अलगाव की राजनीति भी थी। जनजातीय समुदायों को यह समझाया गया कि वे “हिंदू नहीं”, बल्कि एक पूरी तरह अलग इकाई हैं। यही विचार बाद में मिशनरी नेटवर्क और वामपंथी राजनीति के लिए आधार बन गया।

आज भी यही नैरेटिव नए रूप में दिखाई देता है। जब कोई संगठन जनजातीय समाज को उसकी पारंपरिक देवी-देवता परंपरा, प्रकृति पूजा और भारतीय सांस्कृतिक धारा से जोड़ने की बात करता है, तो उसे “मनुवादी” और “ब्राह्मणवादी” घोषित कर दिया जाता है। लेकिन जब चर्च आधारित रिलिजयस सिस्टम गांव-गांव में सक्रिय होती हैं, तब वही समूह उसे “अधिकार” और “धार्मिक स्वतंत्रता” बताते हैं। यही दोहरा मापदंड इस पूरी बहस का सबसे बड़ा संकेत है।
इस विवाद का सबसे महत्वपूर्ण पहलू “डिलिस्टिंग” की बहस है। विरोध करने वाले संगठनों ने आरोप लगाया कि ईसाई जनजातियों को अनुसूचित जनजाति सूची से हटाने की मांग करके “जनजाति एकता” को तोड़ा जा रहा है। लेकिन यहां मूल प्रश्न यह है कि यदि कोई व्यक्ति अपनी पारंपरिक जनजातीय सांस्कृतिक व्यवस्था छोड़कर ईसाई रिलीजन स्वीकार कर लेता है, तो क्या उसकी पहचान उसी अर्थ में “जनजातीय” रह जाती है?

लोकुर समिति सहित कई आधिकारिक समितियों ने जनजातीय पहचान की जो विशेषताएं बताई हैं, उनमें विशिष्ट संस्कृति, पारंपरिक सामाजिक संरचना, प्रकृति आधारित आस्था, देवी-देवता पूजा, अलग सामुदायिक जीवन और पारंपरिक रीति-रिवाज शामिल हैं। लेकिन यदि कोई व्यक्ति चर्च आधारित अब्राहमिक रिलिजयस सिस्टम में चला जाता है, अपनी पारंपरिक प्रकृति पूजा और देवी-देवता परंपरा त्याग देता है, तो फिर यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या वह उसी सांस्कृतिक अर्थ में “जनजाति” रह जाता है?
यही डिलिस्टिंग बहस का वास्तविक आधार है, जिसे जानबूझकर “ईसाई विरोध” की तरह प्रस्तुत किया जाता है। जबकि वास्तविक प्रश्न सांस्कृतिक और संवैधानिक पहचान का है। जनजातीय पहचान केवल रक्त से नहीं, संस्कृति से भी बनती है। यदि संस्कृति अप्रासंगिक है, तो फिर “जनजातीय संस्कृति बचाओ” का नारा क्यों दिया जाता है? और यदि संस्कृति महत्वपूर्ण है, तो धर्मांतरण के बाद उस सांस्कृतिक निरंतरता पर प्रश्न उठाना गलत कैसे हो गया?
दरअसल, यही वह बिंदु है जहां मिशनरी नेटवर्क और पहचान आधारित राजनीति एक-दूसरे से जुड़ते दिखाई देते हैं। जनजातीय समाज को मुख्य भारतीय सांस्कृतिक धारा से अलग दिखाना, उसे “पीड़ित पहचान” के रूप में स्थापित करना और फिर उस पहचान के भीतर धार्मिक एवं राजनीतिक प्रभाव बढ़ाना, यह मॉडल केवल भारत में नहीं, बल्कि दुनिया के कई हिस्सों में इस्तेमाल किया गया है।

यही कारण है कि “जनजाति सांस्कृतिक समागम” जैसे आयोजनों से कुछ समूह असहज दिखाई देते हैं। क्योंकि यह आयोजन केवल सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि जनजातीय समाज को उसकी पारंपरिक जड़ों और भारतीय सभ्यतागत पहचान से जोड़ने का प्रयास भी माना जा रहा है। यदि लाखों जनजातीय प्रतिनिधि एक मंच पर अपनी पारंपरिक संस्कृति, देवी-देवता परंपरा और सभ्यतागत निरंतरता की बात करेंगे, तो स्वाभाविक रूप से वह नैरेटिव कमजोर होगा, जो वर्षों से “आदिवासी हिंदू नहीं है” की रेखा खींचने में लगा है।
यही कारण है कि विरोध करने वाले संगठनों के बयान में “सरना-सनातन एक” जैसे विचारों को खतरे की तरह प्रस्तुत किया गया। लेकिन प्रश्न यह है कि आखिर किसी सांस्कृतिक एकता या ऐतिहासिक निरंतरता से इतनी बेचैनी क्यों है? क्या वास्तव में डर इस बात का है कि जनजातीय समाज अपनी पारंपरिक जड़ों और सभ्यतागत संबंधों को समझने लगेगा?
बिरसा मुंडा की विरासत को भी इसी राजनीतिक संघर्ष के भीतर खींचा जा रहा है। बिरसा मुंडा ने अपने समाज की सांस्कृतिक रक्षा और ईसाई मिशनरी हस्तक्षेपों के खिलाफ संघर्ष किया था। लेकिन आज उन्हीं के नाम पर ऐसे नैरेटिव खड़े किए जा रहे हैं, जिनमें जनजातीय समाज को उसकी सभ्यतागत जड़ों से अलग पहचान के रूप में स्थापित करने की कोशिश दिखाई देती है।
सबसे गंभीर प्रश्न यही है कि आखिर जनजातीय समाज को लगातार “अलग” साबित करने की इतनी बेचैनी क्यों है? क्या इसलिए कि यदि जनजातीय समाज अपनी सांस्कृतिक निरंतरता और भारतीय सभ्यता से अपने संबंध को पुनः स्वीकार करने लगेगा, तो दशकों से चल रही पहचान आधारित राजनीति कमजोर पड़ जाएगी?
यही कारण है कि “जनजाति सांस्कृतिक समागम” का विरोध केवल एक कार्यक्रम का विरोध नहीं है। यह उस वैचारिक संघर्ष का हिस्सा है, जिसमें एक पक्ष जनजातीय समाज को भारतीय सभ्यता की निरंतर धारा का हिस्सा मानता है, जबकि दूसरा पक्ष उसे स्थायी रूप से अलग राजनीतिक और धार्मिक पहचान में बदल देना चाहता है।