
सशस्त्र नक्सलवाद-माओवाद के ख़त्म होने के साथ उसके कई ऐसे चेहरे सामने आ रहे हैं, जिनकी चर्चा लंबे समय तक दबाकर रखी गई। चाहे वह जल, जंगल और जमीन के नाम पर की गई करोड़ों रुपये की उगाही हो, या फिर बस्तर के आम जनजातीय युवाओं को हिंसा की राह पर धकेलने की रणनीति, माओवादी संगठन के भीतर की परतें अब एक-एक कर खुल रही हैं। सोने की ईंटों और भारी मात्रा में बरामद नकदी ने पहले ही इस कथित क्रांति के असली पक्ष को उजागर कर दिया था। अब माओवादी आतंकी संगठन की एक और अमानवीय सच्चाई फिर चर्चा में है।
यह मामला उन आत्मसमर्पित नक्सलियों से जुड़ा है, जिनकी संगठन में रहते हुए नसबंदी करा दी गई थी। प्रशासन ने ऐसे पूर्व नक्सलियों की नसबंदी को चिकित्सकीय प्रक्रिया के माध्यम से खोलने के लिए विशेष पहल शुरू की है। यह सुनने में भले असामान्य लगे, लेकिन बस्तर में आत्मसमर्पण कर चुके कई पूर्व माओवादी वर्षों से इसी समस्या से जूझ रहे हैं।
आत्मसमर्पित नक्सलियों और सुरक्षा एजेंसियों के सामने आए कई बयानों के अनुसार, माओवादी आतंकी संगठन के भीतर विशेष रूप से निचले स्तर के कैडरों और बस्तर के जनजातीय युवाओं की नसबंदी कराई जाती थी।
माओवादी संगठन का उद्देश्य उन्हें पारिवारिक जीवन से दूर रखना था, ताकि उनका पूरा जीवन केवल नक्सल संगठन और उसकी गतिविधियों के लिए रहे। कई पूर्व नक्सलियों ने समय-समय पर बताया है कि माओवदी संगठन में युवाओं पर इस तरह के दबाव डाले जाते थे और कई मामलों में उनकी इच्छा के विरुद्ध भी नसबंदी कराई गई।

वैसे यह मुद्दा नया नहीं है। अतीत में आत्मसमर्पण कर चुके और गिरफ्तार हुए कई माओवादियों ने भी इस सिस्टम का ज़िक्र किया था। हालांकि अब प्रशासन ने इस समस्या के समाधान के लिए व्यवस्थित पहल की है। जगदलपुर स्थित महारानी अस्पताल में आयोजित विशेष शिविर में 28 आत्मसमर्पित माओवादियों की जांच कर उनके उपचार की प्रक्रिया शुरू की गई है।
चिकित्सकों का मानना है कि सफल उपचार के बाद इनमें से कई लोग सामान्य पारिवारिक जीवन जी सकेंगे और संतान सुख प्राप्त कर पाएंगे। माओवादी संगठन की इस अमानवीय व्यवस्था के कारण अनेक पूर्व नक्सली सरेंडर करने के बाद भी और विवाह के बाद भी संतान प्राप्ति से वंचित रहे। इसका असर केवल उनके व्यक्तिगत जीवन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उन्हें मानसिक, सामाजिक और पारिवारिक स्तर पर भी अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा।
पूर्व नक्सलियों के अनुसार, शीर्ष माओवादियों का तर्क था कि यदि कैडर विवाह करेंगे, बच्चे पैदा करेंगे और परिवार बसाएंगे तो वे नक्सल संगठन छोड़कर सामान्य जीवन की ओर लौट सकते हैं। वैसे कागजों पर यह नियम सभी पर लागू बताया जाता था, लेकिन व्यवहार में इसका सबसे अधिक असर बस्तर के स्थानीय जनजातीय कैडरों और निचले स्तर के सदस्यों पर पड़ता था। वहीं तेलुगु शीर्ष नेतृत्व को कई मामलों में विशेष छूट प्राप्त रहती थी।
इसी सिस्टम के कारण बस्तर के अनेक जनजातीय युवाओं को अपनी इच्छा के विरुद्ध नसबंदी करानी पड़ी। बाद में जब उन्होंने आत्मसमर्पण कर मुख्यधारा में वापसी की और विवाह किया, तब उन्हें एहसास हुआ कि माओवद के दिनों में लिए गए निर्णय उनके पूरे पारिवारिक जीवन को प्रभावित कर रहे हैं। संतान प्राप्ति में असमर्थता के कारण उन्हें सामाजिक दबाव और मानसिक तनाव का भी सामना करना पड़ा।

अब प्रशासन आत्मसमर्पित नक्सलियों के पुनर्वास को केवल आर्थिक सहायता, रोजगार और स्वरोजगार योजनाओं तक सीमित नहीं रख रहा है। प्रयास यह भी है कि मुख्यधारा में लौट चुके इन लोगों का पारिवारिक और सामाजिक जीवन भी सामान्य हो सके। इसी दिशा में नसबंदी रिवर्सल और चिकित्सकीय सहायता की यह पहल महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
विशेष शिविर के दौरान बस्तर संभाग के आयुक्त डोमन सिंह, पुलिस महानिरीक्षक सुंदरराज पी., कलेक्टर आकाश छिकारा और पुलिस अधीक्षक शलभ सिन्हा ने आत्मसमर्पित नक्सलियों से मुलाकात की। अधिकारियों ने उपचार प्रक्रिया की जानकारी ली और पुनर्वास से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर चर्चा की। प्रशासन का कहना है कि मुख्यधारा में लौट चुके लोगों को सम्मानजनक और सामान्य जीवन उपलब्ध कराना पुनर्वास नीति का महत्वपूर्ण हिस्सा है।