Dhurandhar 3: एशिया की नई जंग और बदलती वैश्विक चालें

क्या एशिया में बदलते गठबंधन अब दुनिया को नए शीत युद्ध की तरफ ले जा रहे हैं, जहां भारत सबसे अहम खिलाड़ी बन चुका है?

The Narrative World    25-May-2026
Total Views |
Representative Image
 
साल 2014 दुनिया की राजनीति में एक बड़े मोड़ की तरह आया। चीन में शी जिनपिंग तेजी से सत्ता अपने हाथों में केंद्रित कर रहे थे। उन्होंने कम्युनिस्ट पार्टी, सेना और सरकार पर पकड़ मजबूत करनी शुरू कर दी थी। भ्रष्टाचार विरोधी अभियान के नाम पर उन्होंने चीन के सबसे ताकतवर नेताओं पर कार्रवाई की। बीजिंग में इसे सत्ता सफाई कहा गया, जबकि वॉशिंगटन और लैंगली में बैठे रणनीतिकार इसे दूसरे नजरिए से देख रहे थे।
 
अमेरिका को लगने लगा कि चीन शायद धीरे-धीरे वैसी दिशा में बढ़ सकता है, जिसकी उम्मीद पश्चिम लंबे समय से करता आया था। कई लोगों को विश्वास था कि देंग शियाओपिंग के दौर में जो राजनीतिक उदारीकरण रुक गया था, वह दोबारा शुरू हो सकता है। अमेरिकी कारोबारी तबके में भी शी जिनपिंग को लेकर उत्साह था। उपराष्ट्रपति रहते हुए उनकी अमेरिका यात्रा ने वहां के उद्योगपतियों को प्रभावित किया था।
 
Representative Image
 
इसी माहौल में बराक ओबामा ने चीन के साथ रिश्तों को नई दिशा देने की कोशिश शुरू की। दोनों नेताओं के बीच व्यक्तिगत केमिस्ट्री की भी खूब चर्चा हुई। कहा गया कि दोनों को साहित्य और दर्शन में समान रुचि थी। 2014 का APEC Summit इस नई दोस्ती का मंच बना। लाल कालीन, राजकीय भोज और बड़ी घोषणाओं के बीच दुनिया को लगा कि अमेरिका और चीन अब प्रतिस्पर्धा से ज्यादा साझेदारी की तरफ बढ़ रहे हैं।
 
दोनों देशों ने जलवायु परिवर्तन पर सहयोग बढ़ाया। बाद में यही बातचीत पेरिस समझौते तक पहुंची। उस समय ऐसा माहौल बनाया गया कि दुनिया की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाएं मिलकर वैश्विक राजनीति का नया अध्याय लिखेंगी। लेकिन यह दौर ज्यादा लंबा नहीं चला।
 
G20 का वह दृश्य जिसने सब बदल दिया
 
समय बीतने के साथ अमेरिका और चीन के बीच तनाव सतह पर आने लगा। शिनजियांग में मानवाधिकारों का मुद्दा उठा। दक्षिण चीन सागर में चीन की आक्रामकता बढ़ी। साइबर सुरक्षा और व्यापार को लेकर भी मतभेद सामने आने लगे। फिर भी दोनों पक्ष सार्वजनिक रूप से रिश्तों को सामान्य दिखाने की कोशिश करते रहे।
 
2016 में चीन ने G20 Summit की मेजबानी की। दुनिया के बड़े नेता हांगझोऊ पहुंचे। भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन तक, सभी नेताओं का भव्य स्वागत हुआ। लेकिन जब अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा पहुंचे, तब तस्वीर बदल गई।
 
एयर फोर्स वन के लिए सीढ़ी तक उपलब्ध नहीं कराई गई। ओबामा को विमान के निचले हिस्से वाले कम इस्तेमाल होने वाले रास्ते से उतरना पड़ा। यह दृश्य पूरी दुनिया ने देखा। अमेरिकी मीडिया में इसे अपमान के तौर पर पेश किया गया।
 
Representative Image
 
वॉशिंगटन में बैठे रणनीतिकारों को लगा कि चीन अब बराबरी नहीं, बल्कि चुनौती की भाषा बोल रहा है।
 
अमेरिका की जनता पहले ही सस्ते चीनी सामान और फैक्ट्रियों के बंद होने से नाराज थी। वर्षों तक उन्हें समझाया गया कि चीन के साथ व्यापार अमेरिका की आर्थिक ताकत बढ़ाएगा। लेकिन अब लोगों को लगने लगा कि अमेरिका आर्थिक लाभ के बदले अपना वैश्विक सम्मान खो रहा है।
 
यहीं से अमेरिकी राजनीति में एक नए दौर की शुरुआत हुई।
 
ट्रंप का उदय और चीन के खिलाफ खुली जंग
 
डोनाल्ड ट्रंप ने इसी माहौल को भुनाया। उन्होंने खुलकर कहा कि चीन अमेरिका का फायदा उठा रहा है। उन्होंने खुद को ऐसे नेता के रूप में पेश किया जो बीजिंग पर दबाव बनाने से पीछे नहीं हटेगा।
 
व्हाइट हाउस पहुंचते ही ट्रंप ने कई बड़े फैसले लिए। सबसे पहले उन्होंने पेरिस समझौते से अमेरिका को बाहर निकाला। यह सिर्फ जलवायु नीति का फैसला नहीं था। इसे ओबामा-शी साझेदारी पर राजनीतिक हमला माना गया।
 
Representative Image
 
इसके बाद चीन पर टैरिफ लगाए गए। व्यापार युद्ध शुरू हुआ। दशकों से जिस मुक्त बाजार व्यवस्था का प्रचार अमेरिका करता आया था, वही अब संरक्षणवाद की राह पर चलने लगा।
 
अमेरिका का फोकस अब स्पष्ट था। चीन को रोकना।
 
इसी दौरान "Pivot to Asia" रणनीति का सैन्य और खुफिया स्वरूप तेजी से सामने आने लगा। पहले इसका इस्तेमाल व्यापार और निवेश बढ़ाने के लिए किया जाता था। अब इसमें सुरक्षा, सैन्य गठबंधन और इंडो-पैसिफिक शक्ति संतुलन जैसे तत्व शामिल हो गए।
 
भारत और चीन: मुस्कुराहटों के पीछे बढ़ता तनाव
 
दूसरी तरफ भारत भी चीन को लेकर नई सोच विकसित कर रहा था।
 
Representative Image
 
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सत्ता में आने के बाद चीन के साथ रिश्ते सुधारने की पूरी कोशिश की। उन्होंने शी जिनपिंग का गुजरात में स्वागत किया। दोनों नेताओं की झूले वाली तस्वीरें वैश्विक मीडिया में छाईं। बाद में BRICS Summit के दौरान भी दोनों नेताओं की गर्मजोशी चर्चा में रही।
 
लेकिन तस्वीरों के पीछे सीमा पर तनाव बढ़ रहा था।
 
कभी नक्शों को लेकर विवाद होता, तो कभी सीमा पर सैनिक आमने-सामने आ जाते। धीरे-धीरे यह साफ होने लगा कि आर्थिक रिश्तों और कूटनीतिक मुस्कुराहटों के बावजूद दोनों देशों के बीच अविश्वास बना हुआ है।
 
फिर आया डोकलाम।
 
Representative Image
 
2017 में भूटान सीमा के पास डोकलाम में भारतीय और चीनी सैनिकों के बीच लंबा गतिरोध चला। हालात इतने बिगड़े कि युद्ध की आशंका तक जताई जाने लगी। भारत ने पहली बार साफ संकेत दिया कि वह चीन के दबाव में पीछे हटने वाला नहीं है।
 
वॉशिंगटन ने इसे मौके के तौर पर देखा।
 
QUAD की वापसी और नई रणनीतिक रेखाएं
 
इसी समय जापान ने मध्यस्थ की भूमिका निभाई। कई वर्षों से ठंडे बस्ते में पड़ा QUAD फिर सक्रिय हुआ। नवंबर 2017 में ASEAN Summit के दौरान अमेरिका, भारत, जापान और ऑस्ट्रेलिया एक साथ आए।
 
लेकिन इस गठबंधन को लेकर सभी देशों की सोच अलग थी।
 
अमेरिका चाहता था कि QUAD सीधे चीन विरोधी सैन्य मोर्चे की तरह काम करे। ट्रंप प्रशासन की रणनीति साफ थी। चीन को घेरो और उसके पड़ोसी देशों को आगे रखो।
 
Representative Image
 
जापान के पास ज्यादा विकल्प नहीं थे। वह पहले से चीन के दबाव का सामना कर रहा था।
 
लेकिन भारत ने अलग रास्ता चुना।
 
नई दिल्ली ने "Free and Open Indo-Pacific" की बात जरूर की, लेकिन साथ ही यह भी स्पष्ट किया कि भारत किसी दूसरे देश की लड़ाई का मोहरा नहीं बनेगा। भारत चीन के खिलाफ रणनीतिक संतुलन चाहता था, लेकिन अमेरिकी एजेंडे का फ्रंटलाइन सैनिक बनने को तैयार नहीं था।
 
यहीं से अमेरिका और भारत के बीच छिपी असहजता बढ़ने लगी।
 
कोविड ने बदल दी दुनिया की राजनीति
 
फिर दुनिया पर कोविड महामारी टूट पड़ी। महामारी ने वैश्विक सप्लाई चेन की कमजोरियां उजागर कर दीं। भारत को महसूस हुआ कि जरूरत के समय दुनिया अपने हित पहले देखती है। इसी दौर में "आत्मनिर्भर भारत" की नीति तेजी से आगे बढ़ी।
 
भारत ने दवाइयों और वैक्सीन उत्पादन में बड़ी भूमिका निभाई। साथ ही दक्षिण अफ्रीका के साथ मिलकर वैक्सीन पेटेंट नियमों में ढील की मांग उठाई। इसका उद्देश्य गरीब देशों तक सस्ती वैक्सीन पहुंचाना था।
 
Representative Image
 
लेकिन अमेरिकी फार्मा कंपनियां इससे नाराज हो गईं। उन्हें लगा कि भारत उनके व्यावसायिक हितों को चुनौती दे रहा है।
 
धीरे-धीरे वॉशिंगटन के रणनीतिक हलकों में यह धारणा बनने लगी कि भारत सिर्फ साझेदार नहीं रहना चाहता। वह स्वतंत्र शक्ति केंद्र बनने की दिशा में बढ़ रहा है।
 
नैरेटिव वॉर की शुरुआत
 
इसके बाद भारत को लेकर वैश्विक विमर्श बदलने लगा।
 
अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों में भारत को "Flawed Democracy" और "Electoral Autocracy" जैसे शब्दों से वर्णित किया जाने लगा। मानवाधिकार, प्रेस स्वतंत्रता और धार्मिक तनाव जैसे मुद्दों पर लगातार सवाल उठने लगे।
 
Representative Image
 
2020 के दिल्ली दंगे भी इसी दौर में हुए। अंतरराष्ट्रीय मीडिया में भारत को लेकर नकारात्मक कवरेज बढ़ी। पश्चिमी थिंक टैंक और कई मानवाधिकार संगठन लगातार भारत सरकार पर सवाल उठाने लगे।
 
नई दिल्ली ने इसे अलग नजरिए से देखा। भारतीय रणनीतिक हलकों में यह चर्चा बढ़ी कि भारत पर सिर्फ राजनीतिक नहीं, बल्कि नैरेटिव आधारित दबाव बनाया जा रहा है।
 
कनाडा, खालिस्तान और बढ़ती खुफिया टकराहट
 
तनाव का अगला बड़ा मोर्चा कनाडा बना।
 
18 जून 2023 को कनाडा के ब्रिटिश कोलंबिया में खालिस्तानी समर्थक हरदीप सिंह निज्जर की गोली मारकर हत्या कर दी गई। घटना के बाद कनाडा ने भारत पर गंभीर आरोप लगाए। फाइव आइज समूह के देशों ने कनाडा के साथ एकजुटता दिखाई।
 
अमेरिकी विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन ने भारत से जांच में सहयोग की अपील की। हालांकि उस समय सार्वजनिक रूप से कोई ठोस सबूत सामने नहीं आया था।
 
Representative Image
 
 
इसके कुछ समय बाद एक और मामला सामने आया। निखिल गुप्ता को चेक गणराज्य में गिरफ्तार किया गया। अमेरिका ने उन पर गुरपतवंत सिंह पन्नून की हत्या की साजिश से जुड़े होने का आरोप लगाया।
 
इस पूरे घटनाक्रम ने भारत और पश्चिमी देशों के बीच अविश्वास को और बढ़ा दिया।
 
अब मामला सिर्फ कूटनीति या व्यापार तक सीमित नहीं था। खुफिया एजेंसियों, प्रवासी राजनीति और वैश्विक नैरेटिव का संघर्ष खुलकर सतह पर आने लगा था।
 
 
दुनिया एक नए दौर में प्रवेश कर चुकी थी।
 
और दक्षिण एशिया धीरे-धीरे उस संघर्ष का सबसे संवेदनशील मैदान बनता जा रहा था।
 
(जारी रहेगा...)
 
लेख
प्रियांश पांडेय