स्मार्टफोन, सोशल मीडिया और झारखंड के जनजातीय समाज का बदलता स्वरूप

क्या झारखंड की जनजातीय भाषाएँ और सांस्कृतिक परम्पराएँ बची रह पाएँगी, जब डिजिटल दुनिया और बढ़ती आवाजाही युवाओं की प्राथमिकताओं को बदल रही हैं?

The Narrative World    10-Jun-2026
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झारखंड के जनजातीय समुदायों ने पीढ़ियों तक अपने जीवन का निर्माण सामूहिक मूल्यों, मजबूत सामाजिक संबंधों और प्रकृति के साथ गहरे जुड़ाव के आधार पर किया। गाँवों में त्योहार सामूहिक रूप से मनाए जाते थे, परिवार मौखिक परम्पराओं को संजोकर रखते थे, और स्थानीय भाषाएँ अनगिनत पीढ़ियों के ज्ञान और अनुभवों की वाहक थीं। व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा की अपेक्षा सामुदायिक कल्याण को अधिक महत्व दिया जाता था।
 
हालाँकि, आज राज्य के अनेक हिस्सों में एक अलग ही वास्तविकता उभरती हुई दिखाई दे रही है।
 
स्मार्टफोन, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म, ऑनलाइन बाज़ार और ब्रांडेड उपभोक्ता उत्पाद अब दूर-दराज़ के जनजातीय क्षेत्रों तक पहुँच चुके हैं। जो प्रक्रिया आर्थिक एकीकरण के रूप में शुरू हुई थी, वह धीरे-धीरे एक व्यापक सांस्कृतिक परिवर्तन का रूप ले चुकी है। नई जीवनशैलियाँ, आकांक्षाएँ और उपभोग की आदतें लोगों, विशेषकर युवा पीढ़ी, की सफलता, पहचान और सामाजिक प्रतिष्ठा संबंधी धारणाओं को लगातार प्रभावित कर रही हैं।
 
ये परिवर्तन झारखंड के विभिन्न हिस्सों में स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहे हैं। पारम्परिक त्योहारों को अब डिजिटल मनोरंजन से प्रतिस्पर्धा करनी पड़ रही है। स्थानीय बाज़ारों के सामने ऑनलाइन खुदरा विक्रेताओं की चुनौती खड़ी हो गई है। युवा पीढ़ी के बीच स्वदेशी भाषाएँ अपनी प्रासंगिकता बनाए रखने के लिए संघर्ष कर रही हैं। वहीं दूसरी ओर, पलायन और शहरीकरण की बढ़ती प्रवृत्ति भी ग्रामीण जीवन को निरंतर बदल रही है।
 
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झारखंड अनेक जनजातीय समुदायों का निवास स्थान है, जिनमें संथाल, मुंडा, उराँव, हो और खड़िया प्रमुख हैं। ऐतिहासिक रूप से इन समुदायों ने अपने सामाजिक और आर्थिक जीवन का संगठन सहयोग, सहभागिता और सामूहिक उत्तरदायित्व के सिद्धांतों के आधार पर किया है।
 
परम्परागत रूप से भूमि केवल आजीविका का साधन नहीं रही है। जनजातीय समुदायों ने इसे एक साझा विरासत के रूप में देखा है, जो अतीत, वर्तमान और भावी पीढ़ियों को आपस में जोड़ती है। ग्राम संस्थाओं, पारम्परिक नेतृत्व व्यवस्थाओं और सामूहिक श्रम की प्रथाओं ने सामाजिक एकता को सुदृढ़ किया तथा पारस्परिक सहयोग और समर्थन को सुनिश्चित किया।
 
सरहुल, करमा और सोहराय जैसे त्योहार जनजातीय सांस्कृतिक पहचान को संरक्षित रखने में केंद्रीय भूमिका निभाते रहे हैं। ये उत्सव केवल मनोरंजन के अवसर भर नहीं रहे हैं। इन्होंने सामुदायिक संबंधों को सुदृढ़ किया है, प्रकृति के प्रति सम्मान की भावना को प्रकट किया है और बुज़ुर्गों से युवा पीढ़ी तक सांस्कृतिक ज्ञान एवं परम्पराओं के हस्तांतरण का माध्यम बने हैं।
 
संताली, मुंडारी, हो, कुड़ुख और खड़िया जैसी जनजातीय भाषाएँ भी इतिहास, परम्पराओं और जीवन-दृष्टि की महत्वपूर्ण वाहक रही हैं। गीतों, लोककथाओं और मौखिक परम्पराओं के माध्यम से इन समुदायों ने अपनी सामूहिक स्मृतियों, अनुभवों और सांस्कृतिक विरासत को पीढ़ी दर पीढ़ी संरक्षित रखा है।
 
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इंटरनेट कनेक्टिविटी के तीव्र विस्तार ने सांस्कृतिक परिवर्तन की गति को तेज कर दिया है।
 
सस्ते स्मार्टफोन और कम लागत वाले मोबाइल डेटा ने जनजातीय युवाओं को वैश्विक डिजिटल नेटवर्क से जोड़ दिया है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म अब अभूतपूर्व स्तर पर उनकी फैशन संबंधी पसंद, जीवनशैली की प्राथमिकताओं और व्यक्तिगत आकांक्षाओं को प्रभावित कर रहे हैं।
 
युवा उपयोगकर्ता नियमित रूप से ऐसी छवियों और सामग्रियों के संपर्क में आते हैं, जो सफलता को महंगे उत्पादों, ब्रांडेड परिधानों, विलासितापूर्ण जीवनशैली और शहरी संस्कृति से जोड़कर प्रस्तुत करती हैं। सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स और ऑनलाइन हस्तियाँ अक्सर उपभोग को उपलब्धि तथा सामाजिक मान्यता के प्रतीक के रूप में प्रदर्शित करते हैं।
 
परिणामस्वरूप, अनेक युवा अपने जीवन की तुलना सोशल मीडिया पर प्रस्तुत सावधानीपूर्वक गढ़ी गई डिजिटल छवियों से करने लगे हैं। इस निरंतर संपर्क के कारण ऐसी नई आकांक्षाएँ जन्म ले रही हैं, जो पारम्परिक सामुदायिक मूल्यों और जीवन-दृष्टि से काफी भिन्न हैं।
 
 
यह प्रभाव केवल मनोरंजन तक सीमित नहीं है। ऑनलाइन शॉपिंग प्लेटफॉर्म उपभोक्ताओं को कुछ ही क्लिक में ब्रांडेड उत्पाद खरीदने की सुविधा प्रदान करते हैं। इसके परिणामस्वरूप स्थानीय कारीगरों, पारम्परिक हस्तशिल्पों और समुदाय-आधारित बाज़ारों को अक्सर उन विशाल वाणिज्यिक आपूर्ति श्रृंखलाओं से प्रतिस्पर्धा करने में कठिनाई होती है, जिनकी पहुँच अब दूरस्थ क्षेत्रों तक भी हो गई है।
 
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आज अनेक जनजातीय युवा स्वयं को दो परस्पर विरोधी संसारों के बीच संतुलन स्थापित करने की चुनौती का सामना करते हुए पाते हैं।
 
एक ओर वह दुनिया है जो सामुदायिक उत्तरदायित्व, सांस्कृतिक निरन्तरता और सामूहिक कल्याण पर बल देती है। दूसरी ओर वह दुनिया है जो व्यक्तिगत उपलब्धि, उपभोग-केंद्रित जीवनशैली और सामाजिक दृश्यता को महत्व देती है।
 
यह द्वंद्व अब दैनिक जीवन में भी स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगा है। आधुनिक फैशन रुझान पारम्परिक परिधानों का स्थान लेते जा रहे हैं। वैश्विक मनोरंजन माध्यम सांस्कृतिक रुचियों और प्राथमिकताओं को आकार दे रहे हैं। युवा पीढ़ी सामुदायिक आयोजनों और सामाजिक गतिविधियों में कम समय बिताती है, जबकि डिजिटल प्लेटफॉर्म पर उनकी सक्रियता लगातार बढ़ रही है।
 
 
कई गाँवों में बुज़ुर्ग पारम्परिक अनुष्ठानों, सांस्कृतिक कार्यक्रमों और सामुदायिक निर्णय-निर्माण प्रक्रियाओं में घटती भागीदारी को लेकर चिंता व्यक्त करते हैं। वहीं, नई पीढ़ी जहाँ नए अवसरों और अनुभवों की तलाश में आगे बढ़ रही है, वहीं अनेक युवाओं के लिए अपनी सांस्कृतिक जड़ों से मजबूत जुड़ाव बनाए रखना भी एक चुनौती बनता जा रहा है।
 
परिणामस्वरूप, पहचान और अपनेपन की भावना को लेकर अनिश्चितता की भावना लगातार गहराती जा रही है।
 
लेख
अभिषेक पाण्डेय एवं निरंजन देव पाठक