वीर सावरकर को काला पानी भेजने वाले फैसले में शामिल था कांग्रेस का पूर्व अध्यक्ष

वीर सावरकर को काला पानी की सजा सुनाने वाले विशेष न्यायाधिकरण में एक ऐसा नाम शामिल था, जिस पर आज बहुत कम चर्चा होती है। यह नाम था कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष और ब्रिटिश नाइटहुड प्राप्त न्यायाधीश नारायण गणेश चंदावरकर का।

The Narrative World    31-May-2026   
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भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास जितना गौरवशाली है, उतना ही जटिल भी। इस इतिहास में कुछ नाम संघर्ष, बलिदान और प्रतिरोध के प्रतीक बनकर उभरे, वीर विनायक दामोदर सावरकर का नाम इन्हीं प्रमुख व्यक्तित्वों में शामिल है।


सावरकर को लेकर दशकों से राजनीतिक और वैचारिक विमर्श चलते रहे हैं, लेकिन उनके जीवन से जुड़ा एक तथ्य ऐसा है जिस पर अपेक्षाकृत कम चर्चा होती है। यह तथ्य उस विशेष न्यायाधिकरण से जुड़ा है जिसने सावरकर को दो आजीवन कारावास, यानी कुल 50 वर्ष के "ट्रांसपोर्टेशन फॉर लाइफ" की सजा सुनाई थी।


उस पीठ में शामिल न्यायाधीशों में से एक थे सर नारायण गणेश चंदावरकर। चंदावरकर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष रह चुके थे। बाद में उन्हें ब्रिटिश साम्राज्य ने नाइटहुड से सम्मानित किया। कांग्रेस नेता चंदावरकर उस औपनिवेशिक न्यायिक व्यवस्था का हिस्सा थे जिसने सावरकर को अंडमान की सेल्युलर जेल, यानी काला पानी, भेजने वाले फैसले में भूमिका निभाई।


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आज जब कांग्रेस और उससे जुड़े कई राजनीतिक समूह सावरकर की भूमिका पर लगातार प्रश्न उठाते हैं, तब इतिहास का यह अध्याय एक अलग तरह का प्रश्न सामने रखता है।


“आखिर वह व्यक्ति कौन था जो सावरकर को सजा सुनाने वाली पीठ में बैठा था? उसकी राजनीतिक पृष्ठभूमि क्या थी? ब्रिटिश सत्ता से उसके संबंध कैसे थे? और स्वतंत्रता संग्राम की मुख्यधारा की चर्चाओं में इस तथ्य का उल्लेख इतना सीमित क्यों दिखाई देता है?”


नारायण गणेश चंदावरकर कोई साधारण सार्वजनिक व्यक्ति नहीं थे। वे कांग्रेस के शुरुआती दौर के प्रमुख नेताओं में गिने जाते थे। वर्ष 1900 में वे कांग्रेस के अध्यक्ष चुने गए। ये उन नेताओं में से थे, जो ब्रिटिश शासन के भीतर संवैधानिक सुधारों के माध्यम से राजनीतिक परिवर्तन की वकालत करते थे। कांग्रेस के ऐतिहासिक अभिलेख भी इस बात की पुष्टि करते हैं कि चंदावरकर संगठन के अध्यक्ष रहे और बाद में बॉम्बे हाईकोर्ट के न्यायाधीश बने।


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राजनीतिक जीवन के समानांतर उनका सार्वजनिक और न्यायिक करियर ब्रिटिश प्रशासनिक ढांचे से भी जुड़ता गया। वर्ष 1910 में ब्रिटिश क्राउन ने उन्हें नाइटहुड प्रदान किया। उस दौर में यह सम्मान ब्रिटिश साम्राज्य द्वारा चुनिंदा भारतीयों को दिया जाता था। इसके बाद उनके नाम के आगे "सर" की उपाधि जुड़ गई, जो ब्रिटिश शासन की औपचारिक मान्यता का प्रतीक थी। इसी कालखंड में सावरकर का मुकदमा भी अपने निर्णायक चरण में पहुंचा।


लंदन स्थित इंडिया हाउस से जुड़े सावरकर पहले ही ब्रिटिश सरकार की निगरानी में आ चुके थे। उन्होंने 1857 के संग्राम को स्वतंत्रता का प्रथम युद्ध बताते हुए लेखन किया, क्रांतिकारी गतिविधियों को वैचारिक आधार प्रदान किया और अभिनव भारत जैसे संगठन से जुड़े रहे।


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ब्रिटिश सरकार ने उन पर हथियारों की आपूर्ति, क्रांतिकारी साहित्य के प्रसार और ब्रिटिश विरोधी गतिविधियों को बढ़ावा देने के आरोप लगाए। मार्च 1910 में उनकी गिरफ्तारी हुई। इसके बाद मुकदमा एक विशेष न्यायाधिकरण के समक्ष चला। इस पीठ में बेसिल स्कॉट, हीटन और नारायण गणेश चंदावरकर शामिल थे।


इसी न्यायाधिकरण ने सावरकर को दो अलग-अलग मामलों में आजीवन कारावास की सजा सुनाई। दोनों सजाओं को मिलाकर यह अवधि 50 वर्ष मानी गई और उन्हें अंडमान की सेल्युलर जेल भेज दिया गया।


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आज सावरकर को लेकर होने वाली अधिकांश राजनीतिक बहसें उनकी जेल से लिखी गई याचिकाओं पर केंद्रित रहती हैं। लेकिन शायद ही कभी इस तथ्य पर उतनी चर्चा होती है कि जिस विशेष न्यायाधिकरण ने उन्हें काला पानी की सजा सुनाई, उसमें कांग्रेस का एक पूर्व अध्यक्ष भी शामिल था। यह भी कम ही याद किया जाता है कि वही व्यक्ति ब्रिटिश साम्राज्य से सम्मानित था और औपनिवेशिक न्यायिक ढांचे का हिस्सा था।


यह प्रश्न केवल किसी एक व्यक्ति की भूमिका का नहीं है। यह उस दौर के वैचारिक संघर्षों को भी सामने लाता है, जिनकी चर्चा अक्सर अधूरी रह जाती है।


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सावरकर को जिस सेल्युलर जेल में भेजा गया, वह केवल एक कारागार नहीं थी। ब्रिटिश शासन के दौरान इसे राजनीतिक बंदियों को कठोर दंड देने के केंद्र के रूप में देखा जाता था। वहां कैदियों को शारीरिक श्रम, एकांत कारावास और कड़े अनुशासन का सामना करना पड़ता था। काला पानी भेजे जाने का अर्थ केवल जेल जाना नहीं था, बल्कि लंबे सामाजिक और मानसिक अलगाव को भी झेलना था।


यही वह संदर्भ है जो आज की राजनीतिक बहसों में अक्सर पीछे छूट जाता है। सावरकर की याचिकाओं पर विस्तृत चर्चा होती है, लेकिन उस औपनिवेशिक व्यवस्था, मुकदमे की प्रकृति और कारावास की परिस्थितियों पर अपेक्षाकृत कम ध्यान दिया जाता है। इसी तरह उस न्यायिक ढांचे पर भी कम चर्चा होती है जिसके माध्यम से यह फैसला दिया गया।


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स्वतंत्रता संग्राम की कहानी किसी एक संगठन, विचारधारा या राजनीतिक धारा तक सीमित नहीं थी। इसमें क्रांतिकारी, समाज सुधारक, संवैधानिक सुधारवादी, सशस्त्र आंदोलनकारी और विभिन्न वैचारिक धाराएं शामिल थीं। इसलिए इतिहास को समझने के लिए उसके सभी पक्षों को सामने रखना आवश्यक है।


आज जब स्वतंत्रता आंदोलन की विरासत को लेकर नए सिरे से बहस हो रही है, तब यह प्रश्न भी उठ रहा है कि क्या इतिहास को केवल राजनीतिक सुविधा के आधार पर पढ़ा जाना चाहिए, या उसके सभी अध्यायों को समान गंभीरता से देखा जाना चाहिए।


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क्या वीर सावरकर पर चर्चा केवल कुछ चुनिंदा घटनाओं तक सीमित रहेगी, या फिर उन व्यक्तियों और संस्थाओं की भूमिका पर भी विचार होगा जिन्होंने उस दौर के निर्णायक फैसलों में भागीदारी निभाई थी?


इतिहास की यह सच्चाई है कि वीर सावरकर को काला पानी की सजा सुनाने वाले विशेष न्यायाधिकरण में नारायण गणेश चंदावरकर शामिल थे। वे कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष थे और उन्हें ब्रिटिश शासन ने नाइटहुड प्रदान किया था।

शुभम उपाध्याय

संपादक, स्तंभकार, टिप्पणीकार