भारत के 'हर गाँव में चर्च' का मिशन: 95 करोड़ की फंडिंग ट्रेल को ईडी ने किया उजागर

विदेशी धन, स्थानीय नेटवर्क और हजारों चर्चों के विस्तार के बीच ईडी की जांच ने मिशनरी गतिविधियों तथा राष्ट्रीय सुरक्षा के संभावित संबंधों को केंद्र में ला दिया।

The Narrative World    16-Jun-2026   
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2 महीने पहले भारत के जनजातीय बाहुल्य क्षेत्रों में चल रहे अवैध कन्वर्जन नेक्सस को लेकर एक अहम खबर सामने आई थी कि 95 करोड़ रुपये विदेशी डेबिट कार्ड्स के माध्यम से भारत में लाये गए हैं। इसमें से 6.5 करोड़ रुपये छत्तीसगढ़ के जनजातीय बाहुल्य क्षेत्रों में खर्च करने की जानकारी मिली थी। ED ने अपनी जांच में इस बात का खुलासा किया था।
 
जब यह मामला सामने आया, तब यह भी कहा गया कि इन पैसे को उपयोग अवैध कन्वर्जन के साथ-साथ नक्सल आतंकवाद की फंडिंग के लिए भी किया गया है। इस पूरे षड्यंत्र में टीटीआई (द टिमोथी इनिशिएटिव) नामक एक संगठन का नाम सामने आया था।
 
अब इस मामले में एक बड़ा मामला कर्नाटक से सामने आया है, जहां कर्नाटक पुलिस ने ईडी की शिकायत पर टीटीआई पर एफआईआर किया है। एफआईआर के अनुसार ईडी ने अपनी शिकायत में कहा है कि टीटीआई के प्रशिक्षण एवं ब्रेनवॉशिंग के कारण ही नक्सलवाद को बढ़ावा मिलता रहा।
 
दरअसल टीटीआई एक अंतरराष्ट्रीय ईसाई मिशनरी संगठन है, जो विश्व के प्रत्येक गांव में चर्च स्थापित करने की बात करता है। यह एक अमेरिकी मिशनरी समूह है, जिसने पिछले 19 वर्षों में 50 देशों के भीतर 2.68 लाख से अधिक चर्च स्थापित कर दिए हैं। सिर्फ भारत की बात करें तो एक मीडिया रिपोर्ट के अनुसार इस संस्था ने करीबन 10,000 चर्च स्थापित किए हैं, जिनमें से 7 हजार से अधिक दक्षिण के राज्यों में है।
 
गौर करने वाली बात यह है कि ईसाई मिशनरी संस्थाओं ने विशेष तौर पर प्रोजेक्ट इंडिया शुरू किया था, जो भारत में इसके मिशनरी विस्तार को संस्थागत रूप देने के लिए इसे टीटीआई के रूप में विकसित किया गया। कुछ रिपोर्ट्स में यह जानकारी भी सामने आई है कि टीटीआई के पीछे अमेरिका और कनाडा के चर्चों का पूरा नेटवर्क सहयोगी तंत्र के रूप में मौजूद है।
 
वहीं टीटीआई के मॉडल की बात करें तो यह दिखाई देता है कि इसमें बड़े चर्च बनाने के बजाय छोटे स्थानीय "होम चर्च" बनाने की रणनीति अपनाई गई थी। इसका सबसे बड़ा उदाहरण हम छत्तीसगढ़, झारखंड, महाराष्ट्र, ओडिशा, मध्यप्रदेश और आंध्र-तेलंगाना जनजातीय बाहुल्य क्षेत्रों में देख सकते हैं।
 
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टीटीआई की प्रणाली में तीन मुख्य किरदार हैं पहला पॉल, जो मास्टर ट्रेनर होता है। दूसरा टिमोथी जो चर्च प्लांटर है और तीसरा है टाइटस, जो शिष्य तैयार करता है। यही अलग-अलग समूह बनाते हैं, और फिर गांव-गांव तक पहुंचकर छोटे चर्च एवं प्रार्थना समूह के माध्यम से अपना दायरा बढ़ाते हैं।
 
टीटीआई ने इस पूरी प्रक्रिया में विदेशी लोगों के तंत्र का तो उपयोग किया, लेकिन भारत में विस्तार के लिए स्थानीय भर्तियों को ही आगे रखा। इसके लिए टीटीआई ने यहां की सामाजिक व्यवस्था में मौजूद फॉल्टलाइन को ना सिर्फ बड़ा किया, बल्कि उसका दुरुपयोग भी किया।
 
लेकिन जो बात सबसे गंभीर है, वो यह है कि नवम्बर 2025 से लेकर अप्रैल 2026 के बीच 1000 से अधिक विदेशी डेबिट कार्ड्स के माध्यम से 92.55 करोड़ रुपये निकाले गए, जिसका उपयोग अवैध कन्वर्जन और नक्सल हिंसा की फंडिंग के लिए किया गया।
 
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वहीं जैसे ही ईडी ने अपनी कार्रवाई शुरू की टीटीआई ने अपनी वेबसाइट को ही डाउन कर दिया। पोर्टल अब उपलब्ध ही नहीं है। वहीं यह भी जानकारी सामने आई है कि ईसाई मिशनरी समूह अब एकाउंट डिलीट करने एवं सर्वर से डेटा हटाने में लग गया है। यदि सब वैध था तो डेटा हटाने की क्या आवश्यकता थी?
 
इस पूरे घटनाक्रम में एक महत्वपूर्ण नाम है, जिसकी गिरफ्तारी ने कई तार जोड़ दिए हैं। 18 अप्रैल को भारत छोड़ कर भागने की कोशिश में बंगलुरू अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे से मीका मार्क नामक व्यक्ति की गिरफ्तारी की गई, जिसके पास से ईडी ने 24 विदेशी कार्ड बरामद किए थे। इसकी गिरफ्तारी के बाद यह भी खुलासा हुआ कि मार्क कई बार विदेश यात्रा कर चुका था, साथ ही बाहर से डेबिट कार्ड लाने का काम भी करता था।
 
वहीं दो अन्य नाम अजीत वर्गीज़ मथाई और जोनाथन एस राजन भी सामने आए हैं। इनमें वर्गीज़ वित्तीय गतिविधियों को देखता था और जोनाथन टीटीआई का भारत में प्रमुख अधिकारी था। इन दोनों ने ही देश के विभिन्न हिस्सों में एटीएम के माध्यम से पैसे निकालने का षड्यंत्र रचा था।
 
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टीटीआई इन पैसों के माध्यम से प्रशिक्षण, ईसाई उपदेश और अन्य कार्यक्रम करते थे, जिसमें आम ग्रामीणों को ईसाई बनने एवं नक्सल आतंकवाद के प्रति समर्थन देने के लिए ब्रेनवॉश किया जाता था।
 
 
इस पूरे प्रकरण ने एक बार फिर इस तथ्य को सामने ला दिया कर दिया है कि विदेशी मिशनरी नेटवर्क, रिलीजन का विस्तार, वित्तीय अपारदर्शिता और राष्ट्रीय सुरक्षा के बीच संबंधों की जाँच कितनी आवश्यक है।
 
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वहीं इस पूरे प्रकरण का सबसे चिंताजनक पहलू केवल विदेशी फंडिंग नहीं है, बल्कि वह समानांतर ढाँचा है जिसके माध्यम से यह धन भारत के जनजातीय बाहुल्य क्षेत्रों तक पहुँचाया गया। एक ओर ईसाई संगठन "सेवा" और "प्रार्थना" की बात करते हैं, वहीं दूसरी ओर जाँच एजेंसियों के समक्ष ऐसे तथ्य सामने आ रहे हैं जो इन गतिविधियों के पीछे कहीं अधिक संगठित और गहरे नेटवर्क की ओर संकेत करते हैं।
 
 
ईडी और अन्य एजेंसियों के आरोप आगे चलकर न्यायिक परीक्षण में सिद्ध होते हैं, तो यह मामला केवल FCRA या FEMA उल्लंघन का नहीं रहेगा, बल्कि भारत की सामाजिक स्थिरता, जनजातीय समाज, धार्मिक जनसांख्यिकी और आंतरिक सुरक्षा को प्रभावित करने वाले एक अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क के रूप में देखा जाएगा।
 
हालांकि सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि आज भारत में हजारों चर्च स्थापित करने, स्थानीय नेटवर्क खड़े करने, विदेशी धन पहुँचाने और संवेदनशील क्षेत्रों में प्रभाव बढ़ाने का वास्तविक उद्देश्य क्या था?

शुभम उपाध्याय

संपादक, स्तंभकार, टिप्पणीकार