छत्तीसगढ़ के बालोद जिले के तुएगोंडी-पाटेश्वर धाम (जामड़ीपाट क्षेत्र) को लेकर चल रहा विवाद अब केवल एक धार्मिक या सांस्कृतिक विषय नहीं रह गया है। क्षेत्र के कई ग्रामीणों और पारंपरिक जनजातीय नेतृत्वकर्ताओं का आरोप है कि सर्व आदिवासी समाज के कुछ पदाधिकारी और उनसे जुड़े समूह ना सिर्फ सर्व समाज के भीतर विभाजन पैदा कर रहे हैं, बल्कि जनजाति समाज के लोगों को भी एक-दूसरे के विरुद्ध खड़े कर रहे हैं। उनका कहना है कि जनजातीय आस्था और संस्कृति की रक्षा के नाम पर ऐसा माहौल बनाया जा रहा है, जिससे समाज के भीतर ही टकराव बढ़ रहा है।
स्थानीय ग्रामीणों के अनुसार, जिस विरोध प्रदर्शन को पूरे प्रदेश के जनजाति समाज की आवाज बताने की कोशिश की जा रही है, उसकी जमीनी हकीकत बिल्कुल ही अलग है। उनका दावा है कि इस क्षेत्र से जुड़े 12 गांवों में से 11 गांव के अधिकांश लोग सर्व आदिवासी समाज के विरोध प्रदर्शन और उसके तौर-तरीकों से सहमत नहीं हैं। यही कारण है कि अब कई ग्रामीण खुले तौर पर सवाल उठा रहे हैं कि आखिर जनजातीय समाज में तनाव और अविश्वास का वातावरण कौन बना रहा है?
12 में से 11 गांव क्यों हैं विरोध में?
स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि जामड़ीपाट क्षेत्र के अधिकांश गांवों में सर्व समाज दशकों से आपसी भाईचारे के साथ रहते आए हैं, जिनमें जनजाति समाज के लोग भी हैं और गैर-जनजाति समाज के लोग भी शामिल हैं। पाटेश्वर धाम से लगे गांव के वरिष्ठजनों का कहना है कि सर्व आदिवासी समाज से जुड़े कुछ नेता स्थानीय परिस्थितियों को समझने के बजाय बाहरी राजनीतिक एजेंडा थोपने की कोशिश कर रहे हैं।
ग्रामीणों ने यह भी कहा है कि जिन गतिविधियों और धार्मिक कार्यों का विरोध किया जा रहा है, उन्हें लेकर स्थानीय स्तर पर पहले कभी कोई बड़ा विवाद नहीं था, लेकिन सर्व आदिवासी समाज के हस्तक्षेप के बाद स्थिति तनावपूर्ण होती चली गई।
पारंपरिक व्यवस्था को कमजोर करने का आरोप
गोंड समाज सहित लगभग सभी जनजातीय समुदायों में गांव के गायता, बैगा और सियान (बुजुर्ग) सामाजिक निर्णयों के केंद्र माने जाते हैं। लेकिन इस विषय पर ग्रामीणों का कहना है कि सर्व आदिवासी समाज के कुछ नेता इन पारंपरिक व्यवस्थाओं को दरकिनार कर स्वयं को समाज का एकमात्र प्रतिनिधि साबित करने में लगे हैं, जिसमें उनकी निजी राजनीतिक महत्वकांक्षा के चलते समाज में वैमनस्यता बढ़ रही है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि जिन बुजुर्गों ने जामड़ीपाट के मामले में शांति और संवाद की बात की, उनकी बातों को महत्व नहीं दिया गया। सर्व आदिवासी समाज जैसे संगठन जुड़े लोगों ने संवाद के बजाय टकराव की स्थिति निर्मित की। इसके कारण यह हुआ कि जिस विवाद का आपसी संवाद एवं समन्वय से समाधान निकाला जा सकता था, उसे संघर्ष की ओर मोड़ दिया गया।
मूर्ति विवाद: क्या सचमुच जनजाति आस्था पर हमला हुआ?
इस विवाद का में एक पहलू देवस्थल और मूर्ति स्थापना का भी है। प्रदर्शनकारी पक्ष इसे जनजाति आस्था पर हमला बता रहा है, लेकिन इसी मामले में स्थानीय जनजाति ग्रामीणों का कहना है कि जिस मूर्ति को लेकर इतना विवाद खड़ा किया गया, वह वास्तव में जनजातियों के आराध्य देव की ही मूर्ति थी और उसे स्थापित करने वाले भी स्थानीय जनजाति ग्रामीण ही थे।
यही कारण है कि कई ग्रामीण अब यह सवाल उठा रहे हैं कि जब स्थापना से लेकर पूजा-उपासना तक पूरी प्रक्रिया जनजाति समाज के भीतर हुई, तो इसे बाहरी हमला बताने की आवश्यकता क्यों महसूस हुई? उनके अनुसार, इस मुद्दे को जानबूझकर बड़ा बनाकर भावनात्मक माहौल तैयार किया गया, ताकि क्षेत्र के बाहर में मौजूद जनजातीय समाज को आस्था के नाम पर आक्रोशित किया जा सके।
समाज को बांटने की राजनीति?
सर्व आदिवासी समाज के कुछ नेताओं को लेकर यह खुले रूप से सामने आ रहा है कि ये समूह जनजाति और गैर-जनजाति समाज के बीच अविश्वास पैदा कर रहा है। उनका कहना है कि दशकों से साथ रहने वाले समुदायों के बीच अब पहचान की राजनीति को बढ़ावा दिया जा रहा है।
शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और विकास जैसे मुद्दों की बजाय समाज को सांस्कृतिक खतरे का भय दिखाकर लामबंद करने का प्रयास किया जा रहा है। इससे वास्तविक समस्याएं पीछे छूट रही हैं।
गोंड संस्कृति की रक्षा या नई व्याख्या?
दरअसल क्षेत्र में यह देखा जा रहा है कि सर्व आदिवासी समाज से जुड़े कुछ समूह संस्कृति-परंपरा की रक्षा के नाम पर गोंड समाज की संस्कृति की नई व्याख्या प्रस्तुत कर रहे हैं। स्थिति ऐसी बन चुकी है कि अब ग्रामीण भी यह कह रहे हैं इनके द्वारा गोंड समाज में सदियों से चली आ रही कई धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं को आज सवालों के घेरे में खड़ा किया जा रहा है।
गौरी-गौरा जैसे पर्वों से लेकर विभिन्न देवस्थलों की परंपराओं तक, कई ऐसी मान्यताएं हैं जिन्हें स्थानीय लोग अपनी सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा मानते हैं। लेकिन कुछ संगठन इन परंपराओं को बदलकर नई पहचान गढ़ने का प्रयास कर रहे हैं।
सामाजिक समरसता पर बढ़ता संकट
जामड़ीपाट क्षेत्र की सबसे बड़ी विशेषता सर्व सनातन समाज के बीच मौजूद सामाजिक समरसता रही है। यहां जनजाति समाज समेत अन्य समाजों के लोग लंबे समय से एक साथ रहते आए हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि वर्तमान विवाद ने इसी भाईचारे को सबसे अधिक नुकसान पहुंचाया है।
उनका आरोप है कि सर्व आदिवासी समाज के कुछ नेताओं ने समाज को एकजुट करने के बजाय अलग-अलग खेमों में बांटने का काम किया है। इससे गांवों में अनावश्यक तनाव और अविश्वास का माहौल पैदा हुआ है।
बड़ा सवाल
बालोद के इस विवाद ने एक बड़ा प्रश्न खड़ा कर दिया है। यदि वास्तव में अधिकांश स्थानीय गांव आंदोलन के साथ नहीं हैं, यदि पारंपरिक नेतृत्व खुद को उपेक्षित महसूस कर रहा है और यदि समाज के भीतर विभाजन बढ़ रहा है, तो क्या सर्व आदिवासी समाज वास्तव में जनजातीय हितों की रक्षा कर रहा है या जानबूझकर जनजातीय समाज के भीतर जहर घोलने का काम कर रहा है?
आज यही सवाल बालोद सहित पूरे राज्य के अनेक ग्रामीण और पारंपरिक जनजातीय प्रतिनिधि उठा रहे हैं। उनका मानना है कि जनजाति समाज की वास्तविक शक्ति उसकी एकता, परंपरा और सामाजिक समरसता में है। यदि वही कमजोर होती है, तो नुकसान किसी संगठन का नहीं बल्कि पूरे जनजातीय समाज का होगा।